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अयोध्या : सुप्रीम कोर्ट में छठे दिन की सुनवाई में रामलला के वकील ने मंदिर तोड़ने के दिए महत्वपूर्ण सबूत

अयोध्या : सुप्रीम कोर्ट में छठे दिन की सुनवाई में रामलला के वकील ने मंदिर तोड़ने के दिए महत्वपूर्ण सबूत

नई दिल्ली अयोध्या मामले में आज छठे दिन की सुनवाई पूरी हो गई। बुधवार को दिन भर रामलला की ओर से वकील सीएस वैद्यनाथन ने अपनी दलीलें रखीं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 16 अगस्त को होगी। उस रोज भी रामलला की ओर से दलीलें रखीं जाएंगी।

वैद्यनाथन ने स्कंद पुराण का जिक्र करते हुए कहा कि रिवाज है कि सरयू नदी में स्नान करने के बाद रामजन्मभूमि के दर्शन का लाभ मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि ये पुराण कब लिखा गया? वैद्यनाथन ने कहा कि यह पुराण वेद व्यास द्वारा महाभारत काल में लिखा गया था, कोई यह नहीं जानता कि यह कितना पुराना है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, जो आप कह रहे हैं उसमें रामजन्मभूमि के दर्शन के बारे में कहा गया है देवता के बारे में नहीं? तब वैद्यनाथन ने कहा कि वह इसलिए क्योंकि जन्मस्थान खुद में ही एक देवता है। फ्रेंच ट्रेवलर विलियम पिंच 1608- 1611 के बीच अयोध्या गए थे और उन्होंने किसी मस्जिद की उपस्थिति की बात नहीं कही, दूसरे यात्री जोसफ टाइपन बैरल ने अपनी किताब में राम जन्म भूमि का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि विभिन्न यूरोपीय यात्रियों की पुस्तकों के संस्करणों से यह सवाल उठता है कि किसने कथित तौर पर मंदिर को ध्वस्त किया था, इस बात में मतभेद है कि बाबर और औरंगजेब में किसने मंदिर ध्वस्त किया, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि यह सन 1786 से पहले ध्वस्त हो गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाबरनामा में इस बारे में कोई जिक्र नहीं है। तब वैद्यनाथन ने कहा कि हां, बाबर ने अपने फौजी कमांडर को आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा इसका क्या सबूत है, वैद्यनाथन ने कहा कि शिलालेख जिस पर पर्याप्त संदेश लिखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि मस्जिद को बाबरी मस्ज़िद कब कहा जाने लगा? वैद्यनाथन ने कहा ये 19वीं सदी में कहा गया। उससे पहले इस बात के कोई सबूत या साक्ष्य नहीं हैं कि मस्जिद को बाबरी मस्जिद कहा गया हो। इस पर मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई कि बाबरनामा में अयोध्या को लेकर कुछ नहीं लिखा गया। उन्होंने कहा कि बाबर द्वारा बाबरी मस्जिद बनाये जाने का पहला उल्लेख 1838 में मोंट्गोमेरी मार्टिन की किताब में मिलता है। वैद्यनाथन ने कहा कि दस्तावेजों के आधार पर ये साबित होता है कि वहां जन्मस्थान था और मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया ।

सी एस वैद्यनाथन ने राम जन्मभूमि की प्रामाणिकता साबित करने के लिए 1854 में प्रकाशित गजेटियर का भी हवाला दिया। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने वैद्यनाथन की ओर से दिये गए गजेटियर के हवाले की प्रामाणिकता के बारे में सवाल किया। वैद्यनाथन ने जवाब दिया कि वो कोर्ट रिकॉर्ड का हिस्सा रहे हैं। वैद्यनाथन ने पुरातत्व विभाग की 1863, 1864, 1865 की रिपोर्ट का हवाला दिया। उन्होंने एलेग्जेंडर कुनिंगहम की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि एलेग्जेंडर ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ईसा मसीह की जन्म से पहले राजा विक्रमादित्य ने अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण किया था।

सुनवाई के दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि परिस्थिति से लगता है कि वहां हिन्दू, मुस्लिम, बुद्ध और जैन धर्म का प्रभाव रहा है। जिस पर वैद्यनाथन ने कहा कि इन धर्मों का प्रभाव था, लेकिन जन्मभूमि पर हिंदू धर्म का पुनर्जीवन हुआ। एक बात जो थी जो हमेशा स्थिर रही वो थी राम जन्मभूमि के लिए लोगों की आस्था और उनका विश्वास। वैद्यनाथन ने कहा कि गुप्त काल यानी ईसा पूर्व 6ठीं सदी से लेकर उत्तर मध्य युग तक।

वैद्यनाथन ने रामजन्मभूमि की सर्वकालिक महत्ता और महात्म्य को बताया। उन्होंने कहा कि कभी साकेत के नाम से मशहूर नगर ही अब अयोध्या है। यहीं सदियों से लोग राम के प्रति श्रद्धा निवेदित करते रहे हैं। यहां तक कि बौद्ध, जैन और इस्लामिक काल में भी श्रद्धा के स्रोत का ये स्थान राम जन्मस्थान के रूप में ही लगातार प्रसिद्ध रहा। इस लोकश्रद्धा की वजह से ही सनातन हिन्दू धर्म पुनर्जागरण हुआ। इस विवादित स्थान पर हमारे दावे का आधार भी यही है कि ये पूरा स्थान ही देवता है, लिहाज़ा इसका दो तीन हिस्सों में बंटवारा नहीं हो सकता।

वैद्यनाथन ने चीनी विद्वान फ़ाह्यान का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने भी अयोध्या की यात्रा की थी और अपने यात्रा वृत्तांत व यात्रा से संबंधित किताब में अयोध्या राम जन्मभूमि का जिक्र किया था। साकेत का इतिहास जो 600 बीसी में लिखा गया है, उसमें भी श्रीराम और उनके वंशज का जिक्र है। इसमें साकेत को कौशल साम्राज्य का हिस्सा बताया गया है। राजा विक्रमादित्य ने तक़रीबन 368 मंदिरों का निर्माण कराया था जिसमें भगवान राम का जन्मस्थान भी है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बोब्डे ने विवादित स्थल पर शिया और सुन्नी के बीच के मतभेद के बारे में पूछा कि विवादित ज़मीन पर सुन्नी पक्ष का क्या रुख था। इस पर मुस्लिम पक्ष की ओर से राजीव धवन ने कहा कि यह 1945 का मामला था और 1989 के मुक़दमे को प्रभावित नहीं करता, इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का ज़िक्र भी किया।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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