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देश को खोखला करते आंदोलन

लेखिका वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार और द फाइनेंशियल एक्सप्रेस की पूर्व एसोसिएट एडिटर हैं

देश को खोखला करते आंदोलन

- योगिता पाठक (लेखिका वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार और द फाइनेंशियल एक्सप्रेस की पूर्व एसोसिएट एडिटर हैं)

देश में विभिन्न मुद्दों को लेकर आंदोलन होना कोई नयी बात नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में आये दिन किसी न किसी मुद्दे पर आंदोलन होते रहते हैं। इनमें से कई आंदोलन हिंसक भी हो जाते हैं, जिसमें आंदोलनकारी सार्वजनिक संपत्तियों के साथ ही निजी संपत्ति का भी काफी नुकसान करते हैं। आमतौर पर आंदोलनकारियों की हिंसा का सबसे अधिक नुकसान सार्वजनिक संपत्तियों पर ही पड़ता है। इसके अलावा आंदोलन के कारण बाजार भी ठप हो जाते हैं, जो अर्थव्यवस्था के तमाम कारकों को प्रभावित करते हैं। आमतौर पर ऐसे आंदोलन कुछ दिन सुर्खियों में रहते हैं और फिर लोग उन्हें भूल जाते हैं। लेकिन आपको ये जानकर हैरत होगी कि ऐसे आंदोलनों की वजह से देश को पिछले चार सालों के दौरान प्रति व्यक्ति सवा से डेढ़ लाख रुपये का नुकसान हो चुका है।

इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस ने देश के 163 देशों का अध्ययन करने के बाद अपनी जो रिपोर्ट दी है, उसके मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था को ऐसे हिंसक आंदोलनों की वजह से सिर्फ 2017 में ही 1190 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है। रुपए के संदर्भ में देखा जाए तो 2017 में आंदोलनकारियों के हिंसा की वजह से 80 लाख करोड़ से अधिक की संपत्ति नष्ट हो गई। यह संपत्ति कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस नुकसान का यदि प्रति व्यक्ति नुकसान के रूप में आकलन किया जाये, तो आंदोलन जनित हिंसा के कारण देश के हर नागरिक को लगभग 40 हजार रुपये का नुकसान हुआ है। यानी 2017 में आंदोलन की हिंसा के कारण ही हर व्यक्ति के हिस्से के लगभग 40 हजार रुपये डूब गए। सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में देखें तो देश को जीडीपी के नौ फीसदी के बराबर नुकसान झेलना पड़ा।
यह एक सच्चाई है कि भारत में आम लोग को नियमित तौर पर समाज में कई बार संघर्षों के गवाह बनते हैं। जातीय, धार्मिक और राजनीतिक वजहों को लेकर होने वाले ऐसे संघर्ष कई बार भयावह रुप ले लेते हैं। हालांकि हर संघर्ष या आंदोलन का हिंसा के साथ ही अंत होना जरूरी नहीं है, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि कई आंदोलन हिंसक हो जाते हैं। इस दौरान न केवल जमकर तोड़फोड़ की जाती है, बल्कि आगजनी की भी कई घटनाएं होती हैं। चिंता की बात तो यह है कि भारत में ज्यादातर हिंसक आंदोलन जातीय और धार्मिक वजहों को लेकर ही होते हैं।
ऐसे आंदोलनों की कोई नीति या कोई सिद्धांत नहीं होता। इनमें सिर्फ उन्माद की भावना होती है, जो देखते ही देखते बड़ी घटना के रूप में तब्दील हो जाती है। कुछ समय पहले ही सरकार द्वारा आरक्षण खत्म करने की कोशिश की झूठी खबर फैला कर देश के कई हिस्सों में जातीय राजनीति करने वाली पार्टियों और संगठनों ने हिंसक आंदोलनों को हवा दी। इनमें कई लोगों की जान भी गयी, जबकि सार्वजनिक संपत्ति को भी जमकर नुकसान पहुंचाया गया। इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस का आकलन है कि इन जातीय आंदोलनों में जितनी तबाही हुई, अगर सिर्फ उसे ही टालने में सफलता मिल जाती तो जीडीपी के सात फीसदी तक के नुकसान से बचा जा सकता था।
कर्नाटक में हुए भाषा आंदोलन ने भी पूरे राज्य में हिंसक प्रदर्शनों को हवा दी। इस दौरान कई बसों को आग के हवाले कर दिया गया, सार्वजनिक संपत्तियों को तोड़ा और नष्ट किया गया। इसी तरह अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर इस तरह के आंदोलन होते रहे हैं। ऐसे तमाम आंदोलनों की अलग-अलग वजह गिनाई जा सकती हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि इस तरह के सारे आंदोलन अंततः देश के खजाने के लिए भारी पड़ते हैं, जिसकी भरपाई आम करदाताओं से टैक्स की वसूली करके या फिर विकास की किसी योजना में होने वाले निवेश को रोककर ही किया जाता है। ये वो पैसा होता है, जो देश में ढांचागत विकास के काम आ सकता था, जिनसे नयी सड़कें बनाई जा सकती थीं, रेल पटरियां बिछाई जा सकती थीं, अस्पताल और स्कूल बनाए जा सकते थे। लेकिन ये पैसा आंदोलनों में बर्बाद हुई संपत्ति को फिर से तैयार करने में खर्च हो जाता है, जिसका परिणाम प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से देश के हर नागरिक को भुगतना पड़ता है।
राजनीतिक वजूद को मजबूत करने और अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए जिस तरह से पिछले चार वर्षों के दौरान उन्मादी आंदोलनों को भड़काने की कोशिश की गई है, उससे देश को काफी नुकसान हुआ है। अनुमान लगाया जा सकता है कि जब एक साल (2017) में ही प्रति व्यक्ति देश को 40 हजार रुपये का नुकसान हो चुका है, तो पिछले चार वर्षों का आंकड़ा कितना बड़ा हो सकता है। इंस्टिट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस की ताजा रिपोर्ट को आधार माना जाये, तो प्रति व्यक्ति नुकसान का यह आंकड़ा पिछले तीन वर्षों में लगभग बराबर रहा है, जबकि 2014 में यह लगभग 22 हजार रुपये था। स्वाभाविक तौर पर कहा जा सकता है कि पिछले चार सालों में राजनीतिक और जातीय संगठनों ने अपना वजूद बनाए रखने के लिए उन्मादी हिंसा का सहारा लेकर देश के हर व्यक्ति को सवा से डेढ़ लाख रुपये तक का नुकसान करा दिया है। यह राशि तब और विशाल नजर आने लगती है, जब इसका आकलन जीडीपी के संदर्भ में किया जाता है। पिछले चार सालों में देश को हिंसक आंदोलनों की वजह से 2017 की जीडीपी के लगभग 32 फीसदी (प्रति वर्ष औसतन आठ फीसदी) का नुकसान उठाना पड़ा है।
कोई भी देश तभी आगे बढ़ सकता है, जब उस देश की जनता खुद सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा के प्रति तत्पर हो। सार्वजनिक संपत्ति का संरक्षण न भी किया जाये, लेकिन उसे नष्ट होने से बचा ही लिया जाये, तब भी देश में विकास को अपेक्षित गति दी जा सकती है। यह विकास हर समुदाय, हर पंथ और हर जाति के लोगों का होगा। लेकिन, जातीय या धार्मिक उन्माद की वजह से होने वाले आंदोलन का नुकसान देश के हर वर्ग, हर समुदाय, हर पंथ और हर जाति समूह को झेलना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि हम व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में विचार करना शुरू करें, तभी देश को विकास की अपेक्षित गति प्राप्त हो सकती है और देश एक बार फिर सोने की चिड़िया बनने की ओर अग्रसर हो सकता है। भारत फिलहाल दुनिया की तीसरी सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था है। अगर इसमें आंदोलन जनित हिंसा की वजह से होने वाले नुकसान को ही बचा लिया जाये, तो कोई शक नहीं कि आने वाले कुछ दिनों में अपना देश दुनिया की सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

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Swadesh Digital ( 0 )

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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