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ताल चौताल की ध्वनि से स्वर मंच पर प्रकट हुए श्रीराम-कृष्ण

ताल चौताल की ध्वनि से स्वर मंच पर प्रकट हुए श्रीराम-कृष्ण

*समारोह में सुर लय व ताल की त्रिवेणीमें डूबे श्रोता

*पूर्वी अंग की धुन व यूरोपियन मोड ने बांधा समां


ग्वालियर।
तानसेन संगीत समारोह में सोमवार को प्रात:कालीन सभा रसिक श्रोताओं के लिए अविस्मरणीय बन गई। ब्रजमंडल की पारंपरिक धुप्रद रचनाओं के साथ श्रोताओं को एक साथ मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम व आनंदकंद श्री कृष्ण के सौंदर्य को स्वर रूप में निहारने का अवसर मिला। पंचम स्वर के आलाप व शुद्ध धैवत के संयोग से निर्मित राग देशकार ने जब भूपाली के स्वरों को स्पर्श किया तो अकस्मात ही श्रोताओं के मुख से निकल पड़ा...वाह क्या बात है...। वृंदावन से आए प्रख्यात धु्रपद गायक पं. राधा गोविंददास ने मंच से स्वामी श्री हरिदास जी के धु्रपद अंग को कुछ इस प्रकार से उठाया कि स्वर संगतियां श्रुतियों में परिवर्तित होकर बंदिश में बदल गईं।

राधा गोविंद दास ने राग देशकार में प्रथम रचना ताल चौताल में निबद्ध ‘अवधपुर के राजा श्री रामचंद्र’ का गायन किया। गमक व मीड़ के संयोग से उन्होंने तीन लयों की आलापचारी करते हुए शुद्ध धैवत का हल्का स्पर्श किया और तुरंत ही राग अहिल्या बिलावल के सुर लगाते हुए ताल धमार में निबद्ध ‘अब कैसे पार उतरू’ एक पुरानी रचना श्रोताओं को सुनाई। अवध के सौंदर्य को दिखाते हुए राधागोविंद दास ने तत्काल ही श्रोताओं को ‘हे नंदलाल-अति ही रसाल, गावत ब्रजबाल चढ़ वृंदावन तमाल’ सुनाया। राग आसावरी की इस रचना पर ग्वालियर के पखावजी हरिश्चन्द्र पति ने सात मात्रा की तीव्रा ताल में संगत की। पल्टे, रेला व परणों के साथ दमदार तिहाईयों का प्रयोग से पखावज की ध्वनि दूर तक सुनाई दी। सारंगी पर घनश्याम सिसोदिया ने संगत की। इससे पूर्व समारोह की सांगीतिक सभा का शुभारंभ पारंपरिक ढंग से स्थानीय साधना संगीत कला केन्द्र के छात्र-छात्राओं तथा आचार्यों के अहीर भैरव की बंदिश में धु्रपद गायन से हुआ। छात्रों ने रतन सिंहासन की प्रस्तुति दी।

स्वरों ने कराया श्रोताओं को स्विटजरलैण्ड भ्रमण
स्वरों में कुछ ऐसा जादू है कि कलाकार अपने संगीत से श्रोताओं के पटल पर कुछ भी प्रभाव छोड़ सकता है। कुछ ऐसा ही नजारा समारोह की मेथिस बोएनर की वायलिन की प्रस्तुति में दिखाई दिया। स्विटजरलैण्ड से आए मेथिस ने वायोलिन के तारों को छेडक़र अपने देश की पहाडिय़ों पर जमीं बर्फ की ठंडक का अनुभव कराया। मेथिक ने डी-माइनर मोड व डी-मेजर मोड में वायलिन पर यूरोपियन मोड बजाया।


सितार ने बिखेरी सेनिया घराने की तंत्रकारी
जिस तरह निर्मल पानी की ठहरी हुई शांत झील में कंकड़ फेकने से मनोहारी लहरें अठखेलियां करने लगतीं हैं उसी तरह पुणे से आईं शहाना बनर्जी ने सितार के तारों को कुछ इस तरह से छेड़ा कि श्रोताओं के समक्ष गतकारी के सभी प्रकार उपस्थित हो गए। रामपुर-सेनिया घराने की शहाना बनर्जी ने अपनी प्रस्तुति हेतु संगीत सम्राट तानसेन के पुत्र विलास खां द्वारा बनाए गए राग विलासखानी तोड़ी को चुना। आलाप, जोड़-झाला बजाते हुए शहाना ने तीनताल की विलंबित और द्रुत गत की तीन प्रकार की गतें बजाईं। तबला पर उनका साथ सलीम अल्लावाले ने दिया।

सारंगी पर श्रोताओं ने सुना राग वृन्दावनी सारंग
सोमवार को प्रात:कालीन सभा का समापन सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद मुराद अली के सारंगी वादन से हुआ। उनकी सारंगी से झरी मिठास से रसिक सराबोर हो गए। उन्होंने राग ‘बृंदावनी सारंग’ का वादन करते हुए एकताल की विलंबित गत व दु्रत तीन ताल में एक बंदिश का वादन किया। समापन राग ‘मिश्र पीलू’ की धुन से किया। उनके साथ तबला पर संगत दिल्ली घराने के उस्ताद अकरम खां ने की।

आयो प्रभात सब मिल गावो....
बुलंद और खनकदार आवाज में ग्वालियर के आरोह कंपूवाले ने राग भटियार की एक ताल में निबद्ध बंदिश सुनाई। विलंबित ख्याल ‘बलमा मोरी नींद उचट गई’ व दु्रत ख्याल तीन ताल में ‘आयो प्रभात सब मिल गावो’ सुनाया। एक टप्पा राग खमाज में प्रस्तुत करते हुए कंपूवाले ने अपने गायन का समापन ‘चलो मन बृंदावन की ओर’ भजन से किया। उनके साथ तबला पर संगत मसूरकर और हारमोनियम पर विवेक जैन ने की।

तू गाएगी तो बिस्मिल्ला की शहनाई बजेगी: सोमा घोष
बनारस में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुंबई में रह रही पद्मश्री सोमा घोष एक समय के महान फिल्मकार नवेंदु घोष की पुत्रवधू है। पिता मनमोहन चक्रवर्ती स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं और मां अर्चना गायिका। तानसेन समारोह में सोमवार को प्रस्तुति देने से पहले स्वदेश से बातचीत में उन्होंने अपनी संगीत साधना का श्रेय मां को ही दिया। डॉ. राजेश्वर आचार्य को अपना प्रेरक बताते हुए सोमा ने कहा कि उन्हें गर्व है कि भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खां साहब ने उन्हें अपनी पुत्री माना और कहा था कि तू गाएगी तो बिस्मिल्ला की शहनाई तेरे गले में बजेगी। उल्लेखनीय है कि सोमा घोष ने सेनिया घराने के पंडित नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की बागेश्वरी देवी से भी संगीत की शिक्षा ली है। तानसेन संगीत समारोह में सोमा ंने राग कलावती में ख्याल गायन प्रस्तुत किया और राग हंसध्वनि में ‘आदि देव महादेव की’ प्रस्तुति दी। अंत में उन्होंने एक तराना व बनारसी टप्पा सुनाया।

सुर सम्राट की जन्मस्थली में आज सजेगी संगीत सभा
इस साल के तानसेन समारोह के अंतिम दिन 20 दिसम्बर को सुर सम्राट तानसेन की जन्मस्थली बेहट में प्रात: कालीन सभा होगी। यह सभा झिलमिल नदी के किनारे घनी अमराई के बीच सजेगी। सभा का आगाज तानसेन संगीत स्मारक केन्द्र बेहट और महारूद्र मण्डल संगीत महाविद्यालय ग्वालियर के धु्रपद गायन से होगा। इस सभा में अब्दुल हमीद खां ग्वालियर का सारंगी वादन, प्रियंका शर्मा का गायन और सुभाष देशपाण्डे के वायोलिन वादन की प्रस्तुति होगी। वहीं समारोह की अंतिम सभा ग्वालियर किला स्थित गूजरी महल परिसर में 20 दिसम्बर को सायंकाल सजेगी।
सभा की शुरूआत राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के धु्रपद गायन से होगी। इस सभा में मनोज कुमार भोपाल का धु्रपद गायन और बसंत काबरा जोधपुर का सरोद वादन होगा। इसी के साथ इस साल के तानसेन समारोह का समापन होगा।

छात्रों के लिए शोध का माध्यम बनी ‘दस्तावेज प्रदर्शनी’
सांस्कृतिक संग्रह हेतु प्रदर्शनी में स्वदेश के लिए धन्यवाद पत्रक
विश्व संगीत समागम तानसेन समारोह-2016 के अवसर पर धरोहर रूप में अकादमी द्वारा संगीत रचनाओं की पांडुलिपि की छवि प्रदर्शनी समारोह स्थल पर छात्रों को शोध के लिए सामग्री उपलब्ध करा रही है। संगीत रसिक, शोधार्थी, अध्येता और जनमानस इस अनूठी विरासत से शास्त्रीय संगीत की दुर्लभ पांडुलिपियों को देख रहे हैं। प्रदर्शनी में समारोह के पुराने छायाचित्र, दस्तावेजों का संगृहित संकलन कलारसिक तानसेन समारोह की पुरानी यादों का साक्षी बन रहा है। प्रदर्शनी में आलेखन दिनेश पाठक व छायाचित्र संकलन केदार जैन ने किया है। प्रदर्शनी स्थल पर स्वदेश समाचार पत्र को पुराने छायाचित्र प्रदर्र्शनी हेतु उपलब्ध कराने के लिए एक आभार पत्रक भी छात्रों को स्वदेश की वैचारिक व सांस्कृतिक पत्रिकारिता से परिचित करा रहा है।

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