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नारायण ने थामा नारायण का दामन


विजय कुमार गुप्ता

मथुरा। योगी आदित्यनाथ की नाक के बाल और गृहस्थ के एक संत को पानी पी-पी कर कोसने वाले एक नारायण का आजकल बुरा हाल है। चारों तरफ से घिरे होने और अपनी जान पर बन आने के कारण वे बड़े परेशान हैं तथा संत जी के शरणागत होना चाहते हैं। उन्होंने इसके लिए एक और दूसरे नारायण का दामन थामा तथा इच्छा जाहिर की कि जैसे भी हो मुझे संत जी का आशीर्वाद दिलवाओ।

दूसरे नारायण जी को दया आई (दया आएगी भी क्यों नहीं क्योंकि दोनों ही नारायण भाई जो ठहरे) और उन्होंने इस बाबत संत जी से चर्चा की लेकिन संत जी ने मिलने से दो टूक मना कर दिया। संत जी के हृदय में शरणागत की चाह रखने वाले नारायण जी की वे सभी कटु बातें ऐसे दबी हुई होंगी जैसे राख में दबे अंगारे।

उल्लेखनीय है कि संत जी को कोसने और उनके ऊपर अनर्गल आरोप लगाने वाले नारायण कोरोना के चक्कर में अपने ऊपर आने वाली मुसीबत से फिलहाल बचे हुए हैं। आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी वाली कहावत के अनुसार उन्होंने सोचा कि जैसे भी हो अब संत जी के शरणागत होकर अपनी जान बचाने में ही सार है, वरना कहीं जेल की हवा न खानी पड़ जाय।

किसी ने सच कहा है कि 'बनियां यार दवे कौ'। एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं फिर भी दोनों नारायण असफल हो गए तो पहले नारायण ने एक पूर्व विधायक जी का दामन थामा और उनके द्वारा भी संत जी से गुहार लगवाई। लेकिन संत जी ने फिर दोबारा उनकी दया याचिका रिजैक्ट कर दी। संत जी बड़े दयालु हैं लेकिन वे ऐसे दयालु भी नहीं कि बिच्छू बार-बार डंक मारे और वे उसे सहते रहें। वे इस सिद्धांत के हैं कि बिच्छू के डंक को एक बार तो सह लेंगे किन्तु बार-बार डंक मारने पर उसे मारेंगे तो नहीं परन्तु उसका डंक काटे बगैर नहीं छोड़ते।

जिन पूर्व विधायक जी ने नारायण जी की सिफारिश की थी। वह भी संत जी के स्वभाव से भलीभांति वाकिफ हैं और स्वयं भी भुक्तभोगी रहे हैं। वह तीन दशक पूर्व उनसे पंगा लेने की भूल कर बैठे थे और उनके कोप का शिकार हो चुके हैं। खैर जो भी है संत जी भी पूरे हठी हैं। वह किसी के मुंह तो नहीं लगते लेकिन अपना काम बड़ी सफाई से कर जाते हैं। छुपे रुस्तम जो ठहरे।

वह हठयोग में सिद्धहस्त हैं लेकिन ईमानदारी के साथ। क्योंकि यह देखने में आया है कि वह सांप बिच्छुओं से लड़ाई में नैतिकता और सच्चाई के हथियारों का इस्तेमाल करते हैं, अनैतिकता का नहीं। विजय से उनका चोली दामन का साथ है यानी कि विजयश्री हमेशा उनके हिस्से में ही आती है क्योंकि एक बहुत बड़े महान संत का वरदान जो उन्हें प्राप्त है। यही कारण है कि वह अपनी निराली ठसक में रहते हैं।

Updated : 9 April 2020 1:43 AM GMT

स्वदेश मथुरा

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