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बाल यौन उत्पीड़न मामले में मध्य प्रदेश में हर महीने एक व्यक्ति को मिली फांसी की सजा

बाल यौन उत्पीड़न मामले में मध्य प्रदेश में हर महीने एक व्यक्ति को मिली फांसी की सजा

भोपाल। मासूमों के साथ दरिंदगी को लेकर मध्य प्रदेश में पिछले एक साल के दौरान तकरीबन हर महीने एक व्यक्ति को फांसी की सजा सुनाई गई। इन आदेशों के साथ देश में मध्य प्रदेश ने रेकॉर्ड बनाया है। चूंकि राज्य ने पिछले साल मई में बाल यौन उत्पीड़न कानून में संशोधन किया था, इसलिए इसकी अदालतों ने 25 मामलों में मौत की सजा दी। 11 जुलाई को नवीनतम मौत की सजा सुनाई गई थी। यह एक ऐसा मॉडल है, जिसका पालन देश के बाकी हिस्सों में किया जाना है। संसद ने हाल ही में पॉक्सो ऐक्ट संशोधन बिल 2019 पास किया है।

बिल में सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक है, बच्ची का यौन शोषण करने वाले को अधिकतम मौत की सजा। पहले अधिकतम सजा उम्रकैद थी। बच्चों के साथ रेप और हत्याएं जैसे अपराध करने वालों के साथ कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन बाल अधिकार कार्यकर्ता और वकील चिंता व्यक्त करते हैं। उनका तर्क है कि अधिकांश पीड़िता परिवार प्रतिशोध के बजाय जवाबदेही, माफी और दोषियों को जेल चाहते हैं। सोशल वर्कर विद्या रेड्डी ने कहा कि आंकड़ों से पता चलता है कि आमतौर रेप करने वाला व्यक्ति, पीड़ित या उसके परिवार का जानने वाला होता है। मौत की सजा का डर बच्चों और उनके परिवारों के दुश्मन बढ़ाएगा। एक आशंका यह भी है कि आरोपी खुद को बचाने के लिए पीड़ितों को मार सकते हैं।

जुलाई 2018 में, मध्य प्रदेश में ग्वालियर और कटनी जिलों के दो बाल बलात्कारियों को आरोप पत्र के सिर्फ पांच दिनों में अदालतों द्वारा मौत की सजा दी गई थी। एमपी पुलिस ने कटनी मामले को सबसे तेज निपटाने के मामले में नैशनल रेकॉर्ड भी बनाया है।

इसी साल जून में भोपाल में 35 वर्षीय दैनिक विष्णु बामोर ने नौ साल की बच्ची के साथ बलात्कार किया और उसकी हत्या कर दी। सुनवाई 23 जून को शुरू हुई और 20 वर्किंग डे के अंदर सुनवाई खत्म हो गई। बामोर को 11 जुलाई को फांसी दे दई गई।

इन सभी 25 मौत की सजा मामलों में खास बात यह भी थी कि अधिकांश आरोपी निचले सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से थे। वे अशिक्षित थे। जो साक्षर थे तो वे कानूनी फीस नहीं दे सकते थे। कई मामलों में, बार काउंसिल ने भी उनका प्रतिनिधित्व करने से इनकार कर दिया और उन्हें उनके परिवारों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। जांच इतनी जल्दबाजी में की जाती है कि बहुत बार डीएनए सैंपल और फरेंसिक आंकड़ों को भी ट्रायल में शामिल नहीं किया जाता है। पिछले साल 15 मई से, 25 मामलों में दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई है। एक और अहम बात यह है कि 175 को उम्रकैद की सजा मिली है।

पिछले दस वर्षों में बाल बलात्कार के सजा के मामलों में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। बाल बलात्कार के लिए 2006 में 32.6 फीसदी की सजा की दर था। वहीं 2016 में यह घटकर 28.2 फीसदी हो गई, जबकि 2006 में पेंडेंसी 81.3 फीसदी से बढ़कर 2016 में 89.6 फीसदी हो गई। यहां तक कि मध्य प्रदेश में भी 25 मौत की सजाओं में से चार को ही हाई कोर्ट ने मंजूर किया। इस महीने की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जनवरी-जून 2019 के बीच पंजीकृत 24,212 एफआईआर, ट्रायल कोर्ट ने केवल 911 या 4 फीसदी मामलों का फैसला किया था।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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