यूसीसीः राष्ट्रव्यापी एकरूपता की दिशा में ठोस कदम

यूसीसीः राष्ट्रव्यापी एकरूपता की दिशा में ठोस कदम
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उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू हुए एक वर्ष पूरा हो गया है। इस दौरान राज्य न केवल स्वतंत्र भारत में यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बना, बल्कि इसे सफलतापूर्वक संचालित कर एक मिसाल भी कायम की है। पिछले एक साल के दौरान राज्य में पांच लाख से अधिक पंजीकरण (जिनमें अधिकांश विवाह पंजीकरण हैं) की प्रक्रिया का सुचारु रूप से पूरा होना यह दर्शाता है कि यह कानून जमीनी स्तर पर स्वीकार्य है और प्रशासनिक रूप से भी इसे प्रभावी बनाया गया है। अब समय आ गया है कि इस सकारात्मक अनुभव के बाद यूसीसी को बाकी राज्यों में भी चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए।

उत्तराखंड के इस प्रयोग ने वर्षों से चले आ रहे उस डर को दूर किया है कि व्यक्तिगत कानूनों को बदलने से सामाजिक सामंजस्य बिगड़ सकता है। इसके विपरीत, यह कानून महिलाओं के सशक्तीकरण और समानता का वाहक बना है। ‘हलाला’, ‘इद्दत’ और बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर अंकुश लगाकर यह मुस्लिम महिलाओं के लिए न्याय सुनिश्चित कर रहा है। इसके साथ ही वसीयत और संपत्ति में बेटे-बेटियों को समान अधिकार देकर यह लैंगिक समानता की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है।

सबसे बड़ा फायदा कानून के सरलीकरण का हुआ है। अब विवाह और तलाक जैसे मामलों में धार्मिक भिन्नताओं के बजाय एक ही, पारदर्शी और ऑनलाइन प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है। सहजीवन संबंध के लिए पंजीकरण अनिवार्य करने से ऐसे रिश्तों में पारदर्शिता आई है और महिलाओं को कानूनी संरक्षण का भरोसा मिला है। ये सभी सुधार एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और न्यायसंगत समाज के लिए अपरिहार्य हैं, जिसकी परिकल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 में की थी।

पिछले एक साल में करीब पांच लाख लोगों ने शादियों का पंजीकरण करवाया है। इतना ही नहीं, तलाक, वसीयत पंजीकरण और सहजीवन संबंध के पंजीकरण जैसी सेवाओं को भी यूसीसी के जरिए डिजिटल, पारदर्शी और आसान बनाया गया है। एक साल में इन सेवाओं को लेकर करीब पांच लाख से अधिक आवेदन मिले हैं और 95 प्रतिशत मामलों का निपटारा हो चुका है। खास बात यह है कि इस दौरान किसी ने भी निजता के हनन की शिकायत दर्ज नहीं कराई।

उत्तराखंड में यूसीसी लागू हुए एक साल होने को है। इस पर मीडिया रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि यूसीसी से समाज के हर वर्ग को फायदा हुआ है, लेकिन महिलाओं को इससे सबसे अधिक शक्ति मिली है। जब यूसीसी लागू किया गया था, तब कई तरह की अटकलें लगाई गई थीं। किसी ने कहा था कि सरकार लोगों के घरों में झांकेगी, प्रेम विवाह पर पाबंदी लगा देगी। किसी ने यह भी कहा कि सहजीवन संबंध में रहने वालों को जेल में डाल दिया जाएगा और मुसलमानों को निकाह की बजाय फेरे लगाने होंगे। लेकिन ये सभी आशंकाएं बेबुनियाद साबित हुईं।

इसलिए किसी भी कानून पर टिप्पणी करने से पहले उसके अनुपालन और प्रभाव का इंतजार करना चाहिए। उत्तराखंड ने एक रास्ता दिखाया है। यहां यूसीसी लागू होने के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं, वे इस बात के लिए हौसला देते हैं कि ऐसा कानून अब अन्य राज्यों में भी लागू किया जा सकता है। आलोचक अक्सर तर्क देते हैं कि यूसीसी से विविधता खतरे में पड़ जाएगी, लेकिन उत्तराखंड का मॉडल यह साबित करता है कि सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए नागरिक संहिता समान हो सकती है, जबकि धार्मिक रीति-रिवाजों को मानने की स्वतंत्रता बनी रहती है।

अब जब गुजरात सहित अन्य राज्य भी यूसीसी लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तो यह केंद्र सरकार के लिए भी देशव्यापी कानून बनाने का सही समय है। उत्तराखंड ने ‘नया भारत, समृद्ध भारत’ का मार्ग दिखाया है। बाकी राज्यों को भी अपनी राजनीतिक हिचकिचाहट दूर कर, लैंगिक न्याय और सामाजिक सुधार को सर्वोपरि रखते हुए यूसीसी को अपनाना चाहिए। यह न केवल कानूनी समानता को बढ़ावा देगा, बल्कि ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के सपने को साकार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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