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नवरात्रि का द्वितीय दिवस - शबरी : धैर्य धारण की प्रतिमूर्ति

महिमा तारे

नवरात्रि का द्वितीय दिवस - शबरी : धैर्य धारण की प्रतिमूर्ति

जब-जब भक्ति में धैर्य की बात आती है तब-तब भक्त शबरी मां का अनुसरण करते दिखाई देते हैं। भक्तों को शबरी के धैर्य की कथा सुनी और सुनाई जाती रही है।

शबरी कौन थी। शबरी का असली नाम श्रमणा था। वह भील समुदाय के शबर जाति से सम्बन्ध रखती थी। इसलिए शबरी कहलाई। उनके पिता भील समुदाय के मुखिया थे। उनका विवाह एक भील कुमार से तय हुआ। तत्कालीन समाज में विवाह के समय सौ पशुओं की बलि दी जाने की परम्परा थी। वह पर्यावरण प्रेमी भी थी। वह विवाह के ठीक एक दिन पहले घर से भाग कर दण्डकारण्य में पहुंच गई मतंग ऋषि के आश्रम में। वह ऋषि की सेवा करना चाहती थी पर भील होने के चलते वह डर रही थी कि कहीं ऋषि उन्हें मना न कर दें। अत: उसने छिप कर आसपास के क्षेत्र नदी वन क्षेत्र में पर्यावरण हित के लिए कई कार्य किए एक बार मतंग ऋषि की नजर उन पर पड़ी। वह प्रसन्न हुए। शबरी राम भक्त थी। ऋषि ने आशीर्वाद दिया कि राम इसी आश्रम में तुमसे मिलने आएंगे।

जटायू द्वारा राम को बताया जाना कि सीता का हरण रावण ने किया है और रावण सीता को दक्षिण दिशा में लेकर गया है। राम और लक्ष्मण का सीता की खोज में दण्डकारण्य में भटकते समय कबन्ध राक्षस का नाश करना और कबन्ध द्वारा शबरी और सुग्रीव के बारे में बताना। राक्षस द्वारा मतंग ऋषि के आश्रम का पता देना और शबरी राम की प्रतीक्षा में कैसे दिन गुजार रही है। इसका वर्णन हम पढ़ेंगे तो शबरी की प्रतीक्षा, उसका धैर्य समझ में आएगा। मतंग ऋषि का आश्रम पम्पा सरोवर के निकट था। जब राम और लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम में पहुंचते हैं तो आश्रम की सुन्दरता देखकर विस्मित हो जाते हैं। धने जंगलों के बीच यह आश्रम था। मतंग ऋषि को देवलोक गए 13 वर्ष हो चुके थे। इतने बड़े आश्रम की देखभाल शबरी ही करती आ रही थी। यह श्रीराम को बताती है कि महर्षि मतंग जाते हुए कह कर गए थे कि इस परम पवित्र आश्रम में श्रीरामचन्द्र जी पधारेंगे और लक्ष्मण के साथ तेरे अतिथि होंगे।

राम शबरी को बार-बार तपोधने कह कर सम्बोधित कर रहे हैं। ऐसा वर्णन वाल्मीकि रामायण में मिलता है। उन्हें विज्ञान का भी ज्ञान था ऐसा भी वाल्मीकि रामायण में वर्णन है। राम शबरी से उसकी साधना के बारे में पूछते हैं। कुछ प्रश्न भी करते हंै क्या तुमने अपने सारे विघ्नों पर विजय पा ली है। क्या तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है? क्या तुमने क्रोध और आहार पर विजय पा ली है। तुम्हारे मन में सुख शांति है न? तुमने जो नियम स्वीकार किए हैं वे निभ जाते हंै न? इसके उत्तर में शबरी कहती है। हे रघुनन्दन आज आपके दर्शन मिलने से ही मुझे अपनी तपस्या में सिद्धि प्राप्त हुई है। आज मेरा जन्म सफल हुआ और अब मैं इस शरीर का त्याग करूंगी और अपने गुरुजन ऋषियों के दिव्य लोक में जाना चाहूंगी। उत्तर में राम कहते हैं हे कत्याणी अब जहां तुम्हें सुख की अनुभूति हो वहां जाओ और शबरी समाधिस्थ हो आत्म योग से अनंत में विलीन हो जाती है।

उनके स्वर्ग जाने के पूर्व राम शबरी को नवधा भक्ति का ज्ञान देते हैं और कहते हैं पहली भक्ति है संतों का साथ दूसरी है जहां ईश्वर का नाम लिया जा रहा हो इसमें रुचि, तीसरी भक्ति है अभिमान रहित होकर गुरु के चरणकमलों की सेवा, चौथी भक्ति है कपट छोड़कर ईश्वर के गुण समूहों का मान करना। मेरे मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास यह पांचवीं भक्ति है जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह। सातवीं भक्ति है जगत को समभाव से देखना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए उसी में संतोष करना। नौवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना। हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य का न होना इन नौ भक्ति में से यदि कोई एक भी होती है तो वह स्त्री या पुरुष मुझे प्रिय है।

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