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धन्य है हीराबेन जिसने जना ऐसा लाल

धन्य है हीराबेन जिसने जना ऐसा लाल

विजय कुमार गुप्ता

मथुरा। नरेंद्र मोदी जैसे लाल को जन्म और दुर्लभ संस्कार देने के लिए उनकी माँ हीराबेन धन्य है। मोदी जी के आह्वान पर गत दिवस पूरे देश में जो दीपोत्सव देखने को मिला, वह शायद कभी दिवाली पर भी नहीं देखा। घरों की छतों पर दीपकों की ऐसे लाइन लगी थी जैसे दिवाली नहीं महादिवाली हो। उत्साह में लोग आतिशबाजी चला रहे थे, छतों पर मशालें भी नजर आ रही थी। मोमबत्ती, मोबाइल टार्च पता नहीं क्या-क्या जल रही थी और मोदी-मोदी की आवाज चारों ओर से आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि इन प्रकाश पुंजों के माध्यम से पूरा देश मोदी की माला में पुर गया है।

लगभग यही स्थिति 22 मार्च को घंटे-घड़ियाल और शंख आदि बजाने के समय देखने को मिली थी। ऐसा लगता है कि मोदी जी शासक न होकर कोई जादूगर है। इन्होंने तो पीसी सरकार और गोगिया पाशा जैसे विश्वविख्यात रहे जादूगरों को भी मात दे दी। चाहे किसी भी जात का हो, किसी भी धर्म का हो, सभी लोग कोरोना के खौफ को भूल ऐसे मदमस्त हो रहे थे जैसे कोई उत्सव मन रहा हो यानी कोहराम के बीच में उत्सव की खुशी, जैसे आग के ढेर पर बर्फ की सिल्ली रख दी हो और वह पिघलने के बजाय ज्यों की त्यों सुरक्षित बनी रहे।

यदि हमारा हिंदुस्तान कोरोना की लड़ाई को जीत गया तो इस बात को पक्का मान लो कि अब हमारा देश मोदी जी के नेतृत्व में पुनः विश्व गुरु बन जाएगा जैसी कि फ्रांस के भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस पाँच सौ वर्ष पहले ही भविष्यवाणी कर चुके हैं।

जैसा कि लोग जानते हैं दीपक जलाना या घंटे-घड़ियाल और शंख आदि को बजाना हर प्रकार से शुभ और मंगलकारी हैं। इसका सीधा संबंध प्राचीन काल के हमारे ऋषि-मुनियों और पूर्वजों द्वारा खोजे गए विज्ञान से है। आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि घंटे घड़ियाल तथा शंख आदि से निकली ध्वनि तरंगों के साथ उनसे होने वाले कंपन से सूक्ष्म विषाणु नष्ट हो जाते हैं।

इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि दरवाजे की देहरी पर दीपक जलाना हमारे यहां पहले से ही प्रचलित है। माना जाता है कि इससे किसी भी प्रकार की अला बला या अनिष्ट से बचाव होता है। जब लाॅकडाउन का ऐलान हुआ था तभी औरतों ने भयभीत होकर घरों के दरवाजों पर दीपक जलाए थे। उस समय तो मोदी जी ने दीपक जलाने की कोई चर्चा भी नहीं की थी।

मोदी जी द्वारा अपनाऐ जा रहे उपाय तंत्र क्रिया और टोने-टोटके की श्रेणी में आते हैं और यह सब बड़े कारगर होते हैं। जब सामूहिक रूप से इतनी बड़ी मात्रा में पूरे देश ने इनको अपनाया है तो इसका कितना लाभ मिलेगा यह समझने की बात है। कुछ कुतर्की और नास्तिकों की बात को छोड़ो। अक्ल के दुश्मन इन लोगों का बुद्धि या ज्ञान से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। ये लोग तो अक्ल के पीछे लट्ठ लेकर दौड़ते ही रहते हैं। ये तो जिंदगी भर भगवान को कोसते हैं और अंत में शरणागत हो जाते हैं।

मजेदार बात यह भी रही कि जो लोग मोदी जी के इस दीपक जलाने वाले मंत्र की हंसी उड़ा रहे थे और कोरी नाटक बाजी कह रहे थे। उन्हीं के घरों पर औरतों द्वारा दिये जलाए गए। उनकी औरतों का मानना था कि ऐसा ना हो कि दीपक जलने वाले घरों की अलाय बलाय कहीं हमारे घरों में न घुस आए।

मोदी जी ने इन उपायों के द्वारा देश को कोरोना जैसी अलाय बलाय से बचाने का जो प्रयास किया है वह अत्यंत सराहनीय है। निश्चित ही देश को इसका भरपूर लाभ मिलेगा। रही नास्तिकों के उपहास की बात तो बड़े-बड़े नास्तिक अंत समय पर हमने आस्तिक होकर प्रभु की शरण में आते देखे हैं।

बृज फाउंडेशन को मिला कोरोना से लाभ

पूरी दुनिया कोरोना के कोहराम से कराह रही है किन्तु बृज फाउंडेशन को इसका भरपूर लाभ मिला है।

संभवतः फाउंडेशन के सर्वे सर्वा इस समय कोरोना देवी की आरती उतार रहे होंगे और कह रहे होंगे कि आपकी वजह से हमारी जान बच रही है, अच्छा हुआ जो आप आ गई।

उल्लेखनीय है कि एनजीटी ने आदेश दिया था कि 15 वर्षों से कुंडों की सफाई और सौंदर्यीकरण के नाम पर बृज फाउंडेशन द्वारा किए जा रहे घपलों की सीबीआई से जांच कराकर रिपोर्ट सौंपी जाए किंन्तु कोरोना के चक्कर में जांच की रिपोर्ट सम्मिट किया जाना तो दूर जांच की शुरुआत भी नहीं हो सकी। ज्ञात रहे कि जिलाधिकारी द्वारा की गई जांच में बृज फाउंडेशन पहले ही दोषी पाया जा चुका है।

एनजीटी के एक आदेश से बृज फाउंडेशन की बखिया उधड़ गई और अब कोरोना की हाय-तौबा के चक्कर में बृज फाउंडेशन ने यह बहाना खोज लिया और वह अपनी दुकान को समेट रहा है तथा उसके सर्वे सर्वा अब ऐसे गायब हो गए जैसे गधे के सिर से सींग।

ऐसे समय में जब लोग भूखों मर रहे हैं तब बृज फाउंडेशन को आगे आकर उनकी मदद करनी चाहिए थी लेकिन दमची यार किसके और चिलम लगाई खिसके, वाली कहावत चरितार्थ करते हुए फाउंडेशन के सर्वे सर्वा उड़न्छू हो लिये।


हमें मरने का शौक नहीं-शैलजाकांत

बृज तीर्थ विकास परिषद के उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्र का कहना है कि हमें मरने का शौक नहीं।

यह बात उन्होंने इस संवाददाता से फोन पर हुई अनौपचारिक बातचीत के दौरान उस समय कही जब उनसे कहा गया कि एक बार आपने मुझसे यह कहा था कि विषैले सांप को केवल घायल करके नहीं छोड़ना चाहिए, उसका तो फन ही कुचल देना चाहिए।

मिश्रा जी से यह पूछा कि आप तो संत स्वभाव के हैं फिर आप हिंसा और हत्या की बात क्यों कर रहे हैं? इस पर उन्होंने फटाक से जवाब दिया कि जब सांप अकारण ही हमारे ऊपर हमला करें और हम चुपचाप बैठे रहे, फिर तो हम मारे जाएंगे और हमें मरने का कोई शौक नहीं है। अतः फन कुचलना ही श्रेयकर है।

उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लाड़ले शैलजाकांत जी बड़े दयालु और गृहस्थ के सच्चे संत हैं लेकिन उनके स्वभाव में यह भी है कि उनके ऊपर कोई सांप, बिच्छू अकारण या अपनी स्वार्थ सिद्धि ना होने के कारण हमला करें तो वह बिच्छू का डंक काटने और सांप का फन कुचलने से भी नहीं चूकते।

यह बात तब भी देखी गई थी जब वे तीन दशक पूर्व मथुरा के पुलिस कप्तान थे। उस समय के सांप बिच्छू अपनी गति को प्राप्त हो चुके हैं और आज के सांप बिच्छू भी अपने कर्मों के अनुसार अपनी गति को प्राप्त हो रहे हैं।

Updated : 6 April 2020 2:45 PM GMT

स्वदेश मथुरा

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