हिंदू-मुस्लिम शांति से क्यों नहीं रह पाते?

बीते रविवार (11 जनवरी) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ मंदिर के इतिहास का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने एक हजार साल पहले इस मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। उनके अनुसार, सोमनाथ महादेव मंदिर पर ध्वजारोहण भारत की शक्ति और सामर्थ्य को दुनिया के सामने प्रकट करता है। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “गजनी से लेकर औरंगजेब तक सभी मजहबी कट्टरपंथियों को यह भ्रम था कि उन्होंने अपनी तलवार से सोमनाथ को जीत लिया है। लेकिन समय के चक्र में वे आक्रांता इतिहास के पन्नों तक सिमट गए, जबकि सोमनाथ आज भी पूरी शान से खड़ा है।”
ऐसा लगता है कि यहां प्रधानमंत्री मोदी पूरी सच्चाई बताने से एक कदम पहले रुक गए। उन्होंने सही कहा कि आक्रांता इतिहास बन गए हैं। सवाल यह है कि क्या गजनवी और औरंगजेब की मानसिकता भी उनके साथ समाप्त हो गई? या नफरत और कट्टरता का जहर सिर्फ अपना रूप बदलकर आज भी इस भूखंड में मौजूद है?
उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर वर्तमान वैश्विक सच्चाइयों में मिलते हैं। इस विषैली सोच के असंख्य वैचारिक ‘रक्तबीज’ न केवल आज तक जीवित हैं, बल्कि विश्व के अनेक हिस्सों को लगातार अपना शिकार बना रहे हैं। 1980–90 के दशक में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार और पलायन, 1993 के मुंबई विस्फोट (दाऊद इब्राहिम–याकूब मेनन), 2001 में अफगानिस्तान में बामियान बुद्ध प्रतिमाओं का विध्वंस (मुल्ला उमर), अमेरिका का 9/11 आतंकी हमला (ओसामा बिन लादेन), भारतीय संसद पर जिहादी आक्रमण (अफजल गुरु), 2008 का 26/11 आतंकवादी हमला (कसाब, शोएब नाजिर आदि), 2014 में ब्रसेल्स, बेल्जियम (मेहदी नेमूश), 2015 में पेरिस, फ्रांस (अब्देलहमीद अबाउद), 2016 में नीस, फ्रांस (मोहम्मद बुलेल), 2024 में मैगडेबर्ग, जर्मनी (तालेब अब्दुल जव्वाद), अक्टूबर 2025 में ब्रिटेन (जिहाद अल-शामी), अप्रैल 2025 में पहलगाम (आसिफ सुलेमान, आदिल अहसन), नवंबर 2025 में दिल्ली (डॉ. उमरुन नबी आदि) और दिसंबर 2025 में सिडनी, ऑस्ट्रेलिया (साजिद–नवीद) जैसी आतंकी घटनाएं इन वैचारिक रक्तबीजों की वैश्विक उपस्थिति के ठोस प्रमाण हैं।
बार-बार यह सवाल उठता है कि इस्लामी आक्रमणकारियों ने भारत पर बार-बार आक्रमण क्यों किए और सोमनाथ जैसे भव्य प्राचीन मंदिरों को क्यों ध्वस्त किया? वामपंथी इतिहासकार इसे केवल लूट की कार्रवाई बताकर इसके पीछे की मजहबी चिंतनधारा को छिपा देते हैं। भारत पर इस्लामी हमले दो उद्देश्यों से हुए पहला, अपार धन-संपदा की लूट और दूसरा, मजहबी दायित्व की पूर्ति। 1398 में भारत आकर लाखों हिंदुओं का कत्लेआम मचाने वाले और बाबर के वंशज तैमूर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-तैमूरी’ में इन उद्देश्यों का स्पष्ट उल्लेख किया है। इतिहासकार अब्राहम एराली के अनुसार, गजनवी ने भारत में ‘मूर्तिपूजकों’ के खिलाफ हर साल जिहाद करने की कसम खाई थी और उसने अपने 32 वर्षों के शासनकाल में भारत पर एक दर्जन से अधिक आक्रमण किए।
गजनवी के लिए हिंदुओं का संहार और लूटपाट, दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। अपने भारत अभियान के दौरान जब एक पराजित हिंदू राजा ने मूर्ति न तोड़ने के बदले भारी फिरौती देने की पेशकश की, तो उसने साफ कहा कि इस्लाम में काफिरों के पूजा स्थलों को तोड़ना सवाब का काम है और वह हिंदुस्तान की सारी मूर्तियों को मिटाना चाहता है। गजनवी के समकालीन अल-बेरुनी ने भी लिखा था कि महमूद ने भारत की समृद्धि को पूरी तरह नष्ट कर दिया और सोमनाथ की मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़े गजनी ले गया, जिन्हें उसने एक मस्जिद के दरवाजे पर रखवा दिया, ताकि आते-जाते लोग उन पर अपने पैर रगड़ सकें। इस्लामी इतिहास में सोमनाथ अभियान को कई इस्लामी कवियों और लेखकों ने एक महान उपलब्धि मानते हुए ‘काफिरों पर इस्लाम की जीत’ बताया है। 1955 में ‘पाकिस्तान हिस्टोरिकल सोसायटी’ द्वारा प्रकाशित पुस्तक ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ हिंद-पाकिस्तान में भी लिखा गया कि सोमनाथ अभियान इस्लाम के सैन्य इतिहास की एक महानतम घटना थी और इससे पूरे इस्लामी जगत में खुशी की लहर दौड़ गई थी। स्पष्ट है कि यह केवल गजनवी की व्यक्तिगत सनक नहीं थी, बल्कि इसे आज भी इस्लामी दुनिया में व्यापक स्वीकृति मिलती है।
वर्तमान भारत में हिंदू और मुस्लिमों की कुल आबादी लगभग 95 प्रतिशत है। ऐसे में उन्हें शांति और समानता के साथ रहना ही होगा। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि दोनों के पूर्वज सनातनी ही थे। लेकिन इतिहास की कड़वी यादें उन्हें बार-बार आमने-सामने खड़ा कर देती हैं। भारत में इस्लाम किसी समानांतर पूजा-पद्धति के रूप में नहीं, बल्कि एक राजनीतिक, सैन्य और मजहबी शक्ति के रूप में आया, जिसने पराजित काफिरों की पहचान, आस्था और आत्मसम्मान को रौंदा। करीब आठ सौ वर्षों तक भारत के कई हिस्सों पर इस्लामी शासन रहा, जिसमें मंदिर विध्वंस, जबरन मतांतरण, जजिया और गैर-मुसलमानों का दमन राजकीय नीति का हिस्सा थे।
हिंदू सभ्यता स्वभाव से बहुलतावादी, गैर-मतांतरण और सह-अस्तित्व आधारित रही है। इसके विपरीत, इस्लाम का वैचारिक ढांचा ‘मैं ही सच्चा, बाकी झूठे’ की सोच से प्रेरित रहा है, जो न केवल गैर-मुस्लिमों के प्रति, बल्कि अपने ही अन्य सहधर्मी मुस्लिमों के प्रति भी उकसाव पैदा करता है।
यह सही है कि कई मुस्लिम शांतिपूर्वक रहना चाहते हैं, लेकिन इस्लामी सिद्धांत में सभी ईश्वर को एक मानने की गुंजाइश नगण्य है। यही कारण है कि एक पक्ष संघर्ष और अपमान को याद करता है, तो दूसरा पक्ष उस पर गर्व करता है। यही हिंदू-मुस्लिम संबंधों में जहर घोलता है। अतीत बदला नहीं जा सकता, लेकिन क्या ऐतिहासिक अपराधों और उनके दोषियों का महिमामंडन किया जाना चाहिए?
पिछले कुछ दशकों से ईसाइयत अपनी ऐतिहासिक त्रासदियों पर पश्चाताप की प्रक्रिया अपना रही है। हिंदू समाज भी बदला है और उसने बौद्धिक रूप से कई कुरीतियों अस्पृश्यता सहित को तिलांजलि दे दी है। इस्लाम में आज तक वैसी आत्मसमीक्षा नहीं हुई है और न ही मुस्लिम आक्रांताओं के कुकृत्यों पर कोई खेद व्यक्त किया गया है।
वर्ष 1947 का विभाजन हिंदू-मुस्लिम के बीच इसी सभ्यतागत टकराव का दुष्परिणाम था, जिसे वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था। जहां पाकिस्तान और बांग्लादेश विशुद्ध इस्लामी राष्ट्र बन गए, वहीं खंडित भारत में ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ की विषैली मानसिकता आज भी जीवित है। मार्क्स-मैकाले मानसपुत्र इस खाई को पाटने के बजाय इसे और गहरा करते हैं। शांति तभी संभव है, जब इतिहास के साथ ईमानदारी बरती जाए, झूठे नैरेटिव तोड़े जाएं और घृणा फैलाने वाली मानसिकता पर खुली बहस हो। क्या ऐसा निकट भविष्य में संभव होगा?
