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जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाला ही सच्चा टाॅपर्स

जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाला ही सच्चा टाॅपर्सपं. नेहरू के साथ देश को दिशा देने वाले निरक्षर के. कामराज (फाइल फोटो)।

विजय कुमार गुप्ता

मथुरा। बोर्ड की परीक्षाओं के परिणाम आते ही टाॅपर्सों व उनके माता-पिताओं का कुछ ज्यादा ही इतराना इठलाना शुरू हो जाता है। असली परीक्षा तो जीवन की है। इसमें जो उत्तीर्ण होता है, वही असली टाॅपर्स कहलाता है।

परीक्षा के दिनों में तो विद्यार्थियों को ऐसी रटन्ट कराई जाती है, जैसे किताब काॅपियों को घोलकर पिला ही डाला जाएगा। दिन और रात हर समय कापी किताबों में घुसाऐ रखना ही एकमात्र उद्देश्य रह जाता है।

पिछले वर्ष बिहार की एक टाॅपर का मामला प्रकाश में आया था। उसकी शिकायत आने पर जांच कराई गई तो जिन प्रश्नों के उत्तर उसने उत्तर पुस्तिका में एकदम सटीक लिखे थे, उनमें से एक का भी जवाब वह नहीं दे पाई। यह है परीक्षा माफियाओं का कमाल। बाद में उस टाॅपर को फेल कर दिया गया। यह तो एक मामला है और पता नहीं देश भर में ऐसे कितने मामले होंगे। जो बच्चे पूरी मेहनत और लगन से पढ़ते हैं, शायद वह पीछे रह जाते हैं और नकलची व जुगाड़ू टाॅपर्स बन जाते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। मैं एक नहीं अनेक ऐसे लोगों को जानता हूं जो ऊंची-ऊंची पढ़ाई पढ़ने के बाद भी एक सेन्टेंस सही नहीं लिख पाते, इनको मात्रा विराम तथा कोमा तक का ज्ञान नहीं किंन्तु नकल और जुगाड़ से परीक्षाएं पास कर लेते हैं।

इसी प्रसंग में एक और मजेदार बात कहना चाहूंगा। पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. कामराज एक दम निरक्षर थे। वे अपने हस्ताक्षर भी बड़ी मुश्किल से कर पाते थे। उनके व्यक्तित्व और विद्वता की मिसाल यह थी कि नेहरू जी के जमाने में पूरे देश में कामराज योजना लागू की गयी जिसके अंतर्गत सभी नियम कानून कामराज के द्वारा बनाये गये। कामराज एक दम ठेठ सादगी वाले दबंग इंसान थे। वह इतने सादा थे कि अक्सर केवल लुंगी में ही रहा करते थे।

संसद में भी वे बनियान और लुंगी में ही आते थे। पूरी सरकार उनके इशारों पर नाचती थी। पंडित नेहरू भी उस निरक्षर मद्रासी के आगे चूं भी नहीं कर पाते। जरा सोचो कि क्या वे टाॅपर्स थे? वे तो इस कागजी पढ़ाई से बड़ी पढ़ाई में निपुण थे तभी तो पूरा देश कामराज योजना के तहत उनके इशारों में चला।

सबसे मजेदार बात तो यह है कि जरा-जरा से बच्चों को जिनमें कुछ तो दूध मुंहे भी होते हैं, स्कूल में पढ़ने भेजना शुरू कर दिया जाता है। उन बच्चों के वजन से ज्यादा तो उनकी किताब कापियों व पढ़ाई की अन्य सामग्री का अंबार होता है। पहले स्कूल की पढ़ाई और फिर ट्यूशन की पढ़ाई आखिर यह क्या तमाशा है? इन स्कूल वालों और बच्चों के माता-पिताओं का बस नहीं चलता वरना पैदा होते ही बच्चों का स्कूलों में दाखिल करादें। जहां तक स्कूल वालों का सवाल है, उनका तो व्यवसाय है किंन्तु माता-पिता भी नहीं समझते इस बात को।

पुराने समय में जब हम पढ़ते थे, तब पांच वर्ष से पहले कोई अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेजता था। पढ़ाई भी कक्षा एक से प्रारम्भ होती थी। बाद में जब माँटेसरी स्कूलों की परंपरा चली तब तो तीन साल के बच्चों को पढ़ाने भेजा जाने लगा और पहली क्लास से पहले नर्सरी शुरू हो गई और अब तो पहली क्लास से पहले भी कई-कई क्लासें होती है।

जिसे देखो वह एबीसीडी और किताब काॅपी वाली पढ़ाई की घुटी अपने बच्चों को पिलाने में जुटा हुआ है। इस बात से कोई सरोकार नहीं कि हम पहले अपने बच्चों को अच्छे संस्कार और ज्ञान की बातें सिखाऐं।

एक बार मैं महाराष्ट्र अपनी ससुराल गया। वहां एक महाराष्ट्रीयन दंपत्ति से मुलाकात हुई। उनके बच्चे बड़े सुसंस्कृत और शालीन थे तथा उनका सामान्य ज्ञान भी बड़ा शानदार था। उनका शिष्टाचार व्यवहार तथा बड़ों का सम्मान करने का तौर तरीका मुझे बहुत पसंद आया।

मैंने उनकी पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछा तो बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि उनकी परीक्षा के नंबर कोई खास अच्छे नहीं थे, मतलब साधारण से थे जबकि मैं सोच रहा था कि शायद प्रथम श्रेणी में पास होते होंगे या टाॅपर्स होंगे। मैंने उन बच्चों के माता-पिता से पूछा कि इनको तो अच्छी डिवीजन बनानीं थी। इस पर उन्होंने मुझे जो उत्तर दिया वह मेरे मन को छू गया। उनका कहना था कि इस पढ़ाई में भले ही हमारे बच्चे पीछे रहें उसकी हमें कोई चिन्ता नहीं। हमें तो इस बात की फिक्र रहती है कि हमारे बच्चे आदर्श इंसान बनें और अच्छे संस्कार ता जिन्दगी उनके अन्दर बने रहें, धन्य हैं ऐसे माता-पिता।

इसके अलावा एक और खास बात यह है कि जितना बच्चे आगे पढ़ते जायेंगे, उतनी ही उद्दंडता उनके अंदर आती जायगी यानी ऊंची दुकान और फीके पकवान। जितने बड़े विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय होंगे। वहां उतनी बड़ी गुंडई व चरित्र हीनता बच्चों में बढ़ेगी। दिल्ली का जेएनयू या अलीगढ़ का मुस्लिम विश्वविद्यालय के उदाहरण सामने हैं। यहां तो देश विरोधी शिक्षा के अंकुर भी स्वतः ही डलने लगते हैं। इस प्रकार के शिक्षितों से तो वह अनपढ़ अच्छे जो सुसंस्कार वान हों तथा अपने जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण रहें।

Updated : 29 Jun 2020 3:11 AM GMT

स्वदेश मथुरा

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