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यह कांग्रेस का 'स्टाइल ऑफ फंक्शनिंग' है

पूर्वाग्रह से दूर है फिलहाल प्रशासनिक जमावटं

यह कांग्रेस का स्टाइल ऑफ फंक्शनिंग है
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भोपाल/विशेष प्रतिनिधि। यह कांग्रेस का 'स्टाइल ऑफ फंक्शनिंग' है। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के 72 घंटे के भीतर कमलनाथ ने निगम मंडलों, प्राधिकरणों, परिषद आदि में एक साथ सारी राजनीतिक नियुक्तियां निरस्त कर दी हैं। 15 साल से राजनीतिक वनवास झेल रही कांग्रेस से यह अपेक्षित भी था और आज राजनीति जिस दौर में प्रवेश कर चुकी है, वहां राजनीतिक निर्णयों में विलम्ब की गुंजाइश है भी नहीं। हां, श्री कमलनाथ जिस तेजी से ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं भाजपा कार्यकर्ता हैरान परेशान हैं कि 15 साल प्रदेश में और केंद्र में लगभग 5 साल होने को आए केन्द्र में बनी उनकी सरकारों को निर्णय लेने से किसने रोका था?

गौरतलब है कि कमलनाथ ने अभी अपनी कैबिनेट गठित नहीं की है। मंत्रणाओं का दौर जारी है। उम्मीद की जा रही है कि अगले 48 घंटों में कुछ तस्वीर साफ होगी। पर इस बीच कमलनाथ यह संकेत देने में सफल हैं कि वे तेजी से फैसले लेने में यकीन रखते हैं। यद्यपि अपने पहले संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने यह भी कहा था कि भाजपा सरकार सिर्फ मुख्यमंत्री सचिवालय तक ही केन्द्रित हो गई थी, वह विकेन्द्रीकरण के पक्षधर हैं। यह भविष्य बताएगा कि आगे सरकार कितनी विकेन्द्रीकृत होगी, पर अभी तो पहले चार दिन से कमलनाथ वन मैन शो हैं। पर्दे के पीछे निश्चित सलाहकार होंगे, पर उन्होंने कर्जामाफी से लेकर पुलिस विभाग की समीक्षा तक जो फैसले लिए हैं, वह यह बताते हैं कि अभी कैबिनेट गठन के पहले ही वह न केवल कई बड़े फैसले ले सकते हैं, अपितु प्रशासनिक जमावट भी कर लेंगे। कैबिनेट इन पर मोहर लगाएगी।

निगम मंडलों को भंग कर कमलनाथ ने संकेत दे दिए हैं कि अगले तीन माह तक वह राजधानी भोपाल को गुलजार रखेंगे। वह जानते हैं कि मंत्रिमण्डल गठन में वह कितने भी संतुलन का प्रयास करें, असंतोष तय है। लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। ऐसे में ये राजनीतिक मनोनयन ही निर्वासित कार्यकर्ताओं की 'सम्बल योजना' बनेंगे। नि:संदेह भाजपा ने कुछ बातें कांग्रेस से भी बेहतर सीख लीं और खुद कांग्रेसी भी यह देखकर हैरान हैं पर अपने मूल कार्यकर्ताओं को राजनीतिक रूप से तेजी से स्थापित करने की कला में कांग्रेस का कोई सानी नहीं है। कांग्रेस की कार्य पद्धति इस परिप्रेक्ष्य में भाजपा को समझनी चाहिए। इस समय भाजपा नेतृत्व फुरसत में है गिनती कर लें कि कितनी नियुक्तियां वह कर ही नहीं पाया और तो और कांग्रेस शासन में जमे लोगों को भी हटाने का साहस नहीं दिखा पाया। गिनेगा तो वह खुद हतप्रभ रहेगा और सिर्फ नियुक्तियों ही नहीं कार्यकर्ता को मान देना भी कांग्रेस से सीखना होगा। स्वयं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जिस प्रकार प्रदेश भर के खासकर ग्वालियर चम्बल संभाग के कार्यकर्ताओं को खुद होकर सत्ता साकेत के दरवाजों तक ले जा रहे हैं, भाजपा के कई जमीनी कार्यकर्ता 15 साल इससे भी वंचित रहे। यह कांग्रेस की शैली है।

पूर्वाग्रह से दूर है फिलहाल प्रशासनिक जमावटं

श्री कमलनाथ ने प्रशासनिक जमावट की शुरुआत जिस प्रकार की है, उससे दो बातें स्पष्ट हैं। पहला जो उनकी आंखों में किरकिरी बन गए थे, उन्हें हटाने में वह देर नहीं करेंगे। छिंदवाड़ा एवं रीवा में हुई कार्रवार्ई इसका उदाहरण है। वहीं वह पूर्वाग्रह से दूर हैं। यकीन करना जानते हैं। भाजपा शासन काल में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव रहे अशोक वर्णवाल को बनाए रखना इसका संकेत है। श्री वर्णवाल एक लो प्रोफाइल किन्तु परिश्रमी एवं प्रामाणिक अधिकारी हैं। वह कमलनाथ के उद्योग मंत्री रहते भी उनके साथ रहे हैं। इसी तरह पी. नरहरि को जनसम्पर्क की पूरी कमान देकर कमलनाथ ने योग्यता एवं दक्षता का सम्मान किया है। पी. नरहरि माध्यम के भी प्रबंध संचालक रहेंगे। भाजपा शासनकाल में पहली बार आयुक्त को म.प्र. माध्यम से मुक्त रखने का निर्णय प्रमुख सचिव एस.के. मिश्रा के दबाव के चलते हुआ था जिसकी आलोचना भी हुई थी। कांग्रेस ने पुरानी परम्परा ही कायम रख एक बेहतर शुरुआत की है। अतिरिक्त मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव के पर थोड़े कतरे गए हैं, उनकी जगह रेणु तिवारी की आमद हुई है। श्रीमती तिवारी भी तेज तर्रार अधिकारी मानी जाती हैं। नगरीय प्रशासन को लेकर उठे गंभीर सवालों के चलते विवेक अग्रवाल की रवानगी तय मानी जा रही थी, वे अब पी.एच.ई. देखेंगे। श्री विवेक अग्रवाल भी शिवराजसिंह की आंख कान माने जाते थे। वे अब मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव भी नहीं होंगे। कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में कमलनाथ भ्रष्टाचार की कथित शिकायतों को लेकर भी एक बड़ी कार्रवाई का मन बना सकते हैं। आइए, इंतजार करें।

Updated : 2018-12-21T14:17:23+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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