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हार से सबक ले भाजपा नेतृत्व- अतुल तारे

हार से सबक ले भाजपा नेतृत्व- अतुल तारे

हार से सबक ले भाजपा नेतृत्व

*अतुल तारे


हालांकि यह होना ही था, पर यह हुआ, यह बहुत ही अच्छा हुआ। भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश से अपना तीसरा प्रतिनिधि राज्यसभा के लिए भेजना चाहती थी, पर विफल रही। यह संदेश है भाजपा में कतिपय नेताओं के लिए जो यह मानते हैं कि पैसे से, जोड़-तोड़ से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। भाजपा के श्रेष्ठि नेतृत्व को चाहिए कि ऐसी सलाह देने वालों के न केवल कान उमेठें बल्कि वह स्वयं भी ऐसी सलाहों पर कान न दें। वहीं नेतृत्व को यह समझना होगा कि नॉर्थ ब्लाक नई दिल्ली का रास्ता राज्यों को कमजोर करके नहीं प्राप्त किया जा सकता।


उल्लेखनीय है कि राज्यसभा का गणित विशुद्ध रूप से अंक गणित का खेल है। चुनाव से पहले ही लगभग तय होता है कि किस दल से कितने सदस्य चुन कर जाएंगे। राज्यसभा इसीलिए उच्च सदन भी है कारण इसकी गरिमा विशिष्ट है। कांग्रेस ने विगत इतिहास में सदन की गरिमा गिराई। भाजपा से अपेक्षा थी कि वह इसमें श्रेष्ठ मापदंड स्थापित करती पर भाजपा नेतृत्व भी राज्यसभा में अपनी फजीहत से बचने के लिए फजीहत कराने को मजबूर दिखाई दे रहा है। यह सही है कि देश हित में कई विधेयक विपक्ष के संख्याबल के चलते पारित नहीं हो पा रहे हैं, कारण वहां भाजपा अल्पमत में है पर इसके लिए वह जो प्रयोग कर रही है उससे वह स्वयं कठघरे में है। उत्तरप्रदेश में वह धनबल के जोर पर कपिल सिब्बल को नहीं रोक पाई और मध्यप्रदेश में गोटिया की गोटी फेल रही। एक सामान्य सी राजनीतिक समझ रखने वाला भी यह समझ रहा था कि भाजपा के लिए वोट का आंकड़ा बेहद दूर है और कांग्रेस बेहद नजदीक पर एन वक्त पर भाजपा ने तीसरी सीट के लिए विनोद गोटिया को मैदान में उतार कर यह जतला दिया कि वह जीत के लिए कुछ भी न केवल करने को तैयार है बल्कि अपनी साख की भी उसे खास चिन्ता नहीं। यही नहीं पार्टी नेतृत्व के इस अप्रत्याशित कदम से केन्द्रीय नेतृत्व ने प्रदेश के नेतृत्व को भी असहज किया कारण वह मानसिक तौर पर इस लड़ाई के लिए तैयार ही नहीं था। स्वयं केन्द्रीय नेतृत्व भी इस मसले पर बटा हुआ था। यह बात प्रदेश प्रभारी विनय सहबुद्धे ने भी स्वीकार की। बहरहाल खोए हुए नैतिक बल से लिए फैसले को लागू करने के तरीके भी कहीं से योजनाबद्ध नहीं दिखे। रही सही कसर बहुजन समाज पार्टी ने पूरी कर दी। यह दोहराना होगा कि पार्टी ने उत्तराखंड की गलती से कोई सबक नहीं सीखा, सीखती तो उसे याद आता कि बसपा ने उत्तराखंड में भी कांग्रेस का साथ दिया था। बसपा कांग्रेस का यह गठजोड़ आगे चलकर रणनीतिक तौर पर लंबा चला तो भाजपा के लिए चिंता का सबब होगा।

यही नहीं राज्यसभा चुनाव ने बिखरी बिखरी कांग्रेस को अनावश्यक रूप से एक होने का अवसर दिया। रतलाम, झाबुआ को छोड़ कर एक के बाद एक चुनाव में पिट रही कांग्रेस के लिए यह जीत एक संजीवनी बनी है यह समझना होगा। जहां तक प्रदेश नेतृत्व एवं विशेषकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का प्रश्न है तो राज्यसभा चुनाव का यह प्रसंग यकीनन उनके लिए इधर कुआं और उधर खाई वाला था जिसे उनके लिए भी दिल्ली में बैठे प्रदेश के कतिपय नेताओं ने तैयार किया था, जो चिंताजनक है। पार्टी नेतृत्व को चाहिए कि वह प्रदेश में सुशासन हेतु प्रदेश नेतृत्व को निर्देशित करे, यह पार्टी के लिए ज्यादा बेहतर होगा। वहीं प्रदेश नेतृत्व को भी चाहिए कि वह पार्टी के अंदर संवाद की प्रक्रिया को और विस्तार दे, कारण विगत निकट के इतिहास में प्रदेश राजनीति में भी ऐसे कई अप्रिय एवं अवांछित राजनीतिक प्रसंग हुए हैं जो यह दर्शाते हैं कि पार्टी सत्ता में बने रहने के लिए या फिर स्वयं की पकड़ मजबूत करने के लिए रातों रात जोड़ तोड़ कर अप्रत्याशित कदम उठाकर गैरों को गले लगाती है और अपने जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा।

और इन सब घटनाक्रमों को देख पार्टी का जमीनी कार्यकर्ता अपनी बेबसी को याद करता है। कुछ इस तरह
साहिल पे तमाशाई
साहिल पे खड़े होकर
हर डूबने वाले पे
अफसोस तो करते हैं
इमदाद नहीं कर (पा)ते।
सारांश में यह हर एक सबक लेकर आई है, नेतृत्व को चाहिए कि वह इसे पढ़े और भविष्य में ऐसे अतिरेक से बचे।

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