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अप्रैल तक बंद नहीं होगा एनडीएएल सॉफ्टवेयर

अप्रैल तक बंद नहीं होगा एनडीएएल सॉफ्टवेयर

प्रशासन ने दिया शस्त्र धारकों को मौका, अंकित करा सकते हैं यूनिक आईडी


ग्वालियर।
गृह विभाग ने जिले के उन शस्त्र धारकों को एक और मौका दिया है, जिन्होंने अपनी लायसेंस नेशनल डेटा बेस ऑफ आम्र्स लायसेंस (एनडीएएल) में यूनिक आईडी अंकित नहीं कराई है। प्रशासनिक सूत्र बताते हैं कि अगले साल अप्रैल तक शस्त्र धारक यूनिक आईडी अंकित कराने के लिए आवेदन दे सकते हैं, जिससे वे लायसेंस निलम्बन की कार्रवाई से बच जाएंगे। जिलाधीश कार्यालय स्थित शस्त्र विभाग से इस संबंध में जानकारी जिले के सभी थानों में दी जा रही है।

उल्लेखनीय है कि गृह मंत्रालय ने देश भर में लायसेंसी शस्त्रों के रिकार्ड के लिए नेशनल डेटा बेस ऑफ आम्र्स लायसेंस (एनडीएएल) सॉफ्टवेयर बनाया है। इससे लायसेंसी हथियारों का रिकार्ड ऑनलाइन रहेगा। वहीं शस्त्र धारकों की सारी जानकारी भी पोर्टल पर दिखाई भी देगी। दो साल से एनडीएएल में ग्वालियर सहित प्रदेश के लगभग सभी लायसेंसी शस्त्रों की जानकारी धारकों ने दी है, उनके लायसेंस पर इसकी एन्ट्री भी हो चुकी है। पहले इस सॉफ्टवेयर में कई तकनीकी खामियां थीं। अब गृह मंत्रालय ने नया सॉफ्टवेयर इसमें फिक्स कर दिया है, जिससे ये पोर्टल अब और ज्यादा अपग्रेड हो गया है।

31 मार्च से पहले के सभी लायसेंसों पर हुई एन्ट्री
जानकारी अनुसार एनडीएएल पोर्टल में 31 मार्च 2016 से पहले के सभी लायसेंसों पर एन्ट्री (लगभग 28 हजार से ज्यादा) हो चुकी है। अब 31 मार्च से लेकर अब तक जितने भी नए लायसेंस (लगभग 535 लायसेंस) हैं। इन सभी पर अब एन्ट्री होना बाकी है। वहीं ऐसे कुछ लायसेंस शेष हैं, जिन पर यूनिक आईडी अंकित न कराने पर जिला प्रशासन ने उन्हें निलम्बित करने की कार्रवाई की थी। ऐसे लायसेंसों की संख्या भी 358 बताई जा रही है।

ग्रामीण क्षेत्रों में एनडीएएल का प्रचार नहीं
बताया गया है कि एनडीएएल में यूनिक आईडी लेने के लिए जिला प्रशासन शहर के लायसेंस धारकों को पुलिस थाने के माध्यम से कई बार जानकारी दे चुका है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में एनडीएएल का प्रचार करने में प्रशासन ने ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। इसका खामियाजा ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को उठाना पड़ रहा है। यहां बता दें कि कई गांव तो ऐसे हैं, जो शहरी सीमा क्षेत्र से काफी दूर हैं। ऊपर से थाने भी कई किलोमीटर की दूरी पर हैं। ऐसे में एनडीएएल की जानकारी ग्रामीणों को न होना स्वाभाविक है।

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