ईरान-इस्त्राइल-अमेरिका के बीच चल रहे महाविनाशकारी युद्ध को केवल भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से ही नहीं, वरन् अन्तर्राष्ट्रीय कानून की कसौटी पर परखना अत्यंत आवश्यक है। आधुनिक विश्व व्यवस्था का आधार ही नियम-आधारित अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली है, जिसमें किसी भी सैन्य कार्रवाई को वैध ठहराने के लिए स्पष्ट कानूनी और नैतिक मानदण्ड उपस्थित होने चाहिए।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका और इस्त्राइल की कार्रवाइयाँ अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप हैं या उनका उल्लंघन करती हैं? सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय कानून का मूल सिद्धांत समझना आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के अनुसार, किसी भी सदस्य राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र की क्षेत्रीय अखण्डता या राजनीतिक स्वतन्त्रता के विरुद्ध बल प्रयोग करने की अनुमति नहीं है। यह सिद्धान्त आधुनिक अन्तरर्राष्ट्रीय व्यवस्था की रीढ़ है। इसका एकमात्र अपवाद आत्मरक्षा (Self-defence) है, जो अनुच्छेद 51 के अन्तर्गत आता है।
इस्त्राइल और अमेरिका ने ईरान पर सीधे सैन्य हमला करके इस अन्तर्राष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन किया है। ईरान पर आक्रमण बिना किसी उकसाने वाली कार्यवाही के इस्त्रायल और अमेरिका द्वारा शुरू की गया है, वह भी तब जब अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता चल रही थी। यह एक विश्वासघात है। यह अब निर्विवाद प्रमाणित हो चुका है की वर्तमान अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड ट्रम्प एक अविश्वसनीय व्यक्ति हैं।
विश्व हित तो उनके मन मस्तिष्क में होता नहीं, राष्ट्र हित होने में भी अब गम्भीर संदेश है। उनका अधिकांश निर्णय व्यक्तिगत अहं और अंहकार से प्रेरित लगता है। तो उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा के तहत थी। कैसी आत्म रक्षा? ईरान की किसी भी मिसाइल की पहुंच अमेरिका की भूमि तक नहीं है। ईरान ने प्रकटतः कोई न आक्रमण किया न उकसावे की कार्यवाही।
दूसरी तरफ इस्रायल से उसका वाक् युद्ध और अप्रत्यक्ष युद्ध चलता रहा है। यदि इस्राइल यह दावा करता है कि ईरान उसकी सुरक्षा के लिए तात्कालिक खतरा है, तो उसे 'im minent threat' यानी आसन्न खतरे का प्रमाण देना होगा। केवल संभावित खतरे के आधार पर हमला करना अंतर्राष्ट्रीय कानून में सामान्यतः वैध नहीं माना जाता।
इस सन्दर्भ में इस्त्राइल की 'pre-emptive strike' (पूर्व-निवारक हमला) की नीति विवादास्पद रही है। इतिहास में Six-Day War के दौरान इस्त्राइल ने इसी तर्क का उपयोग किया था। हालांकि, वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय कानून में यह सिद्धान्त तभी स्वीकार्य है जब खतरा अत्यन्त निकट और स्पष्ट हो। चूंकि ईरान के खिलाफ की गई कार्रवाई इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती, तो इसे अवैध आक्रमण माना जा सकता है।
अब अमेरिका की भूमिका पर विचार करें। अमेरिका अक्सर 'collective self-defense' (सामूहिक आत्मरक्षा) का तर्क देता है, यानी वह अपने सहयोगी देश
(इस्राइल) की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करता है। लेकिन इसके लिए भी यह आवश्यक है कि जिस देश की रक्षा की जा रही है, उस पर वास्तविक सशस्त्र हमला हुआ हो। यदि ऐसा नहीं है, तो अमेरिका की सैन्य भागीदारी अन्तर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की श्रेणी में आती है। NATO के चार्टर के अनुसार 'यदि नाटो के किसी देश पर हमला होता है तो वह नाटो के सभी देशों पर हमला माना जायेगा। लेकिन वर्तमान सन्दर्भ में नाटो के किसी देश पर हमला नहीं हुआ वरन् नाटो के एक प्रमुख देश ने हमला किया है। इसीलिए नाटो के अन्य देश अमेरिका के साथ नहीं है, और यह संधि का उल्लघंन भी नहीं है।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न है-क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति ली गई है? अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार, किसी भी आक्रामक सैन्य कार्रवाई को वैध बनाने के लिए सुरक्षा परिषद की स्वीकृति आवश्यक होती है, जब तक कि वह आत्मरक्षा का मामला न हो। यदि अमेरिका और इस्त्राइल बिना इस अनुमति के ईरान के विरुद्ध कार्रवाई करते हैं, तो यह स्पष्ट रूप से संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन है।
तीसरा पहलू है-राष्ट्र की संप्रभुता (Sovereignty)। अंतर्राष्ट्रीय कानून में संप्रभुता का सिद्धान्त अत्यन्त पवित्र माना जाता है। हर राष्ट्र को अपनी सीमाओं के भीतर स्वतन्त्र रूप से शासन करने का अधिकार है। यदि कोई बाहरी शक्ति बिना अनुमति के किसी देश की भूमि, वायु या समुद्री क्षेत्र में प्रवेश करती है या हमला करती है, तो यह संप्रभुता का उल्लंघन है। इस दृष्टि से, ईरान की भूमि पर किसी भी प्रकार का सैन्य अभियान-चाहे वह हवाई हमले हों, ड्रोन हमले हों या जमीनी कार्रवाई-तब तक अवैध माने जाएंगे जब तक वे आत्मरक्षा के स्पष्ट और प्रमाणित दायरे में न आते हों।
अब नैतिकता के दृष्टिकोण से इस स्थिति का विश्लेषण करें। अन्तर्राष्ट्रीय कानून केवल नियमों का ढांचा नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानवीय मूल्यों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। युद्ध के दौरान 'Just War Theory' (न्यायसंगत युद्ध सिद्धान्त) का पालन किया जाना चाहिए, जिसमें दो प्रमुख बातें होती हैं-युद्ध का कारण उचित हो (jus ad bellum) और युद्ध के दौरान आचरण भी मानवीय हो (jus in bello)1
यदि अमेरिका और इस्राइल की कार्रवाइयाँ केवल सामरिक प्रभुत्व स्थापित करने या सम्भावित खतरे को समाप्त करने के नाम पर की जाती हैं, तो यह नैतिक रूप से भी संदिग्ध हो जाती हैं। दूसरी ओर, यदि ईरान भी क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाने, प्रॉक्सी युद्ध (proxy wars) को बढ़ावा देने या आतंकवादी समूहों को समर्थन देने में शामिल है, तो उसकी भूमिका भी पूरी तरह निदर्दोष नहीं मानी जा सकती।
इस पूरे परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या 'शक्ति ही न्याय हैं (Might is Right)? यदि शक्तिशाली राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय कानून की अनदेखी करके सैन्य कार्रवाई करते हैं, तो यह वैश्विक व्यवस्था को कमजोर करता है। इससे छोटे और कमजोर देशों के लिए सुरक्षा की भावना समाप्त हो जाती है। अमेरिका का वेनेजुएला पर आक्रमण और वहां के राष्ट्रपति को बन्दी बनाकर अमेरिका लाना संप्रभुता के सिद्धांत के उलंघन का निकृष्टतम उदाहरण है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि ईरान-इस्त्राइल-अमेरिका संघर्ष में अन्तर्राष्ट्रीय कानून की स्थिति जटिल और विवादास्पद है। यदि सैन्य कार्रवाई आत्मरक्षा के स्पष्ट, तात्कालिक और प्रमाणित आधार पर नहीं की गई है, और यदि उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्वीकृति प्राप्त नहीं है, तो अमेरिका और इस्त्राइल की कार्रवाइयाँ अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं। साथ ही, संप्रभुता के सिद्धांत के अनुसार किसी भी राष्ट्र की भूमि पर बिना अनुमति के हस्तक्षेप करना अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। नैतिक दृष्टि से भी, युद्ध केवल अन्तिम विकल्प होना चाहिए, न कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम।
इसलिए निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि इस संघर्ष में कोई भी पक्ष पूरी तरह निर्दोष नहीं है, लेकिन अन्तरर्राष्ट्रीय कानून के कठोर मानकों के अनुसार सैन्य हस्तक्षेप को वैध ठहराने के लिए अत्यन्त ठोस और स्पष्ट आधार आवश्यक हैं। यदि ये आधार कमजोर हैं, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए भी गंभीर खतरा है। दुर्भाग्य से अमेरिका और इस्राइल किसी मापदण्ड पर खरे नहीं उतरते।
(लेखक मेजर सरस् त्रिपाठी संविधान और राष्ट्रीय सुरक्षा विषयों के विशेषज्ञ और पूर्व सैन्य अफसर है)