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महानगरों की चार सीटों पर कांग्रेस में उम्मीदवारों का अकाल

महानगरों की चार सीटों पर कांग्रेस में उम्मीदवारों का अकाल

आयातित उम्मीदवार हो सकते हैं कांग्रेस का चेहरा

विशेष संवाददाता भोपाल

लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है। ऐसे में राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवारों के चयन को लेकर मंथन में जुटे हुए है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के लिए चेहरे तलाशने में पसीने छूट रहे हैं। प्रदेश के चार महानगरों भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के लिए ऐसे उम्मीदवारों की तलाश है, जो सौ-टका पार्टी को जीत दिला सकें। प्रदेश के इन महानगरों में भाजपा की जीत के मिथक को कांग्रेस इस बार किसी भी तरह से तोड़ना चाह रही है। पार्टी इन सीटों पर कमलनाथ के सहारे है।

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि महानगरों की भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर सीटों पर पार्टी मुख्यमंत्री कमलनाथ के चेहरे को सामने रख कर चुनावी वैतरणी पार लगाने का प्रयास करेगी, अर्थात पार्टी का इन सीटों पर उम्मीदवार चयन में मुख्यमंत्री कमलनाथ का पूरा दखल रहेगा। कांग्रेस को लगता है कि विधानसभा चुनाव के नतीजे और पिछले दो महीनो में कमलनाथ सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों का लाभ उसे लोकसभा में मिलेगा। इन सीटों पर बड़े नेताओं के नाम पर कांग्रेस ने विचार करना शुरू कर दिया है। पार्टी हाईकमान भी इसको लेकर गंभीर है।

इन सीटों पर असमंजस की स्थिति

मंदसौर से मीनाक्षी नटराजन के लिए सर्वे रिपोर्ट में चुनाव आसान नहीं बताया जा रहा है, लेकिन वे अपने से अच्छा प्रत्याशी क्षेत्र में लाए जाने की स्थिति में ही सीट छोडऩे को तैयार बताई जा रही हैं। इसी तरह भिंड में महेंद्र बौद्ध के प्रत्याशी बनाए जाने के सिंगल नाम पर मामला अटक गया है, क्योंकि यहां मंत्री डॉ. गोविंद सिंह ने पार्टी के बाहर के एक नेता को लाकर चुनाव में उतारने का विकल्प प्रदेश नेतृत्व के सामने रख दिया है।

भोपाल, इंदौर में नही भाजपा का विकल्प

लोकसभा चुनाव में इन चार महानगरों में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस ऐसे उम्मीदवारों की तलाश में है, जो इन सीटों पर कांग्रेस की विजयी पताका फहरा सकें। इंदौर में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को भाजपा द्वारा फिर से मैदान में उतारे जाने के संकेत मिल रहे हैं, यहां कांग्रेस के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो ताई को टक्कर दे सके। इंदौर की ही तरह भोपाल संसदीय सीट को भी भाजपा का मजबूत गढ़ माना जा रहा है। यहां पर भी कांग्रेस के पास उम्मीदवारों की कमी है। शायद यही वजह है की पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भोपाल और इंदौर में से किसी एक स्थान से चुनाव लड़ाने की बात भी सामने आ रही है, हांलाकि भोपाल सीट से दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित का नाम भी तेजी के साथ उभरा है। मगर फिलहाल इसके कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहे। दिग्विजय सिंह को लेकर संगठन का दबाव बना तो संभावना इस बात की भी है कि उन्हें भोपाल के बजाए इंदौर से सुमित्रा महाजन के खिलाफ प्रत्याशी बनाया जाए। उनके बार-बार इंदौर के दौरे इस बात के संकेत दे रहे है कि खुद दिग्विजय सिंह भी इंदौर सीट से चुनाव लड़ने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

सिंधिया के खिलाफ बन रही रणनीति

कांग्रेस के अन्दर इस बात को लेकर भी गहन मंथन चल रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से लड़ते है तो ग्वालियर सीट पर जीत हासिल करना कांग्रेस के लिए दूर की कौड़ी होगी। कांग्रेस में सिंधिया के बढ़ते कद से आहत सिंधिया विरोधी खेमा चाहता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना सीट से ही चुनाव लड़ें और ग्वालियर सीट पर उनकी पत्नि प्रियदर्शनी राजे सिंधिया को लड़ाया जाए, ताकि सिंधिया की ताकत दो भागों में बंट जाए और प्रदेश की अन्य सीटों पर उनका ज्यादा दखल न रहे। सिंधिया के खिलाफ अन्दर ही अन्दर चल रही इस मुहिम में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के समर्थको की अहम् भूमिका बताई जा रही है।

जबलपुर में एक अनार सौ बीमार

ग्वालियर, भोपाल, इंदौर के अलावा जबलपुर में भी कांग्रेस के लिए सुनिश्चित जीत दर्ज करने वाला उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। यहां से पार्टी एक बार फिर रामेश्वर नीखरा के नाम पर विचार कर सकती है। वैसे नीखरा खुद होशंगाबाद लोकसभा सीट से दावेदारी कर रहे हैं, जहाँ से पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी भी सशक्त दावेदार हैं। इस सीट पर कांग्रेस के विधिक सलाहकार विवेक तन्खा भी उम्मीदवारी जता रहे हैं। एक संभावना यह भी है की यदि मध्यप्रदेश में लोकतांत्रिक जनता दल से कांग्रेस का गठबंधन हुआ तो शरद यादव जबलपुर से चुनाव लड़ सकते हैं। विधानसभा चुनाव में लोकतांत्रिक जनता दल के समर्थन में जतारा विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था।

तय माने जा रहे है इनके नाम

समिति में जिन सीटों पर सिंगल नाम सामने आए हैं, उनमें मुरैना-श्योपुर से रामनिवास रावत, गुना-शिवपुरी से ज्योतिरादित्य सिंधिया, छिंदवाड़ा से नकुलनाथ, रतलाम-झाबुआ से कांतिलाल भूरिया, धार से गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी, खंडवा से अरुण यादव, बैतूल से अजय शाह, दमोह से रामकृष्ण कुसमरिया, सतना से अजय सिंह और सीधी से राजेंद्र सिंह के नाम तय बताए जा रहे हैं।

महिला उम्मीदवारों ने भी किया दावा

प्रदेश में पहले चरण में 29 अप्रैल को सीधी, शहडोल, जबलपुर, मंडला, बालाघाट और छिंदवाड़ा सीट के चुनाव होना हैं। इसलिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की केन्द्रीय चुनाव समिति में छिंदवाड़ा को छोडक़र बाकी सीटों पर उम्मीदवारों के पांच नामों के जो पैनल मिले हैं, उन्हें सिंगल किए जाने पर चर्चा हुई। साथ ही केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक में 19 सीटों पर नाम चयन को लेकर नई नीति और नियम तैयार किए जाएंगे। टीकमगढ़, दमोह, होशंगाबाद, बैतूल, खजुराहो, रीवा, मुरैना, भिंड, भोपाल, विदिशा, देवास, उज्जैन और इंदौर ऐसी सीटें हैं जहां प्रत्याशियों का चयन बाद में किया जाएगा। इन सीटों पर महिला उम्मीदवारों की दावेदारी को देखते हुए पार्टी नए युवा चेहरों और महिलाओं को मौका देने पर विचार कर रही है।

कांग्रेस का पक्ष

इधर प्रदेश के चार महानगरों में उम्मीदवारों की तलाश को लेकर कांग्रेस के अन्दर मचे घमासान के बीच कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा यह स्वीकार करती हैं कि भाजपा शहरों में कांग्रेस से मजबूत रही है। मगर उनका दावा है कि अब चीजें बदल रही है, क्योंकि जनता कमलनाथ सरकार के पिछले दो माह में लिए गए निर्णयों की तुलना शिवराज की घोषणाओं से करने लगी है। ओझा के अनुसार युवाओं, किसानों और महिलाओं के लिए गए निर्णय से इस बार नतीजों पर फर्क पड़ेगा। उन्होंने कहा जनता समझ गई है कि कांग्रेस सिर्फ बातें नहीं करती बल्कि काम में विश्वास करती है।

महानगरों की चारों सीट पर भाजपा का कब्जा

आंकड़ों का अध्ययन करें तो एक बात साफ है कि मध्यप्रदेश के प्रमुख चार महानगरों की लोकसभा सीटों पर लम्बे समय से भाजपा का कब्जा है। साल 1989 से भोपाल और इंदौर लोकसभा सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार ही सांसद चुने जाते रहे हैं। इसी प्रकार जबलपुर सीट पर कांग्रेस को 1996 से और ग्वालियर में 2009 से जीत नसीब नहीं हुई है। मतलब यह कि पिछले दस से लेकर 30 सालों से महानगरों पर भाजपा का कब्जा बरकरार है। भाजपा के गढ़ बन चुके भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर संसदीय क्षेत्रों को इस बार किसी भी तरह से कांग्रेस जीत का स्वाद चखना चाहती है।

Naveen ( 1337 )

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