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लोकसभा में तीन तलाक बिल के पक्ष में 303 और विपक्ष में 82 वोट पड़े, बिल ध्वनिमत से पारित

दिल्ली। मुसलमानों में त्वरित तीन बार दोहराकर तलाक देने की प्रथा तलाक-ए-बिद्दत पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया विधेयक लोकसभा में गुरुवार को चर्चा के बाद पारित हो गया। यह विधेयक इस संबंध में लाए गए अध्यादेश का स्थान लेगा। चर्चा के दौरान विपक्ष ने विधेयक का विरोध किया और इस पर मतविभाजन की मांग की। विधेयक के पक्ष में 303 और विरोध में 82 पड़े।

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019 विधेयक पर साढ़े पांच घंटे चली चर्चा का जवाब देते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि विपक्ष विधेयक के गुण दोषों पर विचार करने की बजाए इसका विरोध करने में लगा हुआ है। उन्होंने कहा कि हिन्दुओं में भी बाल विवाह, सति प्रथा और बहुविवाह जैसी कई प्रथाओं को सजा का डर दिखाकर कानून के माध्यम से रोका गया है। इससे समाज में बदलाव आया है और इसका श्रेय कांग्रेस को जाता है। शाह बानो के मामले में कांग्रेस सरकार ने इससे उलट रूख अपनाया और आज भी कांग्रेस इसे दोहरा रही है।

विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि संसद को कानून बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की जरूरत नहीं है। 2013 में तीन तलाक का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तो कांग्रेस सरकार ने हलफनामा तक दाखिल नहीं किया था। नरेन्द्र मोदी ने कोर्ट में मुस्लिम महिलाओं का साथ दिया।

रविशंकर ने कहा कि विपक्ष तीन तलाक को आपराधिक बनाए जाने का विरोध कर रहा है लेकिन हिन्दुओं में दूसरी शादी और घरेलु हिंसा से जुड़े मामलों में भी सजा होती है। दहेज के मामलों में भी हिन्दुओं को जेल की सजा होती है तब भी गुजारा-भत्ते का प्रश्न उठता है। उन्होंने कहा कि आपराधिक बनाए जाने के पीछे का कारण मुस्लिम पतियों को मनमाने ढंग से पत्नी को तलाक देने से सजा का डर दिखाकर रोकना है।

उन्होंने कहा कि हर कानून के दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। ऐसे में केवल दुरुपयोग होगा यह बात कहकर कानून के अस्तित्व पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते।

कानून मंत्री ने कहा कि यह नारी न्याय, नारी गरिमा और नारी सम्मान का विषय है जिसपर संसद के सभी सदस्यों को एकजुट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट एकसाथ तीन बार बोलकर तलाक देने की तलाक-ए-बिद्दत प्रथा को समाप्त कर चुका है, लेकिन फिर भी मुस्लिम महिला इसका शिकार हो रही हैं। उन्होंने कुछ उदाहरण देते हुए कहा कि किस तरह मुस्लिम महिलाओं को छोटी-छोटी बात पर तलाक दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अबतक मीडिया के माध्यम से त्वरित तीन तलाक देने के 574 मामले सामने आ चुके हैं।

प्रसाद ने कहा कि उनकी सरकार ने विपक्ष की मांग पर कौन मामला दर्ज कर सकता है उसे तय कर दिया है। इसके अलावा कोर्ट को महिला पक्ष सुनकर जमानत देने का अधिकार दिया गया है। आपसी बातचीत से मामला सुलझता है तो उसका भी प्रावधान विधेयक में किया गया है।

विधेयक का विरोध करते हुए आरएसपी नेता एनके प्रेमचन्द्रन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत को समाप्त कर दिया है। ऐसे में इस तरह से दिए गए तलाक की कोई वैधता नहीं रह जाती। फिर भी यदि पति जबरदस्ती महिला को इस आधार पर घर से बाहर करता है या खर्चा देने से मना करता है तो दहेज कानूनों के तहत उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ में से केवल दो ने ही इस संबंध में कानून लाने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि पर्नसनल लॉ को सरकार क्रिमिलन लॉ बनाने जा रही है। इसके अलावा विधेयक में पहले प्रावधान दिया गया है कि तीन तलाक देने वाले पति को तीन साल की जेल की सजा होगी और दूसरी तरफ कहा गया है कि पति पत्नी को गुजारा-भत्ता देगा। यह दोनों बातें एकसाथ संभव नहीं है।

चर्चा के दौरान सांसद मीनाक्षी लेखी ने कहा कि जवाहर लाल नेहरू के समय में हिन्दुओं के लिए इसी तरह का विधेयक लाया गया था जिसका हिन्दू महासभा ने विरोध किया था, लेकिन कानून बना और उसके चलते महिलाओं को समान अधिकार मिला। उन्होंने कहा कि दलितों को छोड़कर हिन्दुओं के अन्य समुदाय में तलाक की व्यवस्था नहीं थी वह कानून के माध्यम से दी गई ।

एआईएमआईएम के नेता असदद्दुदीन ओवैसी ने कहा कि इस्लाम में विवाह जन्म-जन्म का साथ नहीं बल्कि एक समझौता है। ऐसे में एक प्रावधान लगाया जा सकता है कि अगर कोई तीन तलाक देगा तो उसे महिला को मेहर की रकम का 500 गुना जुर्माना देना होगा। उन्होंने कहा कि महिला अगर तीन तलाक के खिलाफ अगर कानून का सहारा लेगी तो पति आगे उसे अन्य तरीकों से समय अंतराल में तलाक दे सकता है। उन्होंने कहा कि अगर पति को तीन तलाक कहने पर तीन साल की सजा होगी तो पत्नी को गुजारा-भत्ता कैसे मिलेगा।

तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) और निकाह हलाला संबंधी विधेयक लोकसभा में दो बार पारित हो चुका है, लेकिन राज्यसभा में बहुमत न होने के चलते अटक गया था। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार तीन तलाक मामले में दर्ज प्राथमिकी तभी संज्ञेय होगी जब उसे पत्नी या उसका कोई रिश्तेदार दर्ज करायेगा। पति-पत्नी से बातचीत कर मजिस्ट्रेट मामले में समझौता करा सकता है।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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