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नागरिकता संशोधन अधिनियम पर हंगामा क्यों ?

लोकसभा में बिल के पक्ष में 311 वोट और विपक्ष में 80 वोट पड़ने से यह आसानी से पारित हो गया, फिर भी

नागरिकता संशोधन अधिनियम पर हंगामा क्यों ?

- रमेश सर्राफ धमोरा

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के बाद 12 दिसम्बर को अधिकारिक रूप से भारत के राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ ही नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) 2019 देश में लागू हो गया है। इस कानून के लागू होने के बाद देश के कई हिस्सों में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। कई जगह सरकारी सम्पत्ति को नुकसान भी पहुंचाया गया है। सरकार विरोधी राजनीतिक दल इस कानून का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इसमें धार्मिक भेदभाव किया गया है। उन्होंने राष्ट्रपति से मिलकर इसे वापस लेने की मांग की है।

कानून बनने से पूर्व संसद के दोनों सदनों में भी इस बिल को लेकर लंबी बहस हुई। लोकसभा में बिल के पक्ष में 311 वोट और विपक्ष में 80 वोट पड़ने से यह आसानी से पारित हो गया था। राज्यसभा में भी इस बिल के पक्ष में 125 व विरोध में 99 मत पड़े। राज्यसभा में वोटिंग के वक्त विपक्षी दलों की एकता भी बिखरती नजर आई। सपा, बसपा, टीएमसी, एनसीपी सहित कई विपक्षी दलों के सांसद मतदान के दौरान सदन से गैरहाजिर रहे। बीजू जनता दल, अन्नाद्रमुक, जनता दल (यूनाइटेड), वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, तेलगु देशम पार्टी के साथ ही पूर्वोत्तर के क्षेत्रीय दलों के सदस्यों ने राज्यसभा में सरकार के पक्ष में मतदान किया।

कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि सरकार ने संसद में संख्या बल के आधार पर इस कानून को पास करा लिया है जबकि यह कानून पूर्णतया गलत है। सबसे पहले केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा कि उनकी सरकार केरल में इस कानून को लागू नहीं करेगी। उसके बाद पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, पंजाब, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान में कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने भी अपने-अपने प्रदेशों में इस कानून को लागू करने से इनकार कर दिया है। इस कानून पर संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि सभी प्रदेश सरकारों को हर हाल में नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को लागू करना पड़ेगा।

गृहमंत्री अमित शाह का कहना है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 पूर्णतया संवैधानिक है। इस कानून के अनुसार हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के जो सदस्य 31 दिसम्बर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आये हैं और जिन्हें उनके देश में धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है, उन्हें गैरकानूनी प्रवासी नहीं माना जाएगा। बल्कि उनको सरकारी नियमों का पालन करते हुए विधि सम्मत आवेदन करने पर भारतीय नागरिकता दी जाएगी। गृहमंत्री ने कहा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) मुसलमानों के खिलाफ नहीं है। इस कानून से किसी मुसलमान को डरने की जरूरत नहीं है। पूर्वोत्तर राज्यों की आशंकाओं को दूर करते हुए गृहमंत्री ने कहा कि इस कानून से किसी के भी हित प्रभावित नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार पूर्वोत्तर के लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। अब इस कानून में भारत की नागरिकता लेने के लिए 11 साल तक भारत में रहने की अवधि को भी घटाकर 6 साल तक कर दिया गया है।

सीएए को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। इस कानून के विरोध में दिल्ली के जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी व अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र सड़कों पर उतर आए। असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह कानून मुस्लिमों के खिलाफ है। धर्म के हिसाब से यह कैसे तय किया जा सकता है कि किसे नागरिकता देनी है और किसे नहीं। सरकार विरोधी दलों और मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन कर रहा है। विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के आधार पर नागरिकता कैसे दी जा सकती है? हालांकि पूर्व में इस अधिनियम में अब तक 1986, 1992, 2003, 2005 और 2015 में पांच बार बदलाव किया जा चुका है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम का असम में सबसे तीव्र विरोध हो रहा है। पहले 3 दिनों तक तो असम के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए। अब स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। असम में विभिन्न संगठनों के लोगों का शांतिपूर्ण आंदोलन जारी है। कानून के विरोध में असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद ने गुवाहाटी में 36 घंटे का अनशन किया। इस बिल का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम असम समझौता 1985 का उल्लंघन करता है। इस समझौते के मुताबिक 24 मार्च 1971 से पहले ही दूसरे देशों से भारत आए लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है। लेकिन नए कानून के मुताबिक सीमा बढ़ाकर 31 दिसम्बर 2014 कर दी गई है। लोगों का मानना है कि इससे बड़े पैमाने पर असम के लोग प्रभावित होंगे।

भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में इनर लाइन परमिट में आने वाले पूर्वोत्तर भारत के राज्यों को नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 में छूट दी गई है। पूर्वोत्तर भारत के असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्य में संविधान के मुताबिक स्वायत्त जिला परिषद है, जो स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में इसका प्रावधान किया गया है। संविधान सभा ने 1949 में स्वायत्त जिला परिषदों का गठन करके राज्य विधानसभाओं को संबंधित अधिकार प्रदान किए थे। छठी अनुसूची में इसके अलावा क्षेत्रीय परिषदों का भी उल्लेख किया गया है। इन सभी का उद्देश्य स्थानीय आदिवासियों की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना है। इसका मतलब यह हुआ कि 31 दिसम्बर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान से आए गैर मुसलमान शरणार्थी भारत की नागरिकता हासिल करके भी मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर तथा असम के स्वायत्तशासित जिलों में न तो जमीन खरीद पाएंगे और न ही किसी तरह का कारोबार कर पाएंगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्वोत्तर के लोगों से अपील करते हुए कहा केंद्र सरकार उनके हितों के लिए हमेशा उनके साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि 'मैं लोगों का स्पष्ट करना चाहता हूं कि आपके अधिकार, विशिष्ट पहचान और खूबसूरत संस्कृति को आप से कोई नहीं छीन सकता है। यह पहले की तरह ही चलता रहेगा और विकसित होता रहेगा। असम के लोगों की राजनीतिक, भाषाई, सांस्कृतिक और जमीन के अधिकार को संविधान की छठी अनुसूची की मूल भावना के अनुसार रक्षा करने के लिए केंद्र सरकार पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।'

नागरिकता संशोधन कानून 2019 के बहाने कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियां सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने में लगी हुई हैं। कांग्रेस सरकार पर जमकर हमला कर रही है। कांग्रेस के साथ ममता बनर्जी, वामपंथी दल व अन्य क्षेत्रीय दल हैं। उधर, भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के नेता मुसलमानों को भड़काकर माहौल बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं। बहरहाल, सरकार लोगों को नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 की असलियत से वाफिक करवा पाती है इसका पता तो आने वाले समय में चल पाएगा।

(लेखक पत्रकार हैं।)


Updated : 18 Dec 2019 10:01 AM GMT
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