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समिति की विदेशी कलाकारों पर मेहरबानी, समारोह में किन स्थानीय कलाकारों को आमंत्रित करना है? तय नहीं

तानसेन समारोह में विदेशी कलाकारों को आमंत्रण क्यों!

समिति की विदेशी कलाकारों पर मेहरबानी, समारोह में किन स्थानीय कलाकारों को आमंत्रित करना है? तय नहीं

ग्वालियर/वेब डेस्क। संगीत सम्राट तानसेन की स्मृति में प्रतिवर्ष होने वाले तानसेन समारोह के लिए कलाकारों के लिए बनी चयन समिति की कार्यप्रणाली को लेकर अब उंगलिया उठने लगी हैं। दो दशक पहले समारोह में जितना स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों के कलाकारों को महत्व मिलता था, उतना अब नहीं मिल रहा है। संस्कृति विभाग तानसेन समारोह में प्रस्तुति देने के लिए आने वाले विदेशी कलाकारों पर जहां लाखों रुपए खर्च करता है वहीं समारोह में आने वाले अपने ही देश के कलाकारों को नाम मात्र का मानदेय देकर इतिश्री कर लेता है। देशी-विदेशी कलाकारों के बीच हो रहे इस भेदभाव के कारण अब देश के कलाकर तानसेन समारोह में आकर अपने आपको ठगा सा महसूस करने लगे हैं। तानसेन समारोह के लिए बनी चयन समिति भी ऐन वक्त तक यह तय नहीं कर पाती है कि समारोह में किन कलाकारों को आमंत्रित करना है? जिससे देश के अन्य शहरों में रहने वाले शास्त्रीय संगीत के कला साधक समारोह में अपनी प्रस्तुति देने से वंचित रह जाते हैं और अपने देश की प्राचीन कला को बढ़ावा कम मिल पा रहा है।

16 से शुरू होना है समारोह, तैयारियां बैठकों में

उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी की ओर से 16 दिसम्बर से हजीरा स्थित मोहम्मद गौस के मकबरा में तानसेन समारोह का आयोजन किया जाएगा। इस समारोह में जहां एक ओर देश के अलग-अलग स्थानों के प्रसिद्ध गायक-वादकों द्वारा प्रस्तुति दी जाएगी वहीं चार स्थानीय कलाकार भी प्रस्तुति देंगे, लेकिन इस समारोह के लिए अभी तक कोई भी खास तैयारियां नहीं हुई हैं। इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। इतना ही नहीं, बीते रोज खाद्य मंत्री ने बैठक लेकर दिशा निर्देश भी दिए थे, लेकिन उसके बाद भी अभी अधिकारी सिर्फ विचार कर रहे हैं।

विदेशी कलाकारों की प्रस्तुति रास नहीं आई

पिछले तीन वर्षों से तानसेन समारोह को अंतर्राष्ट्रीय बनाने की कोशिश की जा रही थी और विदेशी कलाकार ग्वालियर आकर अपने देश के शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति देते थे, लेकिन संस्कृति विभाग के अधिकारियों की मानें तो विदेशी कलाकारों की प्रस्तुति शहरवासियों को पसंद नहीं आई थी। बावजूद इसके यह कयास लगाए जा रहे हंै कि इस बार भी विदेशी कलाकारों को बुलाया जा सकता है।

इंटक मैदान में गमक कब्बाली की होगी प्रस्तुति

तानसेन समारोह के एक दिन पहले उपनगर हजीरा स्थित इंटक मैदान में 16 दिसम्बर को गमक संगीत का आयोजन होगा। इसमें इस बार कब्बाली का आयोजन किया जाएगा। संगीत समारोह की आखिरी सभा का आयोजन तानसेन की जन्म स्थली बेहट में झिलमिल नदी के किनारे होगा, समापन उसी दिन शाम को गूजरी महल में होगा।

मंच पर जूते पहनकर जाते हैं तो दुख होता है

स्वदेश से चर्चा के दौरान शास्त्रीय गायक पं. उमेश कम्पूवाले ने बताया कि विदेशी कलाकार आते हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन वे मंच पर कोट, पेंट व जूते पहनकर कुर्सी पर बैठकर प्रस्तुति देते हैं तो मुझे बहुत दुख होता है। आयोजकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए, साथ ही अगर कोई विदेशी कलाकार प्रस्तुति देते हैं तो वह हिन्दुस्तानी संगीत की प्रस्तुति दें।

इनका कहना है

अगर महाराज बाड़े पर कवि सम्मेलन कराया जाए और उसमें जर्मन के कवियों को बुलाया जाए। जर्मन के कलाकार जर्मनी भाषा में कवि सम्मेलन करेंगे तो किसको समझ में आएगा। तानसेन समारोह में जो विदेशी कलाकार आते हैं। मुझे उनका संगीत बिल्कुल भी क्लिक नहीं करता है। भारतीय संगीत में जो आनंद आता है, वह उनके संगीत में कतईं नहीं है। ग्वालियर के कलाकारों के साथ-साथ भारत के अन्य कलाकारों को भी मौका मिलना चाहिए। विदेशी कलाकारों को बुलाने के लिए काफी पैसा खर्च किया जाता है। अगर वही पैसा भारत के कलाकारों के मानदेय पर खर्च किया जाए तो अच्छा रहेगा। मैं यह नहीं कह रहा हूं विदेशी कलाकारों को नहीं बुलाया जाए। अगर उनको बुलाया जाता है तो उनसे भारतीय संगीत की प्रस्तुति दिलवाई जाए।

श्रीराम उमड़ेकर, सितार वादक

पहले भारत के ही बड़े-बड़े कलाकार तानसेन समारोह में प्रस्तुति देने आते थे, लेकिन अब कलाकार कम ही आते हैं। विदेशी कलाकारों पर पैसा खर्च किया जाता है और उन्हें वीआईपी सुविधा भी दी जाती है। शासन की क्या पॉलिसी है? पता नहीं। ग्वालियर के चार स्थानीय कलाकारों को इस समारोह में शामिल किया जाता है, लेकिन हर सभा में किसी भी कलाकार को मौका नहीं मिलता है। ग्वालियर के कलाकारों को हर सभा में मौका मिलना चाहिए।

पं. उमेश कम्पू वाले, शास्त्रीय गायक

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