SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बंगाल में मतदाता सूची सार्वजनिक करने का आदेश

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अहम दिशा-निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि जिन मतदाताओं के नाम ‘तार्किक विसंगतियों’ (Logical Discrepancies) की सूची में डाले गए हैं, उनके नाम ग्राम पंचायत भवनों, प्रखंड कार्यालयों और वार्ड कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ऐसे सभी मतदाताओं को अपने दस्तावेज और आपत्तियां दर्ज कराने का पूरा मौका दिया जाए। कोर्ट ने दो टूक कहा कि पश्चिम बंगाल में चल रही SIR प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और इससे किसी भी नागरिक को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए।
एसआईआर विवाद में SC में सुनवाई
दरअसल, अदालत पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान कथित मनमानी और अनियमितताओं को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। आरोप है कि 2002 की मतदाता सूची के आधार पर बच्चों के माता-पिता के नामों में अंतर, उम्र में कम या ज्यादा अंतर जैसे मामलों को ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ मानते हुए नोटिस भेजे जा रहे हैं।
1.25 करोड़ मतदाताओं पर असर
करीब 1.25 करोड़ मतदाताओं के नाम इस श्रेणी में डाले जाने पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि जिन लोगों के नाम इस प्रक्रिया से प्रभावित हो सकते हैं, उन्हें अपने दस्तावेज और आपत्तियां जमा करने की अनुमति मिलनी चाहिए।
पंचायत और ब्लॉक कार्यालयों में बनाए जाएंगे विशेष काउंटर
कोर्ट ने निर्देश दिया कि पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में इसके लिए विशेष काउंटर बनाए जाएं। राज्य सरकार को पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध कराने का आदेश भी दिया गया, ताकि कामकाज सुचारु रूप से हो सके। इसके अलावा डीजीपी को निर्देश दिए गए कि कानून-व्यवस्था बनी रहे और पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो।
कपिल सिब्बल की दलील
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि गांगुली या दत्ता जैसे उपनामों की अलग-अलग वर्तनी के कारण भी नोटिस भेजे जा रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि माता-पिता और बच्चों के बीच उम्र का अंतर 15 साल से कम होने पर उसे तार्किक विसंगति कैसे माना जा सकता है।
चुनाव आयोग की ओर से पेश सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि अधिकारियों को केवल वर्तनी की गलती के आधार पर नोटिस भेजने से मना किया गया है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में उम्र के अंतर को विसंगति माना गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा नहीं है कि भारत में बाल विवाह जैसी वास्तविकता मौजूद नहीं रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे सामाजिक पहलुओं को नजरअंदाज कर मतदाताओं को परेशान नहीं किया जा सकता।
तृणमूल के आरोप पर EC के वकील का पलटवार
वहीं, तृणमूल कांग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने दावा किया कि नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और कई मौजूदा सांसदों को भी नोटिस भेजे गए हैं। इस पर चुनाव आयोग के वकील ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि आयोग पर भरोसा ही नहीं है, तो उसे चुनाव कराने ही नहीं देना चाहिए।
