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तीन तलाक पर कांग्रेसी दर्शन - अटकाओ, भटकाओ और लटकाओ

तीन तलाक पर कांग्रेसी दर्शन - अटकाओ, भटकाओ और लटकाओ

-राकेश सैन, जालंधर
(फाइल फोटो में विरोध प्रदर्शन कर रहीं महिलाएं तो चाहती है तीन तलाक बंद हो, लोकसभा में बिल पास होने के बाद भी कांग्रेस अटकाओ, भटकाओ और लटकाओ की स्थिति में दिख रहीं है)
तीन तलाक के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी अटकाओ, भटकाओ और लटकाओ के त्रिसूत्रीय दर्शनशास्त्र का पालन करती दिखाई दे रही है। देश के संसदीय इतिहास में शायद पहली बार देखने को मिल रहा है कि किसी दल ने एक विधेयक पारित करवाने के लिए लोकसभा में न केवल समर्थन दिया बल्कि सार्वजनिक चर्चा में सरकार के साथ उस विधेयक का श्रेय भी सांझा करने का प्रयास किया हो परंतु राज्यसभा में उसके नेता चमगादड़ की मुद्रा में आगए हों। कांग्रेस का यह व्यवहार नेतृत्व कुशलता पर तो प्रश्नचिन्ह लगाता ही है साथ में इस बात को भी दर्शाता है कि देश पर 6 दशक से भी अधिक शासन करने वाली पार्टी वैचारिक धरातल पर कितने दुविधाग्रस्त दौर से गुजर रही है। इसके नेता अचकन पर जनेऊ धारण कर छवि बदलने और अल्पसंख्यक तृष्टिकरण रूपी पुराना दाद खुजाने का आनंद लेने के दो विरोधाभासी काम एकसाथ करते दिख रहे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक अवैध घोषित किए जाने के बाद सरकार ने लोकसभा में इसके खिलाफ विधेयक को स्वीकृति दिलवाई और थोड़ी बहुत मीनमेख के बाद कांग्रेस सरकार के साथ आम सहमति दिखी, लेकिन अब राज्यसभा में यह लटकता दिख रहा है। लोकसभा में दिखी सहमति से लगता था कि राज्यसभा में यह आसानी से पास हो जाएगा परंतु यहां कांग्रेस पार्टी व उसके जैसे अन्य दल राज्यसभा में भाजपा के अल्पमत में होने की कीमत वसूल रहे हैं। कांग्रेस इस विधेयक को संसद की प्रवर समिति को सौंपने की मांग कर रही है। पार्टी ने यह मांग लोकसभा में भी उठाई थी परंतु सरकार ने यह कहते हुए इसे निरस्त कर दिया कि तीन पृष्ठों वाले इस विधेयक के लिए अतिरिक्त समय देना इसे लटकाने जैसा होगा। विपक्ष इस पर चर्चा या जिज्ञासा का समाधान चाहता है तो वह संसद में बहस के दौरान अपने अधिकार का प्रयोग कर सकता है। विधेयक को लोकसभा में समर्थन देने के बाद कांग्रेस का राज्यसभा में मै ना मानूं का रवैया समझ से परे है। अगर प्रवर समिति इतनी आवश्यक थी तो कांग्रेस ने लोकसभा में विधेयक को समर्थन क्यों दिया?
कांग्रेस पार्टी के नेताओं की मानें तो तीन तलाक के बाद पति के जेल जाने पर पत्नी व बच्चों के भरण-पोषण की व्यवस्था की जानी चाहिए। तर्क है कि पति के जेल में होने पर पत्नी और बच्चों को खिलाएगा। पार्टी की दूसरी मांग है कि इसे संज्ञेय अपराध से निकाल कर असंज्ञेय की श्रेणी में रखा जाए।
पार्टी यह भी चाहती है कि इसे दिवानी मामला माना जाए न कि फौजदारी। इस तरह के सुझाव देने वाले पार्टी नेताओं को ज्ञात होना चाहिए कि शादी विवाह दिवानी मामले हैं परंतु दहेज के लिए प्रताडि़त करने के अपराध पर भारतीय दंड संहिता की जो धाराएं जैसे 498-ए, 303-बी, 496 लगती वह अपराधिक मामला बनता है। हां सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट निर्देश है कि बिना जांच के केस दर्ज न हो और तक तक गिरफ्तारी न हो जब तक कि यह जरूरी न हो। तीन तलाक विधेयक में भी यही प्रावधान न्यायिक मजबूरी हंै। पत्नी की शिकायत के तुरंत बाद पति की गिरफ्तारी नहीं होगी बल्कि स्थानीय न्यायिक अधिकारी दोनों पक्षों में सुलह के प्रयास करेगा और आगे की कार्रवाई भी उसी को ही करनी है। रही बात पति के जेल जाने के बाद पत्नी व बच्चों की देखभाल की तो इस तरह की मांग उठाने वाले बताएं कि इससे पहले जब वही पति अपनी पत्नी को तीन बार तलाक-तलाक कह कर घर से निकाल देता था तो उस समय उसका भरण-पोषण कौन करता रहा होगा। तीन तलाक के आरोपी के परिवार को भरण पोषण दिया जाता है तो यह सहायता दहेज उत्पीडि़त परिवारों को भी क्यों नहीं मिलनी चाहिए। इसमें भी पति व उसके कई परिवारिक सदस्य जेल जाते हंै। क्या कांग्रेस ने अपने शासनकाल में इन परिवारों को यह सुविधा देने की कभी सोची? केवल दहेज व तलाक पीडि़त परिवार ही क्यों, कल को चोर, डाकू, बलात्कारियों सहित सभी तरह के अपराधियों के परिवार भी क्या यह मांग नहीं उठाने लगेंगे कि उनका कमाऊ सदस्य जेल में है और सरकार उनके परिवार का आर्थिक भार वहन करे। यह परिवार तर्क दे सकते हैं कि अपराध परिवार के एक सदस्य ने किया है और खमियाजा सभी सदस्य क्यों भुगतें। आखिर देश में किस तरह की निरर्थक बहस शुरू करने जा रही है कांग्रेस पार्टी? कांग्रेस के विरोध के पीछे इस विधेयक को अटकाने, भटकाने व लटकाने के अतिरिक्त कोई कारण फिलहाल तो दिखाई नहीं दे रहा है।
राजनीतिक लाभ-हानि की दृष्टि से भी देखें तो कांग्रेस का वर्तमान रवैया आत्मघाती साबित हो सकता है। भाजपा इस मुद्दे पर सुरक्षित मैदान में खेल रही है। विधेयक पारित होने या न होने दोनों परिस्थितियों में उसकी चारों अंगुलियां घी में हैं तो कांग्रेस की हालत इसके विपरीत कड़ाही में सिर होने जैसी है। विधेयक पारित होने का श्रेय भाजपा को जाने वाला है और लटका तो इसका ठीकरा कांग्रेस के सिर फूटेगा। आज से 32 साल पहले शाहबानो केस में पार्टी ने जिस तरीके से संसद में विधेयक ला कर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को शीर्षासन करवाने की गलती की लगभग वही गलती आज राज्यसभा में भी दोहराती दिख रही है। इन तीन दशकों के दौरान गंगा-जमुना में बहुत सा पानी बह चुका है और दूसरी पीढ़ी का भी परिवर्तन होने जा रहा है। मुस्लिम समाज भी पहले जैसा नहीं रहा जो गर्दन झुका कर कठमुल्लाओं की बात माना करता था। सार्वजनिक बहसों व चर्चाओं से पता चलता है कि मुस्लिम महिलाएं भी जागरुक हो चुकी हैं और जिस दिन इन जागी हुई महिलाओं ने कांग्रेस से हिसाब मांगा तो पार्टी को सिवाय बगलें झांकने को कुछ सूझने वाला नहीं होगा। जिस राजनीतिक दल ने देश को इंदिरा गांधी जैसी सशक्त प्रधानमंत्री दी और जिसकी कमान 18 साल तक सोनिया गांधी के हाथों में रही आज वह देश में लैंगिक समानता व महिला अधिकारों के विरुद्ध खड़ी दिखती है इससे ज्यादा चिंताजनक बात कोई और हो नहीं सकती।

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