पीएसएलवी की दो विफलताएं: गुणवत्ता नियंत्रण पर पुनर्विचार का समय

जनवरी 2026 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के विश्वसनीय माने जाने वाले रॉकेट ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) का 64वाँ मिशन विफल हो गया। यह विफलता विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि यह मई 2025 में हुए पीएसएलवी-सी61 मिशन की असफलता के ठीक आठ महीने बाद हुई है। इससे इसरो के इस ‘कर्मठ रॉकेट’ की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
पीएसएलवी-सी62 मिशन, जिसका प्राथमिक पेलोड रणनीतिक ईओएस-एन पृथ्वी अवलोकन उपग्रह था, 15 अन्य सह-यात्री उपग्रहों के साथ श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित हुआ। शुरुआती चरण सामान्य रहे, लेकिन तीसरे चरण के अंत के करीब रॉकेट में ‘रोल रेट डिस्टर्बेंस’ देखा गया, जिससे वह अपने निर्धारित प्रक्षेपवक्र से भटक गया। इसके परिणामस्वरूप रॉकेट आवश्यक कक्षीय वेग प्राप्त नहीं कर सका और सभी 16 उपग्रह नष्ट हो गए।
यह लगातार दूसरी विफलता है, जिसमें समस्या रॉकेट के तीसरे चरण में उत्पन्न हुई है। मई 2025 में सी61 मिशन के दौरान भी तीसरे चरण में दबाव संबंधी समस्या सामने आई थी। इन समान लक्षणों से संकेत मिलता है कि यह केवल एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि गुणवत्ता आश्वासन और विनिर्माण प्रक्रियाओं में संभावित प्रणालीगत खामियों का परिणाम हो सकता है।
सबसे बड़ी चिंताओं में से एक विफलता विश्लेषण रिपोर्टों में पारदर्शिता की कमी है। सी61 मिशन के बाद विफलता विश्लेषण समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई थी, बल्कि केवल प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपी गई थी। इसरो ने ‘संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण’ का आश्वासन देकर अगले प्रक्षेपण को हरी झंडी दे दी, लेकिन स्पष्ट कारणों के अभाव में ऐसा प्रतीत होता है कि मूल समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं किया गया था।
पीएसएलवी ने ऐतिहासिक रूप से मंगलयान और चंद्रयान-1 जैसे सफल मिशनों के माध्यम से भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को प्रदर्शित किया है, जिससे इसरो ने वैश्विक स्तर पर एक किफायती और विश्वसनीय अंतरिक्ष एजेंसी के रूप में ख्याति अर्जित की है। हालांकि, लगातार विफलताएँ इस प्रतिष्ठा को धूमिल कर सकती हैं और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता को कम कर सकती हैं। कई भारतीय स्टार्टअप्स ने भी अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए एलन मस्क की स्पेसएक्स जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का रुख करना शुरू कर दिया है।
इसरो को गुणवत्ता नियंत्रण प्रोटोकॉल को फिर से सुदृढ़ करने और विफलताओं के विश्लेषण में अधिक पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। पीएसएलवी के जरिए भारत ने उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के कारोबार में अग्रणी देश बनने की महत्वाकांक्षा पाल रखी है। मगर आशंका है कि लगातार दो नाकामियों के बाद इस रॉकेट लॉन्च के लिए बीमा राशि बढ़ जाएगी, जिससे इसरो के माध्यम से उपग्रह प्रक्षेपण कराने वाली देशों और कंपनियों के लिए लागत और अधिक बढ़ सकती है। इसके साथ ही विश्वास का संकट भी उत्पन्न हुआ है।
इस विकट स्थिति से निकलने का सबसे उपयुक्त तरीका यही होगा कि भारत सरकार और इसरो पूरी तरह पारदर्शिता बरतें। नाकामियों के लिए जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। आखिर बिना खामियों को पूरी तरह दूर किए अगले लॉन्च को कैसे हरी झंडी दी गई और यह निर्णय किस स्तर पर लिया गया यह देश को पता होना चाहिए।
अंतरिक्ष अन्वेषण एक जटिल और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र है, और विफलताएं सीखने का अवसर प्रदान करती हैं। इन झटकों से निराश होने के बजाय इसरो को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर विफलता का ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए और भविष्य के मिशनों के लिए प्रणालीगत सुधार किए जाएँ। भारत की अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा के लिए गुणवत्ता और विश्वसनीयता सर्वोपरि होनी चाहिए।
