हिंदू राष्ट्र के रूप में भारत का स्वरूप उसके जन्म का उद्देश्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को वृंदावन स्थित सुदामा कुटी आश्रम के शताब्दी महोत्सव में उपस्थित संतगणों व प्रबुद्ध नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की पराजय कभी शौर्य की कमी से नहीं हुई, बल्कि फूट और भेदभाव के कारण हुई है। इसलिए भेदभाव मुक्त, समरस हिंदू समाज की स्थापना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आचरण से ही परिवर्तन की शुरुआत होती है। भाषा, जाति और मत-संप्रदाय के भेद से ऊपर उठकर साथ बैठना, साथ खाना और सुख-दुख में साथ खड़ा होना ही वास्तविक एकता का आधार है, इसलिए संघ ने पंच परिवर्तन कार्यक्रम समाज को दिया है। उन्होंने कहा कि आने वाले 20 30 वर्षों में भारत पुनः विश्वगुरु बनकर संपूर्ण विश्व को सुख, शांति और धर्ममय जीवन का मार्ग दिखाएगा।
उन्होंने कहा कि हिंदू राष्ट्र के रूप में भारत का स्वरूप उसके जन्म का उद्देश्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। उन्होंने कहा कि हमारा राष्ट्र इसलिए बना है कि दुनिया को यह दिखाया जा सके कि धर्ममय जीवन कैसे जिया जाता है। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि धर्म और भक्ति के आधार पर निर्मित राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि समाज में वास्तविक एकता भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार से आती है। भाषा, जाति और मत-संप्रदाय के भेद से ऊपर उठकर साथ बैठना, साथ भोजन करना और सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़ा होना ही सामाजिक समरसता का आधार है।
भारत की पराजय शौर्य से नहीं, फूट से हुई
सरसंघचालक ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहास गवाह है कि भारत की पराजय कभी शौर्य की कमी से नहीं हुई। जब-जब देश कमजोर पड़ा, उसकी वजह आपसी फूट, भेदभाव और सामाजिक विखंडन रहा। इसी कारण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भेदभाव मुक्त और समरस हिंदू समाज की स्थापना है।
पंच परिवर्तन कार्यक्रम से समाज में बदलाव की पहल
डॉ. भागवत ने बताया कि इन्हीं मूल्यों को व्यवहार में उतारने के लिए संघ ने समाज के सामने “पंच परिवर्तन” का विचार रखा है। इसका उद्देश्य व्यक्ति के आचरण में परिवर्तन के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना है। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति स्वयं अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं करता, तब तक समाज में स्थायी बदलाव संभव नहीं है। संघ का कार्य इसी आचरण आधारित परिवर्तन पर केंद्रित है।
20–30 वर्षों में भारत बनेगा विश्वगुरु
अपने संबोधन में सरसंघचालक ने भविष्य को लेकर आशावाद भी जताया। उन्होंने कहा कि आने वाले 20 से 30 वर्षों में भारत पुनः विश्वगुरु की भूमिका में होगा और पूरी दुनिया को सुख, शांति और धर्ममय जीवन का मार्ग दिखाएगा। उनका कहना था कि भारत का निर्माण इसलिए हुआ है ताकि विश्व को यह दिखाया जा सके कि धर्म के आधार पर जीवन कैसे जिया जाता है। यही भारत की पहचान है और यही उसकी वैश्विक भूमिका भी।
