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हिन्दुत्व का सार आध्यात्मिक लोकतंत्र

हिन्दुत्व का सार आध्यात्मिक लोकतंत्र

# धर्म नहीं एक जीवन शैली है हिन्दुत्व, धर्मनिरपेक्षता भारत में अप्रासंगिक

धर्मनिरपेक्षता शब्द का भारत में सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया जाता है और इस शब्द का प्रयोग सांप्रदायिक ताकतों को संतुष्ट करने के लिए सबसे ज्यादा किया जाता है। दूसरी बात यह भी है कि धर्मनिरपेक्षता शब्द को जिस तरह से हमारे संविधान की प्रस्तावना में पेश किया गया था वर्तमान में भी यह संदेह पैदा कर रहा है। संवैधानिक प्रक्रिया अनुसार धर्मनिरपेक्षता शब्द को शामिल किए जाने पर चर्चा की गई बहस में भी इसको प्रस्तावना में लिखने के खिलाफ निर्णय लिया गया था। संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर भी इस शब्द के खिलाफ थे और कहा था कि इसकी आवश्यकता नहीं है।

डॉ. वैद्य ने कहा कि हमारे संविधान में सभी समुदायों को विशेष रूप से अपने कर्तव्यों के निर्वहन करने के लिए समस्त भारतवासियों, अल्पसंख्यकों सहित अधिकार दिए हैं, किन्तु इंदिरा गांधी ने सन् 1976 में आपातकाल के दौरान बिना किसी आवश्यकता, जरुरत और सर्वसम्मति के विपक्षी नेताओं को जेल में डालकर संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द को संविधान में शामिल किया गया।

धर्मनिरपेक्षता भारत में अप्रासंगिक है। इसकी उत्पत्ति यूरोप में सम्बंधित धार्मिक राज्यों को जोडऩे के लिए उपयोग किया गया था। जबकि भारत में ऐसा कोई राज्य था ही नहीं, सदियों से भारत में सभी समुदायों को समान रूप से देखा जाता है। डॉ. वैद्य ने कहा कि यहूदी, सीरियाई, ईसाई देश के विभिन्न भागों में निवासरत हैं और अपने धार्मिक क्रियाकलापों को बिना किसी कष्ट-भेदभाव के अनुसरण करते हंै, सभी ने भारत को अपना घर बना लिया है।

स्वामी विवेकानंद ने 1893 में आयोजित विश्व धर्म संसद में कहा था, ‘‘हम सहिष्णुता से परे जाकर ईश्वरीय वंदना करने के जितने भी माध्यम हैं उसको स्वीकार्य करते हैं’’। हिन्दुत्व का सार आध्यात्मिक लोकतंत्र है। डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता शब्द के व्याकरण सम्बंधित उल्लेख पर कोई आपत्ति नहीं हैं, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में हिन्दू विरोधी/राष्ट्रविरोधी के लोकाचार का पर्याय बन गया है, अत: धर्मनिरपेक्षता को व्यवहार में एक सांप्रदायिक ताकत के रूप में इस्तेमाल करके एक खास समुदाय को लुभाने के लिए उपयोग में लिया जा रहा है।

डॉ. वैद्य ने सवाल करते हुए कहा कि - पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि मुसलमानों का भारत के प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक है, क्या ये धर्मनिरपेक्ष टिप्पणी है? हमारे देश के राज्यों को हज यात्रा के लिए आर्थिक सहयोग क्यों उपलब्ध कराना चाहिए? जहां तक की दुनिया के अन्य मुस्लिम देश हज के लिए किसी को भी कोई अनुदान ही नहीं देते हंै, जैसा कि मुझे बताया गया है स्वयं के साधन के उपयोग से ही हज यात्रा सफल होती है, तो फिर क्यों इसका लाभ लिया जाता है?

देश के मंदिर किसी भी प्रकार की जांच और हस्तक्षेप के लिए सरकार के अधीन हैं और अल्पसंख्यकों के पूजा स्थल सरकार के अधीन नहीं है, क्या इसे धर्मनिरपेक्षता कहते हंै और एक अन्य उदाहरण कथित धर्मनिरपेक्षक कहते हैं हैदराबाद के ओवैसी सांप्रदायिक नहीं है, वो तो धर्मनिरपेक्ष है, इस तरह के अल्पसंख्यक-वाद से अलगाववाद को बढ़ावा मिल रहा है और इस प्राचीन महान देश की एकता को नुकसान पहुंच रहा है। अपने हित को आगे करने के लिए कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियां इसका अनुचित उपयोग कर रहे हैं। मूर्धन्य विचारक डॉ. वैद्य ने कहा कि एक विडम्बना यह भी है कि यदि कोई धर्मनिरपेक्ष के दुरुपयोग की कोई चर्चा करे तो इसको धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ एवं धार्मिक राज्य के समर्थन की बात कह कर प्रायोजित किया जाता है, इस प्रकार झूठ और तथ्यों का मिथ्याकरण करके भ्रामक जानकारियां फैलाई जाती हैं।

भारत में परंपरागत रूप से सभी धर्मों में एक ही गंतव्य के लिए सब बराबर हैं ऐसा विश्वास करते हैं। एक तथ्य यह भी है कि भारत में जन्मित 99 प्रतिशत मुस्लिम और ईसाई परिवर्तित हैं। तो फिर कैसे अल्पसंख्यकों का दर्जा प्राप्त कर रहे हैं। भारत देश में पारसी और यहूदी सही मायने में अल्पसंख्यक हंै, क्योंकि ये अपने धर्म को साथ लेकर बाहर से भारत में आये हैं, लेकिन वास्तविक अल्पसंख्यक पारसी और यहूदी ने अपने आप को अल्पसंख्यक चिन्हित होने एवं विशेषाधिकार लेने से इंकार कर दिया है। भारत में अल्पसंख्यकवाद कुछ और नहीं सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है। एक-दूसरा पहलू यह भी है कि जब मानव अधिकार आयोग में कोई भी व्यक्ति अपने खिलाफ हुए किसी भी अमानवीय कृत्य के लिए न्याय के लिए गुहार लगा सकता है, तो फिर अल्पसंख्यक आयोग क्यों होना चाहिए।

डॉ. वैद्य ने कहा कि -सही बात तो यह है कि भारत में हिन्दू राष्ट्र और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को लेकर कोई भी विरोधाभास नहीं है, इसको सरल भाषा में समझने के लिए रविन्द्र नाथ टैगोर के निबंध में लिखे उदाहरण ‘‘स्वदेशी समाज’’ में निहितार्थ से समझना चाहिए, ‘‘विविधता में एकता महसूस करने के लिए, बहुरुपता के बीच एकता स्थापित करना-भारत के मूलधर्म में है।" भारत असमानता की वजह से विद्वेष नहीं रखता और न ही प्रतिद्वंद्वी की तरह प्रतीत करता है। यही कारण है कि बलिदान या विनाश के बिना सभी को समायोजित करना चाहता है। डॉ. राधाकृष्णन अनुसार हिन्दुत्व (हिन्दू धर्म) एक धर्म नहीं है, यह कई धर्मों का एक राष्ट्रमंडल है। यदि आप हिन्दू जीवन जीना स्वीकार करते हैं तो किसी भी धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं।

मनमोहन वैद्य ने कहा हिन्दुओं को सामथ्र्य सम्पन्न बनना चाहिए, सबको अपनापन, सबको ऊपर उठना, लेकिन कट्टरता नहीं, ऐसा समाज चाहिए उन्होंने कहा कि....

‘‘समाज हमारा भगवान है। हम समाज की सेवा करने वाले लोग हैं, मुझे इसके बदले में क्या मिलेगा, इसके बारे में सोचना भी नहीं, हम हिन्दू राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास के लिए कार्य करेंगे।’’


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