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रोहिंग्या शरणार्थियों पर यथास्थिति बरकरार रखे केंद्र : सुप्रीम कोर्ट

रोहिंग्या शरणार्थियों पर यथास्थिति बरकरार रखे केंद्र : सुप्रीम कोर्ट

हमारा संविधान मानवतावादी और सुरक्षा करनेवाला : अदालत; हम नहीं चाहते कि भारत दुनिया का रिफ्युजी कैपिटल बने : केंद्र

नई दिल्ली। रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वे रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने के आरोपों पर जवाब दें। कोर्ट ने इस मसले पर अगली सुनवाई तक यथास्थिति बहाल रखने का आदेश दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वो सरकार की रोहिंग्या मुसलमानों से निपटने के लिए केंद्र की नीति के बारे में 7 मार्च तक सूचित करें। मामले की अगली सुनवाई 7 मार्च को होगी। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस बात को नोट किया कि किसी भी शरणार्थी को निलंबित नहीं किया गया है। आज सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि उसने किसी भी शरणार्थी को अब तक निलंबित नहीं किया है। इसलिए अभी उनके लिए कोई आपातस्थिति नहीं उत्पन्न हुई है। केंद्र की ओर से एएसजी तुषार मेहता ने कहा कि सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन करेगी। ये एक अंतर्राष्ट्रीय मसला है।

सुनवाई के दौरान शरणार्थियों की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि सीमा सुरक्षा बल सीमा पर आ रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को मिर्च का स्प्रे फेंककर भगा रहे हैं। प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार को अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का पालन करना चाहिए और उन्हें शऱण देना चाहिए। उन्हें भगाकर वापस भेजना उन्हें दंडित करने जैसा है। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि हम नहीं चाहते कि भारत दुनिया का रिफ्युजी कैपिटल (शरणार्थी राजधानी) बने। पिछले 5 दिसंबर को प्रशांत भूषण ने कहा था कि रोहिंग्या मुसलमानों की जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया है। उसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मानव अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की जरुरत है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि हमारा संविधान मानवतावादी और सुरक्षा करनेवाला है। हम बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की तकलीफों से बेखबर नहीं हो सकते हैं। सरकार को भी संवेदनशील होने की जरुरत है। 3 अक्टूबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मसले पर मानवीय रवैया अपनाने को कहा था। सुनवाई के दौरान रोहिंग्या मुसलमानों की तरफ से वरिष्ठ वकील फाली एस नरीमन ने अपने बारे में कहा था कि वे बर्मा के वास्तविक शरणार्थी हैं। उन्होंने कहा था कि वे ब्रिटिश बर्मा से भागकर ब्रिटिश इंडिया में शरणार्थी बने। उन्होंने कहा था कि ये स्पष्ट नहीं है कि एनडीए की सरकार ने शरणार्थियों को शरण देने की नीति रोहिंग्या मुसलमानों के लिए क्यों बदल दी। रोहिंग्या याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया था कि सरकार शरणार्थियों पर बनाई अपनी गाइडलाइन से मुकर नहीं सकती है। केंद्र सरकार ने कहा था कि पहले यह तय हो कि ऐसे मामलों में कोर्ट विचार कर सकता है या नहीं।

3 अक्टूबर को ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले में पक्षकार बनाने के लिए अर्जी दायर की थी। सीपीएम के युवा संगठन डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया ने भी सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने के फैसले का विरोध किया। 22 सितंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा दायर हलफनामे के जवाब में याचिकाकर्ता दो रोहिंग्या मुसलमानों की तरफ से दायर हलफनामे में केंद्र सरकार के इस दावे का विरोध किया गया था कि रोहिंग्या मुसलमान सुरक्षा के लिए खतरा हैं। वकील प्रशांत भूषण ने इस हलफनामे में कहा है कि देश की सुरक्षा की खतरा बताने वाला एक भी एफआईआर दर्ज नहीं किया गया है। हलफनामे में कहा गया है कि वे म्यामांर छोड़कर इसलिए भागे क्योंकि वहां उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था और नरसंहार हो रहे थे। हमें अंतर्राष्ट्रीय संधि और करार के मुताबिक भारत में सुरक्षा मिलनी चाहिए। उन संधियों और करारों पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं। अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी सिद्धान्तों के मुताबिक शरण लेनेवाले को उस देश में वापस नहीं भेजा जा सकता है जहां उसकी जान को किसी भी तरह का खतरा हो। हलफनामे में कहा गया है कि भारत के संविधान की धारा 14 और 21 के तहत जीने और समानता का अधिकार सभी नागरिकों और गैर-नागरिकों पर लागू होता है। 18 सितंबर 2017 को अपने हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि रोहिंग्या मुसलमान भारत को संसाधनों पर बोझ हैं। वे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं। केंद्र ने कहा है कि रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजना अवैध आप्रवासियों से निपटने का एक नीतिगत फैसला है। केंद्र ने कहा है कि उसके पास खुफिया सूचना है कि रोहिंग्या मुसलमानों के पाकिस्तान के आईएसआई और आईएस जैसे आतंकी संगठनों से ताल्लुकात हैं। केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि म्यांमार, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में एक संगठित गिरोह है जो रोहिंग्या मुलसमानों को भारत में भेजते हैं। वे 2012 से भारत में आ रहे हैं और उनकी संख्या करीब चालीस हजार है।

याचिकाकर्ता दो शरणार्थियों ने दायर किया है। याचिका में न्यूज़ एजेंसी रायटर के 14 अगस्त के एक खबर को बनाया गया है जिसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को रोहिंग्या मुसलमानों समेत अवैध आप्रवासियों की पहचान करने और उन्हें वापस भेजने का निर्देश दिया है। रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ बौद्ध बहुल म्यामांर में कई मुकदमे लंबित हैं। याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार का इन शरणार्थियों को वापस भेजने का फैसला संविधान की धारा 14, 21 और51(सी) का उल्लंघन है। उनको वापस भेजना अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी कानूनों का उल्लंघन है। अंतर्राष्ट्रीय कानून इन शरणार्थियों की सुरक्षा की गारंटी देता है। याचिका में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की 2016 की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि म्यामांर के अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों के जीने की स्वतंत्रता का हनन हो रहा है।

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