मासिक धर्म छुट्टी से महिलाओं को नुकसान?

क्यों सर्वोच्च न्यायालय ने कहा होगा कि “मासिक धर्म की छुट्टियों से महिलाओं को होगी परेशानी!”

सोनाली मिश्रा

By : स्वदेश डेस्क
क्यों सर्वोच्च न्यायालय ने कहा होगा कि “मासिक धर्म की छुट्टियों से महिलाओं को होगी परेशानी!”

भारत ही नहीं पूरे विश्व में नारीवादियों का एक आंदोलन है कि माहिलाओं में मासिक धर्म को लेकर उन्हें अनिवार्य अवकाश दिया जाए। उनके अनुसार इस समय लड़कियों के शरीर में बहुत कुछ परिवर्तन होते रहते हैं और दर्द होता है तो उन्हें अवकाश दिया जाना चाहिए। 

मगर इन सबसे पहले यह प्रश्न अवश्य उठना चाहिए कि क्या स्त्रियों का मासिक धर्म कोई व्याधि या रोग है कि जिसके लिए अवकाश की आवश्यकता होगी या फिर एकांत की आवश्यकता होगी? और यदि उस वर्ग को ऐसा लगता है कि मासिक के लिए उन्हें अवकाश की आवश्यकता होगी या एकांत की आवश्यकता होगी तो आज तक वे इस बात का विरोध क्यों करती आ रही थीं कि उन्हें मासिक धर्म के दौरान रसोई में क्यों नहीं प्रवेश करने दिया जाता या फिर मंदिर में प्रवेश क्यों नही करने दिया जाता?

अब जब वे कार्यरत हैं, तो उन्हें मासिक धर्म के दिनों में अनिवार्य अवकाश चाहिए क्योंकि उन्हें आराम करना है, परंतु भारत में यह परंपरा सदियों से है कि जब स्त्री के मासिक आते हैं तो उसे रसोई आदि के समस्त कार्यों से दूर करके एक एकांत स्थान में रहने के लिए कहा जाता है। ऐसा लोगों का कहना था कि लड़कियों को इस दौरान बुरी स्थिति में रखा जाता है, उन्हें घरवालों से अलग सादा भोजन जैसे मूंग की दाल, बिना मसाले का भोजन आदि दिया जाता है। 

मगर अब यदि हम वर्तमान मे अमेरिका की ओर दृष्टि डालते हैं, तो मासिक को लेकर वहाँ पर एक अभियान चल रहा है और वह है रेड टेंट का। अर्थात रेड टेंट में मासिक धर्म के दौरान लड़कियां और महिलाएं एकत्र होती हैं और बातें करती हैं। अर्थात अपने घर की जिम्मेदारी से दूर अलग! 

अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में सैकड़ों रेड टेंट सर्कल चल रहे हैं। महिलाएँ मासिक धर्म के समय साथ बैठती हैं, ध्यान करती हैं, कहानियाँ सुनाती हैं, और “मासिक धर्म के न्याय” की बात करती हैं। इतना ही नहीं पश्चिम में लगातार महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर शोध हो रहे हैं और निरंतर हो रहे शोध यह बताते हैं कि कैसे मासिक धर्म के दौरान लड़की को सादा और सुपाच्य भोजन करना है। उन्हें बिना मसाले की दालें लेनी हैं, फल लेने हैं और ऐसा कुछ भी नहीं खाना है, जिससे पेट में जलन आदि हो। 

जब भारत का आयुर्वेद और भारत की परंपरा यह कहती थी कि मासिक धर्म में लड़की को असहजता होती है, तो उसे रसोई अर्थात अपने कार्यक्षेत्र से अवकाश लेकर एक अलग स्थान पर रहना चाहिए, हल्का और सुपाच्य भोजन करना चाहिए और मासिक के लिए सूती कपड़ा प्रयोग करना चाहिए, तो हमें पिछड़ा कहा गया और यह कहा गया कि लड़कियों के साथ अछूतो जैसा व्यवहार क्यों? क्यों उन्हें रसोई में नहीं जाने देना, क्यों मंदिरों में नहीं जाने देना और क्यों उन्हें हल्का और सुपाच्य भोजन करना है? परिवार से अलग भेदभाव उनके साथ किया जा रहा है? मगर अब रेड टेंट सर्कल, लड़कियों के लिए हल्का भोजन और कॉटन रीयूजेबल पैड्स के नाम पर वही बातें लौट कर आ रही हैं। 

और मासिक धर्म के दौरान कार्यालय से अवकाश भी वही है, परंतु उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होनें स्पष्ट कहा है कि ऐसा करना लड़कियों के लिए हानिकारक होगा। क्योंकि उन्हें फिर नौकरी नहीं मिलेगी। 

यह बात पूरी तरह से सत्य है क्योंकि कोई भी नियोक्ता आखिर अपने कार्यालय में ऐसा क्यों चाहेगा कि मानवश्रम कार्य करने के लिए उपलब्ध ही न हो। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि लड़कियों के साथ मासिक धर्म के दौरान भेदभाव न हो, ऐसी मांग कथित प्रगतिशील लोगों की ही थी, मगर अब वही वर्ग कार्यालय में मासिक धर्म के आधार पर भेदभाव की बात कर रहा है? ऐसा क्यों? यह अब उस वर्ग के लिए ठहर कर सोचने का समय है।

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लेखिका - सोनाली मिश्रा

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