बिहार की राजनीति इन दिनों बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है, जिससे उनका मुख्यमंत्री पद छोड़ना लगभग तय माना जा रहा है। राज्यसभा चुनाव 16 मार्च को होगा। नीतीश कुमार संभवतः मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद ही देंगे। बदले राजनीतिक परिदृश्य में एनडीए गठबंधन में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए अगला मुख्यमंत्री भाजपा से हो सकता है।
भाजपा ऐसे चेहरे की तलाश में है, जो नीतीश कुमार की विकासवादी छवि को आगे ले जाने के साथ जनता की उम्मीदों पर भी खरा उतरे। बिहार में नीतीश कुमार ने सर्वाधिक समय मुख्यमंत्री रहने का पिछला रिकॉर्ड तोड़ दिया। 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी उनके ही नाम है। हालांकि उनकी पहले की समता पार्टी हो या बाद का जेडीयू, अपने बूते नीतीश कुमार कभी बहुमत नहीं जुटा पाए, लेकिन भाजपा के सहयोग से वे 2005 से ही मुख्यमंत्री बनते रहे। 2014 के कुछ महीनों को छोड़ दें तो वे लगातार 20 साल से मुख्यमंत्री हैं। उन्हें कभी किसी ने मुख्यमंत्री बनने में बाधा नहीं पहुंचाई।अब वे अपनी इच्छा से राज्यसभा जा रहे हैं, तो कुछ जेडीयू समर्थकों सहित विपक्षी दलों के नेताओं को यह भाजपा की सुनियोजित साजिश लग रही है, लेकिन भाजपा पर ऐसा आरोप लगाने वाले यह भूल जाते हैं कि केंद्र में उन्हें मंत्री बनाने के अलावा बिहार का मुख्यमंत्री बनाने तक भाजपा ने उन्हें उदार मन से मदद पहुंचाई। पहली बार 2005 में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया था। नीतीश कुमार ईमानदारी से यह बात स्वीकार भी करते हैं। उससे पहले नीतीश अटल जी के मंत्रिमंडल में रेल मंत्री की भूमिका निभा चुके थे।
भले ही नीतीश कुमार ने दो मौकों पर भाजपा से मुंह मोड़ा, लेकिन लौटे तो भाजपा ने उन्हें खुले मन से स्वीकार किया। 2020 में चुनाव नतीजे जब नीतीश कुमार के अनुकूल नहीं आए और उनसे अधिक सीटें भाजपा की झोली में आईं, तब भी भाजपा ने उन्हें सम्मान दिया। उनके ना-नुकुर करने के बावजूद उन्हें भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया। भाजपा अगर उन्हें इतना सम्मान देती रही है, तो कैसे माना जाए कि वह उनके खिलाफ साजिश रखेगी।फिर भी नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले में विरोधियों को साजिश नजर आ रही है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव इसे नीतीश कुमार के साथ भाजपा का विश्वासघात बता रहे हैं, लेकिन तेजस्वी यादव यह भूल गए कि उन्होंने तीन-चार महीने पहले नीतीश कुमार को नीचा दिखाने के लिए उनके बारे में क्या-क्या टिप्पणी नहीं की। उन्हें बूढ़ा, बीमार और लाचार बताया गया।नीतीश कुमार को बेचारा समझने वाले भूल गए हैं कि अब तक स्वाभिमान से समझौता नहीं करने वाले नीतीश ने राज्यसभा जाने का फैसला किसी के दबाव या प्रभाव में आकर नहीं लिया है। उन्होंने तो साफ-साफ बता दिया है कि सभी विधायी सदन देखने की उनकी इच्छा है। वे विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं। राज्यसभा बाकी थी। इस बार वे यह इच्छा भी पूरी करना चाहते हैं।
इसलिए राज्यसभा जाने के उनके फैसले को साजिश कहना कहीं से भी उचित नहीं है। बिहार की राजनीति का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, उसमें नीतीश कुमार का नाम किसी एक अध्याय तक सीमित नहीं रहेगा। वे पूरी किताब की जिल्द की तरह हैं, जो पिछले दो दशकों से बिहार के बिखरे हुए पन्नों को समेटे हुए हैं।सुशासन बाबू से लेकर चाणक्य और पलटूराम तक की उपमाएं उनके व्यक्तित्व के अलग-अलग रंग से जुड़ती हैं। अब जब वे मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जा रहे हैं, तो यह भारतीय राजनीति के एक बड़े ध्रुव का स्थानांतरण है। नीतीश कुमार का पटना से दिल्ली जाना बिहार में एक बड़ी शून्यता पैदा करेगा। इसीलिए उनकी जगह लेना किसी के लिए भी बड़ी चुनौती होगी।