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आसान नहीं है अमिताभ बनना

अतुल तारे

आसान नहीं है अमिताभ बनना

अमिताभ बच्चन, आज इस संज्ञा के विश्लेषण के लिए हिंदी साहित्य में कौन सा शब्द उपयुक्त होगा, इसके लिए वाकई थोड़ा ठहरना पड़ता है। जैसे ही आप ठहरते हैं और ज्यादा ऊहापोह में खुद को पाते हैं। जीवित किवदंती जैसे शब्द की जरूरत शायद यहीं पड़ती है। आज जिनकी उम्र 90 के लगभग है, वह भी धुंधली आंखों से अभिमान के अमित को देखकर रोमांचित होते हैं और वो भी जो 45 से 50 के बीच हैं, दीवार के विजय को देखकर कहते हैं, खुश तो बहुत होगे तुम। और वो भी जो आज की नई पीढ़ी है, जिसने कंप्यूटर को घर-घर में कंप्यूटर जी कह कर हिंदी को उसकी अहमियत दी। वाकई एक साथ तीन नहीं, अब तो चौथी पीढ़ी भी आ गई है और महानायक का जादू बरकरार है।

प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रकाश मेहरा के शब्दों को चुराऊं तो वह कहते थे कि अमिताभ बारिश की एक ऐसी बूंद है जो सदियों में एक बार बरसती है। और क्या आज यह उपयुक्त अवसर नहीं है कि हम अमिताभ बच्चन के कहे विचार उन्हीं के लिए कहें, जो उन्होंने स्वर कोकिला लता मंगेशकर के लिए कहे थे। आपने कहा था कि हम सौभाग्यशाली हैं कि हम यह कह सकते हैं कि हम उस काल खंड में जी रहे हैं, जब साक्षात लताजी को देख रहे हैं। आज जब इस विभूति को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की घोषणा हुई है तो क्या यही अनुभव देश नहीं कह रहा, विचार करें।

स्वयं अमिताभ ऐसा नहीं मानते और विनयशीलता उनका आभूषण है। वह कहते हैं कि वह स्वयं सही समय पर गलत व्यक्ति थे। एक शून्य उभर ही रहा था, ठीक उसी समय पर फिल्मी पर्दे पर वह आए। विस्तार से वह बताते हैं कि फिल्मी दुनिया में राजकपूर, दिलीप कुमार और देवानंद की एक तिकड़ी ने लंबे समय तक राज किया। इधर फिर एक चमकता सितारा राजेश खन्ना के रूप में आया, जिसने युवा धड़कनों को रूमानी किया। आगे राजेश खन्ना ने खुद को थोड़ा पर्दे से दूर रखा। जगह खाली थी, दर्शकों ने उन्हें प्यार दिया। यह अमिताभ की शब्दों की जादूगरी है, ठीक ठीक ऐसा नहीं।

अमिताभ का सफर, आसान सफर नहीं है। एक बार नहीं वह बार-बार ठुकराए गए और बुरी तरह से। आज उनकी आवाज दशकों से राज कर रही है, पर यह भी आकाशवाणी में खारिज हुई। माधुरी पत्रिका ने नायकों के लिए फोटो मंगाए थे। पेड़ पर हाथ खड़े कर इस दुबले पतले नौजवान को पहले ही दौर में बाहर कर दिया गया। 1969 में उनकी आवाज आई मृणाल सेन की फिल्म भुवन शेम में। फिर आई सात हिन्दुस्तानी, जो पर्दे पर अमिताभ की पहली फिल्म थी। नोटिस लिए गए पर फिल्म नहीं चली। यहां से चला फिर एक असफलता का दौर। एक समय आया कि वह मुंबई, तब की बंबई को छोडऩा चाहते थे, पर महमूद ने सहारा दिया। इतिहास बनने के पल आ रहे थे। आनंद के बाबू मोशाय ने जगह बनाई और आ गई जंजीर। देश का यह काल खंड आक्रोश का भी था। भ्रष्टाचार, अवसरवादिता के खिलाफ युवा बेचैन था। फिल्मी दुनिया में एक एंग्री यंग मैन की दस्तक हो रही थी। जंजीर के विजय ने उस युवा को स्वर दिया, जो एक साथ सब बदलना चाहता है। यहां से अमिताभ ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और फिल्म उद्योग को एक नया शब्द मिला वन मेन इंडस्ट्री।

आज की पीढ़ी मल्टीप्लेक्स, सिनेप्लेक्स की है। वह नहीं जानती कि दोपहर के 12 बजे के शो के लिए सुबह 7 बजे से कैसे लाइन लगती है। और अमिताभ थे कि कालिया में गूंज रहे थे मैं जहा खड़ा होता हू लाइन वहीं से शुरू होती है। दौर चला और खूब चला। 1982 में कुली की दुर्घटना ने देश ने अमिताभ के प्रति क्या दीवानगी थी, महसूस की। नायक मौत के मुंह से लौटा। 1984 में अपने मित्र राजीव गांधी के कहने पर वह राजनीति में आए और गंगा किनारे का छोरा संसद पहुंचा, पर जिंदगी फिल्मी पर्दा नहीं होती। फिल्मों का नायक राजनीति में इन्कलाब तो ला ही नहीं पाया, बोफोर्स के दाग भी लगवा बैठा। अमिताभ जो पर्दे पर चुनौतियों से टकराते रहे, असल जिंदगी में भागे और राजनीति को घोषित तौर पर अलविदा किया। घोषित इसलिए कि वह कभी सपा के मंचों पर दिखे तो कभी सुविधा के लिहाज से कांग्रेस, भाजपा से दूरी और निकटता दिखाई। खैर... अमिताभ के इस पक्ष की चर्चा फिर कभी।

लेकिन यह सच है कि 1984 के बाद इस महानायक ने असफलता का एक लंबा दौर फिर देखा। लेकिन यह मोहब्बतें से फिर पर्दे पर आया और कभी खुशी कभी गम बिखेरते हुए आज भी घर-घर में 7वीं बार करोड़पति बनने के सपने दिखा रहा है। कौन बनेगा करोड़पति के माध्यम से अमिताभ ने एक और योगदान दिया है, जिसे आज रेखांकित किया जाना चाहिए। हिंदी भारत की आत्मा है, एक सुहागन की माथे की बिंदी है। महानायक ने पूरे विश्वास एवं सरसता के साथ जिस प्रकार हिंदी को बोधगम्य बनाया है, वह वाकई अभिनंदनीय है।

आज अमिताभ के पास सब कुछ है। धन, ऐश्वर्य, प्रसिद्धि, यश ऐसा कि आसपास कोई नहीं, पर उम्र के इस पड़ाव पर आज वह 77 के हैं, पर सीखने की इच्छा सात साल के बच्चे जैसी। अभिनय के प्रति ऐसा अदभुत समर्पण, समय के प्रति आज भी सख्त अनुशासन और अनुकरणीय शालीनता उन्हें आज भी एक वैशिष्ट्य प्रदान करती है। यह सच है कि एंग्री यंग मैन के दौर में चुपके-चुपके का प्रोफेसर सुकुमार सिन्हा, मिली का वह रूमानी संजीदा युवा शेखर, अभिमान का वह घुटता नायक सुबीर कुमार कहीं खो गया। कारण अभिनय क्षमता में वह बेमिसाल है, यह वह ब्लैक और पीकू में दिखा चुके हैं। उस दौर में भी वह कुछ बेहतरीन फिल्में और कर सकते थे, पर खुशी है वह आज कर रहे हैं। बस ऐसा न करे कि दर्शक निशब्द हो जाएं और दुखी भी। कारण वह अपने महानायक को पूजते भी हैं और ऐसा कलाकार सिर्फ कलाकार नहीं है, यह अमिताभ को समझना होगा।

अंत में अमित जी, खूब शुभकामनाएं। यह आंखें भी चार दशक से आपको देख देख कर बड़ी हुई हैं। आप अभिनय अच्छा करते हैं, यह हम पर्दे पर देख रहे हैं। पर रील से हटकर रियल लाइफ में आप अभिनय से थोड़ा दूरी रख कर कुछ सच के साथ सामने आते हैं तो यह भी देश के प्रति आपके कर्तव्य की श्रेणी में आता है। एक महानायक, एक सदी के महानायक को इतना मौन शोभा नहीं देता।

- पुन: शुभकामनाएं।

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