अनुराग तागड़े
विश्व क्रिकेट के इतिहास में 22 जून 2026 का दिन केवल एक प्रशासनिक निर्णय के कारण नहीं, बल्कि महिला खेलों के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय विमर्श में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) द्वारा जारी "रिटर्न टू प्ले पोस्ट-प्रेग्नेंसी गाइडलाइंस" केवल दिशा-निर्देशों का संकलन नहीं हैं, बल्कि वे उस बदलती वैश्विक चेतना का प्रतीक हैं जो यह स्वीकार करती है कि किसी महिला को मातृत्व और अपने पेशेवर सपनों के बीच चयन करने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए।
मानव सभ्यता में मातृत्व को सृष्टि की सर्वोच्च सृजनात्मक शक्ति माना गया है। भारतीय संस्कृति में तो माता को देवत्व के समकक्ष स्थान प्राप्त है। किंतु आधुनिक व्यावसायिक जीवन की विडंबना यह रही कि यही मातृत्व अनेक महिलाओं के लिए उनके करियर की सबसे बड़ी चुनौती बन गया। खेल जगत भी इस विसंगति से अछूता नहीं रहा। अनेक प्रतिभाशाली महिला खिलाड़ियों को विवाह और मातृत्व के बाद अपने खेल जीवन को विराम देना पड़ा। कई बार शारीरिक चुनौतियों से अधिक सामाजिक पूर्वाग्रह, संस्थागत असंवेदनशीलता और सुविधाओं के अभाव ने उनकी वापसी के मार्ग को कठिन बनाया। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की यह नई पहल उसी ऐतिहासिक अन्याय के परिमार्जन का प्रयास है।
मातृत्व को अवरोध नहीं, जीवन का स्वाभाविक विस्तार मानने की आवश्यकता
जब कोई पुरुष खिलाड़ी पिता बनता है तो उसके खेल जीवन की निरंतरता पर शायद ही कभी कोई प्रश्न उठता है। उसकी प्रतिबद्धता, क्षमता अथवा भविष्य को लेकर संदेह नहीं किया जाता। इसके विपरीत जब कोई महिला खिलाड़ी मां बनती है, तब उसके करियर के भविष्य पर चर्चाएं आरंभ हो जाती हैं। यह स्थिति केवल खेल जगत तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे सामाजिक मानस में भी गहराई तक व्याप्त है।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की नई गाइडलाइन इसी सोच को चुनौती देती है। यह स्पष्ट करती है कि गर्भावस्था किसी खिलाड़ी का व्यक्तिगत निर्णय है और उसकी निजता का सम्मान सर्वोपरि है। किसी भी खिलाड़ी पर गर्भावस्था की घोषणा अथवा चिकित्सकीय परीक्षण के लिए दबाव नहीं डाला जाएगा। यह व्यवस्था महिला की गरिमा, स्वतंत्रता और स्वायत्तता को केंद्र में रखती है। वास्तव में यह केवल खेल नीति नहीं, बल्कि महिला अधिकारों और समान अवसरों की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन है।
जय शाह की दूरदृष्टि : समावेशी क्रिकेट की ओर निर्णायक कदम
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के अध्यक्ष जय शाह ने इस पहल को केवल महिला खिलाड़ियों के कल्याण का विषय नहीं माना, बल्कि क्रिकेट के भविष्य से जोड़कर देखा है। उनका यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है कि किसी भी खिलाड़ी को मातृत्व और अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के बीच चयन करने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए।
जय शाह का यह दृष्टिकोण आधुनिक खेल प्रशासन की बदलती सोच को प्रतिबिंबित करता है। बीते कुछ वर्षों में महिला क्रिकेट को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समान मैच फीस, महिला क्रिकेट के लिए बेहतर आधारभूत सुविधाएं, महिला प्रीमियर लीग का विस्तार तथा महिला खिलाड़ियों के लिए बढ़ते अवसर इसी परिवर्तन का प्रमाण हैं। मातृत्वोत्तर वापसी संबंधी यह नई नीति उस व्यापक दृष्टिकोण का विस्तार है जिसमें महिला क्रिकेट को पुरुष क्रिकेट के समान सम्मान, संसाधन और संरचनात्मक सहयोग प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है।
छह चरणों वाला मॉडल : विज्ञान, संवेदना और संतुलन का समागम
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने महिला खिलाड़ियों की सुरक्षित और व्यवस्थित वापसी के लिए छह चरणों वाला मॉडल विकसित किया है रेडी, रिव्यू, रिस्टोर, रिकंडीशन, रिटर्न और रिफाइन। यह मॉडल केवल शारीरिक फिटनेस तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक स्थिरता और पारिवारिक परिस्थितियों को भी समान महत्व देता है। आज के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी खेल परिवेश में जहां खिलाड़ी प्रदर्शन के दबाव में समयपूर्व वापसी का जोखिम उठाते हैं, वहां यह मॉडल संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।इस व्यवस्था का उद्देश्य खिलाड़ी को शीघ्र मैदान पर लौटाना नहीं, बल्कि उसे पूर्ण रूप से सक्षम, आत्मविश्वासी और स्वस्थ बनाकर प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में पुनः स्थापित करना है।
खिलाड़ी नहीं, मां और शिशु भी हैं केंद्र में
इन दिशा-निर्देशों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें केवल खिलाड़ी की वापसी नहीं, बल्कि मां और शिशु दोनों के कल्याण को केंद्र में रखा गया है। प्रत्येक खिलाड़ी के लिए एक समर्पित केस मैनेजर नियुक्त करने, चिकित्सा विशेषज्ञों, फिजियोथेरेपिस्टों, मनोवैज्ञानिकों, पोषण विशेषज्ञों और प्रशिक्षकों की टीम गठित करने तथा यात्रा एवं शिशु देखभाल संबंधी सहयोग प्रदान करने की अनुशंसाएं इस नीति को विशिष्ट बनाती हैं।यह पहली बार है जब विश्व क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था ने स्वीकार किया है कि मातृत्व केवल जैविक अवस्था नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और भावनात्मक दायित्व भी है।
भारत के लिए भी सीख
भारत आज महिला खेल शक्ति के रूप में तेजी से उभर रहा है। क्रिकेट, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, एथलेटिक्स, निशानेबाजी और कुश्ती जैसे क्षेत्रों में भारतीय महिलाओं ने विश्व स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया है। किंतु मातृत्वोत्तर सहायता तंत्र अभी भी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाया है।ऐसे में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की यह पहल भारतीय खेल महासंघों, भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल संस्थाओं के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बन सकती है। यदि हम चाहते हैं कि महिलाएं दीर्घकाल तक खेलों में सक्रिय रहें, तो हमें मातृत्व को करियर के अवरोध के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक और सम्माननीय चरण के रूप में स्वीकार करना होगा।
नई पीढ़ी की बेटियों के लिए आश्वस्ति का संदेश
आज देश और दुनिया की लाखों बालिकाएं खेलों में अपना भविष्य देख रही हैं। वे विश्व विजेता बनना चाहती हैं, ओलंपिक पदक जीतना चाहती हैं और अपने देश का गौरव बढ़ाना चाहती हैं। उन्हें यह विश्वास भी चाहिए कि जीवन के किसी भी चरण में उनके सपनों का मूल्य कम नहीं होगा।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की यह पहल उन्हें यही भरोसा देती है। यह संदेश देती है कि एक महिला उत्कृष्ट खिलाड़ी भी हो सकती है, सफल पेशेवर भी, समर्पित मां भी और राष्ट्र की गौरवदूत भी।किसी भी सभ्यता की प्रगति का आकलन केवल उसकी आर्थिक उपलब्धियों से नहीं किया जाता, बल्कि इस बात से भी किया जाता है कि वह अपनी महिलाओं को कितनी गरिमा, सुरक्षा और अवसर प्रदान करती है।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की "रिटर्न टू प्ले पोस्ट-प्रेग्नेंसी गाइडलाइंस" केवल क्रिकेट प्रशासन का दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि मातृत्व की गरिमा, महिला प्रतिभा के सम्मान और समान अवसरों की अवधारणा का वैश्विक घोषणा-पत्र हैं। जब भविष्य में महिला क्रिकेट के स्वर्णिम अध्याय लिखे जाएंगे, तब यह अवश्य उल्लेखित होगा कि एक समय ऐसा भी आया था जब विश्व क्रिकेट ने यह स्वीकार किया कि मातृत्व किसी खिलाड़ी के सपनों का अंत नहीं, बल्कि उसकी नई उड़ान का प्रारंभ है।