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अपनों से भेदभाव क्यों

अपनों से भेदभाव क्यों

हाल ही में एक मणिपुरी युवती के साथ दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक अधिकारी द्वारा बदसलूकी की घटना सामने आई है। वह भी भारतीय युवती के साथ। अधिकारी का कहना था कि क्या वह सचमुच में भारतीय है। इतना ही नहीं उसकी परीक्षा भी ली गई। यह जानने के लिए कि वह भारतीय है उसे देश के राज्यों के नाम बताने के लिए कहा गया। इस घटना की निंदा तो होनी ही चाहिए साथ ही सबक भी लिया जाना चाहिए। हम जब विदेशों में रह रहे अपने भारतीयों के साथ किसी प्रकार की बदसलूकी की घटना सुनते हैं या पढ़ते हैं तो हमारा खून खौल उठता है, वह भी तब जब बदसलूकी का शिकार हुआ युवक या युवती किसी भी मजहब के हों। सोचिए ऐसे में यदि भारत के अंदर ही इस तरह की घटनाएंं हों तो स्थिति कितनी शर्मनाक हो उठती है। दरअसल हमारे विचार इतने संकीर्ण होते जा रहे हैं कि हम अपने को भी अपना नहीं कह पा रहे हैं। दरअसल हम इतने भागों में बंट चुके हैं कि अपना पराया सा लगने लगा है। हम देश के सीमांत प्रदेश के लोगों को भी भारतीय मानने को तैयार नहीं हैं। हमारे देश में धार्मिक या नस्लीय आधार पर भेदभाव के शिकार विदेशी ही नहीं, भारतीय नागरिक भी होते हैं। अक्सर हमारे देश में लोगों की देश को लेकर व्यावहारिक अवधारणा बहुत संकुचित होती है। उत्तर भारतीयों के लिए भारत और भारतीय संस्कृति का आधार उत्तर भारतीय हिंदू समाज है, जबकि दक्षिण भारतीयों के साथ भी कमोबेश यही स्थिति है। पूर्वोत्तर भारत के लोग इस अवधारणा में पड़ते ही नहीं हैं, और चूंकि वे जनसंख्या के लिहाज से अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनके साथ बराबरी और सम्मान का व्यवहार करना जरूरी नहीं माना जाता। हम कितना ही कहें कि अनेकता में एकता हमारी विशेषता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि अपने से अलग रंग-रूप या संस्कृति के लोगों को हम अपना नहीं मान पाते। पूर्वोत्तर भारत से आए लोगों के साथ बदसलूकी और हिंसा की घटनाएं आए दिन सुनने में आती हैं, और कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि आधुनिकता के बढऩे के साथ जो दुराग्रह घटने चाहिए थे, वे दरअसल बढ़ रहे हैं। पुराने जमाने में अपने देश के सीमांत के लोगों, यहां तक कि विदेशियों के साथ भी दुव्र्यवहार की घटनाएं पढऩे-सुनने में नहीं आती थीं, बल्कि दुनिया भर में भारत की ख्याति एक उदार और समावेशी समाज की रही है। यह उग्र संकीर्णता और संवेदनहीनता हमारे वक्त की ही देन लगती है, चाहे वह विदेश से आए अफ्रीकी लोगों के प्रति हो या अपने ही देश के सीमांत पर बसे लोगों के प्रति हो। जब कोई अपने को ही मानक भारतीय मानकर दूसरे को अपमानित करता है, तो उसका यह काम भारत की अवधारणा को संकीर्ण और खंडित करने का काम करता है। शायद हमारे देश में उदार संस्कृति ही नहीं, बल्कि सभ्यता के बुनियादी नियम स्थापित करने के लिए एक सामाजिक आंदोलन की भी जरूरत है।

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