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शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती का उत्तर प्रदेश से रहा गहरा नाता

शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती का उत्तर प्रदेश से रहा गहरा नाता

लखनऊ। कांची कामकोटि पीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती का उत्तर प्रदेश से गहरा नाता रहा है। उन्होंने तीर्थराज प्रयाग में संगम के तट पर विशाल शंकर विमान मण्डपम का निर्माण कराया। अयोध्या विवाद को भी वह आपसी सहमति के आधार पर हल करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई बार प्रदेश का दौरा भी किया और मुस्लिम धर्मगुरुओं से भी मुलाकात की थी।

शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती ने अपने कांची कामकोटि मठ की तरफ से तीर्थराज प्रयाग (इलाहाबाद) में संगम के किनारे एक विशाल मंदिर बनवाया है, जिसे शंकर विमान मण्डपम् कहा जाता है। चार मंजिलों वाले इस मंदिर का निर्माण दक्षिण भारत के स्थापत्य कला में किया गया है। वर्ष 1970 में शुरू हुआ इस मंदिर का निर्माण कार्य 16 साल बाद 1986 में पूरा हुआ था। प्रयाग आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए शंकर विमान मण्डपम् आस्था का प्रमुख केंद्र होता है। जगद्गुरु शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती भी करीब हर साल प्रयाग आते थे और इस मंदिर में भी कुछ समय व्यतीत करते थे।

अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि विवाद को लेकर भी शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती काफी सक्रिय रहते थे। इस विवाद को वह आपसी सहमति के आधार पर हल कराना चाहते थे। इसके लिए वह अयोध्या भी कई बार गये और दोनों पक्षों से बातचीत कर मामले का हल निकालने की कोशिश की। करीब ढाई वर्ष पहले राजधानी लखनऊ में उन्होंने सुन्नी धर्मगुरु मौलाना रशीद फरंगी महली से भी मुलाकात की थी। इस दौरान दोनों ने दो प्रमुख मुद्दों पर विशेष रूप से बात की। पहली यह कि दोनों धर्मों के बड़े धर्मगुरु किसी भी व्यक्ति को एक-दूसरे के धर्म के खिलाफ कुछ भी बोलने से रोकें। दूसरा यह कि ऐसी बैठकें होती रहनी चाहिए ताकि दोनों धर्म के लोग मिल-जुलकर रहें और आपसी भाई चारा बना रहे।

इस मौके पर शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा था कि जब तक हर कोई मिलकर साथ नहीं रहेगा, देश में शांति कायम नहीं होगी। उन्होंने यह भी बताया था कि उनके मठ की दीवार से एक मस्जिद लगी हुई है, लेकिन आज तक कोई बवाल या संघर्ष नहीं हुआ है। ऐसे में आपसी भाई चारे की यह मिसाल पूरे देश में दिखाई देनी चाहिए।

विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) का तृतीय धर्म संसद तीर्थराज प्रयाग में वर्ष 1989 में कुम्भ के अवसर पर हुआ था। इसी धर्म संसद में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का प्रारूप स्वीकृत किया गया था। साथ ही श्रीराम जन्मभूमि के प्रश्न को अयोध्या और उत्तर प्रदेश की सीमा से बाहर निकालकर देशव्यापी बनाने तथा राम मंदिर के शिलान्यास के लिए देश के प्रत्येक ग्राम से पूजित एक-एक श्रीरामशिला और प्रत्येक हिन्दू से सवा-सवा रुपया भेंट स्वरूप लेने का निर्णय किया गया था। इसके अलावा इलाहाबाद नगर के लिए सभी जगह ‘प्रयाग‘ नाम का प्रयोग करने और अक्षयवट को जनता के दर्शन, पूजन और अर्चन के लिए खोल दिये जाने का निर्णय भी लिया गया था। इस धर्म संसद के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती ने ही की थी। प्रसिद्ध संत देवराहा बाबा समेत देशभर से करीब 3000 सन्त-महात्मा और धर्माचार्य इसमें सम्मिलित हुए थे।


गौरतलब है कि कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती महाराज का चेन्नई के कांचीपुरम स्थित एक निजी अस्पताल में बुधवार सुबह निधन हो गया। वह करीब 83 साल के थे। शंकराचार्य को सांस लेने में आ रही दिक्कत के बाद अस्पताल में भर्ती किया गया था। जयेन्द्र सरस्वती वर्ष 1954 में कांची कामकोटि पीठ के 69वें शंकराचार्य बनाये गये थे। सन् 1983 में उन्होंने शंकर विजयेन्द्र सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। अब विजयेन्द्र सरस्वती ही कांची कामकोटि पीठ के अगले शंकराचार्य होंगे। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी समेत कई संतों और राजनेताओं ने शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।

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