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गांधी के विचारों को भी आत्मसात कीजिए

गांधी के विचारों को भी आत्मसात कीजिए

कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के विचार ही उसका व्यक्तित्व बनाते हैं। जैसा व्यक्ति होगा, उसका व्यक्तित्व भी वैसा ही बनेगा। समाज को प्रेरणा देने वाले विचार रखने वाले व्यक्ति लम्बे समय तक स्मरण किए जाते हैं। मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी भी भारत के ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्हें हम उनकी अच्छाइयों के लिए स्मरण करते हैं। लेकिन सवाल यह आता है कि भारत के जो राजनीतिक दल महात्मा गांधी के नाम का उपयोग करते हैं, वह गांधी को कितना जानते हैं? ऐसा लगता है कि उन्हें गांधी विचार के सिद्धांत का पहला पाठ भी ठीक तरह से याद नहीं होगा। उनके जीवन में गांधी के विचारों का दर्शन दिखाई नहीं देता। जब विचारों को ही तिलांजलि दी जा रही हो, तब हम यह कैसे कह सकते हैं कि गांधी आज भी प्रासंगिक हैं? गांधीजी देश में राम राज्य की कल्पना को साकार करने का सपना पाले हुए थे। इससे यह भी प्रमाणित हो जाता है कि गांधीजी भगवान राम की शासन प्रणाली को ही देश में स्थापित करना चाहते थे। लेकिन आज की कांग्रेस तो भगवान राम के अस्तित्व को ही नकारने का कृत्य कर चुकी है। ऐसे में यही कहा जाएगा कि आज के कांग्रेस नेता गांधी के नाम पर केवल राजनीति करते हैं, उन्हें गांधी के विचार से कोई मतलब नहीं।

देश में महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे के नाम पर जमकर राजनीति की जा रही है। कोई कह रहा है कि गोडसे देशभक्त हैं तो कोई उसे आतंकवादी मानने की वकालत कर रहा है। नि:संदेह नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी का वध करके अत्यंत निंदनीय कृत्य किया है। लेकिन, सवाल यह है कि गोडसे को कोसने वाले भारतीय कितने गांधीभक्त हैं? उन्होंने गांधीजी के विचार को कितना अपनाया? यह प्रश्न इसलिए भी उठ रहा है, क्योंकि गांधीजी एक गाल पर चांटा मारने वाले व्यक्ति के सामने दूसरा गाल भी सामने कर देने का भी विचार रखते थे। ऐसे में यही कहना तर्कसंगत हो सकता है कि नाथूराम गोडसे के गोली मारने के बाद भी अगर गांधी जीवित बच जाते तो हो सकता है कि वे गोडसे को माफ कर देते। हालांकि ऐसा लिखने के पीछे हम किसी भी प्रकार से गोडसे का समर्थन नहीं कर रहे हैं। क्योंकि, गांधीजी को मारना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। गोडसे ने गुनाह किया तो उसे उसकी सजा भी मिल गई है।

अभी हाल ही में संसद भवन में गांधी और गोडसे को लेकर जिस प्रकार से हंगामा किया गया, उसे राजनीतिक दलों का पूर्वाग्रह कहा जा सकता है। जहां तक भाजपा की बात है तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गांधी के सिद्धांतों को अपनाने की जोरदार अपील करते हैं। उनकी सरकार गांधी के बताये रास्ते पर चलती दिखती है। मोदी ने गांधी की स्वच्छता को देशभर में घर-घर पहुंचाया। हर घर में शौचालय के लिए अभियान चलाया। उनकी सरकार में अबतक किसी पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा। उन्होंने तीन तलाक खत्म कराकर मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हक दिलाया। जम्मू-कश्मीर में भेदभाव वाला अनुच्छेद-370 और 35 ए समाप्त कर 'एक देश, एक कानून और एक निशान' को अमल में लाया। लेकिन कांग्रेस गांधी के नाम पर राजनीति करती आई है। उसे गांधी के विचारों से कतई सहानुभूति नहीं है। अगर ऐसा होता तो गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध का विचार रखने वाले गांधीजी के अनुयायी गोहत्या का समर्थन नहीं करते। हमें स्मरण होगा कि केरल के कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गोहत्या को सही ठहराते हुए बीच सड़क पर गोवध किया था और उसका मांस खाया था। यह एक प्रकार से गांधी के विचार का अपमान ही कहा जा सकता है।

इसी प्रकार धर्मांतरण के मामले पर भी महात्मा गांधी की स्पष्ट राय थी कि देश का कोई हिन्दू जब किसी अन्य धर्म में जाता है तो वह केवल धर्मांतरण ही नहीं करता, बल्कि देश का दुश्मन बन जाता है। उनका यह संदेश ईसाईयों द्वारा चलाए जा रहे धर्मांतरण की ओर था। वर्तमान में कांग्रेसी नेताओं के संरक्षण में विदेशी अनुदान प्राप्त करने वाले चर्च-मिशनरी खुलेआम धर्मांतरण कर रहे हैं। यहां तक कि भारत में चलने वाले चर्च के पादरी खुलकर कांग्रेस का समर्थन करते दिखाई देते हैं। यह क्या गांधी के विचार का अपमान नहीं है? यह निश्चित ही गांधी के विचारों का अपमान ही कहा जाएगा। विसंगति यह भी है कि देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद महात्मा गांधी एक ऐसे भारत का निर्माण करने की इच्छा रखते थे, जहां अमीर और गरीब का कोई भेद न हो। लेकिन, क्या ऐसा दिखाई दे रहा है? देश में लम्बे समय तक केन्द्रीय सत्ता को संभालने वाली कांग्रेस ने गांधीजी के विचारों को कितनी प्राथमिकता दी? अगर इसका अध्ययन किया जाए तो स्वाभाविक रुप से यही कहा जाएगा कि कांग्रेस ने ही गांधी के विचारों की हत्या की है।

गांधीजी शराब और भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी बुराई के रुप में देखते थे। अगर कांग्रेस गांधीजी के सिद्धांतों का पालन करती तो निश्चित ही वह भ्रष्टाचार को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाती। लेकिन, देश ने देखा कि कांग्रेस की सरकारों के समय जमकर भ्रष्टाचार हुआ। वर्तमान में भी उसके प्रमाण मिल जाते हैं, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। इन आरोपों में वह जमानत पर चल रहे हैं। इसी प्रकार कांग्रेस की सरकार में गृहमंत्री और वित्तमंत्री की जिम्मेदारी निभाने वाले पी. चिदम्बरम भ्रष्टाचार के आरोप में 106 दिन बाद तिहाड़ जेल से जमानत पर छूटे हैं। डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में अनेक घोटालों का पर्दाफाश हुआ। जिसके कारण उनके कई मंत्रियों को अपना त्यागपत्र भी देना पड़ा। इस प्रकार के कृत्य क्या महात्मा गांधी के सिद्धांतों का अपमान नहीं था? वास्तव में हम स्वार्थ की राजनीति करते हुए महात्मा गांधी के सिद्धांतों को पूरी तरह से त्याग कर चुके हैं। इसे सीधे अर्थों में कहा जाए तो यह कहना समुचित ही होगा कि विचारों से हम सबके बीच जीवित रहने वाले महात्मा गांधी के विचारों को हम आत्मसात नहीं कर रहे हैं, तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि गांधीजी हमारे बीच विचारों के रुप में जीवित हैं?

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सुरेश हिंदुस्तानी ( 0 )

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