‘इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस’: ट्रंप का एक और मकड़जाल

डोनाल्ड ट्रंप जब से अमेरिकी राष्ट्रपति बने हैं, वे अपने निर्णयों को लेकर लगातार सुर्खियों में हैं। टैरिफ के बाद उन्होंने दावोस में एक नया जुमला पेश किया, जिसका नाम उन्होंने दिया ‘इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस’। ट्रंप का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र पुरानी बात है, बीता वक्त, यानी गुजरा हुआ कल है। अब दुनिया के तमाम मसले ‘इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस’ सुलझाएगा।
ट्रंप ने दावा किया कि दुनिया के 60 से ज्यादा देशों ने उनके इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस का सदस्य बनने पर सहमति दी है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन भी इस पीस बोर्ड में कुछ शर्तों के साथ शामिल होने के लिए तैयार हैं। दरअसल, ट्रंप ने इस बोर्ड में शामिल होने के लिए भारत को भी आमंत्रित किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दावोस में हो रही बैठक में बुलाया गया था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी वहां नहीं गए। ‘इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस’ में प्रधानमंत्री शामिल होंगे या नहीं, इस पर विदेश मंत्रालय गृहकार्य कर रहा है।
ट्रंप जिस तरह विश्व व्यवस्था को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, उसके बाद यह सवाल उठता है कि क्या अब पूरी दुनिया ट्रंप के इशारे पर चलेगी? क्या वाकई संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व खत्म हो जाएगा? क्या पैसे और हथियारों के दम पर अमेरिका दुनिया के बाकी देशों को डराएगा? इन सबका भारत पर क्या असर होगा और भारत की रणनीति क्या होगी, यह विचारणीय है।
ट्रंप ने दावोस में ‘इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस’ लॉन्च किया, इसके चार्टर पर दस्तखत किए और खुद इसके आजीवन अध्यक्ष बन गए। हालांकि पहले जब ट्रंप ने गाजा में शांति समझौते के तहत इस बोर्ड के गठन की घोषणा की थी, तब इसे सिर्फ गाजा और मध्य एशिया की जिम्मेदारी देने के लिए कहा गया था। लेकिन अब यह बोर्ड दुनिया के किसी भी मसले को सुलझाने और उसमें दखल देने के लिए स्वतंत्र होगा।
माफिक, ट्रंप का तर्क यह है कि संयुक्त राष्ट्र दुनिया में हो रही समस्याओं का समाधान नहीं कर पाया, इसलिए बोर्ड ऑफ पीस बनाने की जरूरत पड़ी। ‘इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस’ के अध्यक्ष के तौर पर सबसे पहले ट्रंप ने चार्टर पर दस्तखत किए। इसके बाद हंगेरी, बेलारूस, इंडोनेशिया, मिस्र, अजरबैजान, बहरीन, मोरक्को, कजाखिस्तान, वियतनाम, पाकिस्तान, अर्जेंटीना और आर्मेनिया के नेताओं ने भी चार्टर पर हस्ताक्षर किए।
इसके अलावा जॉर्डन, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे इस्लामिक देशों ने भी ट्रंप के ‘इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का फैसला किया। दुनिया में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ट्रंप का यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के समानांतर काम करेगा या उसकी जगह लेगा।
अभी बहुत ज्यादा स्पष्टता नहीं है, और किसी को भी पूरी तरह पता नहीं है कि ट्रंप की योजना क्या है। इसीलिए भारत, फ्रांस, जर्मनी, चीन और ब्रिटेन ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के आमंत्रण पर अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। तमाम देशों को दुविधा इसलिए है क्योंकि इसे पहले गाजा के पुनर्निर्माण के लिए लॉन्च किया गया था, लेकिन इसके चार्टर में बोर्ड को एक अंतरराष्ट्रीय संगठन बताया गया है, जो पूरी दुनिया में शांति और स्थिरता बढ़ाने के लिए काम करेगा।
ट्रंप की यह बात सही है कि संयुक्त राष्ट्र अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी कई बार यह सवाल उठाया है। लेकिन सवाल यह है कि बोर्ड ऑफ पीस दुनिया की उन समस्याओं को सुलझाएगा, जो संयुक्त राष्ट्र नहीं सुलझा पाया? इस पर भरोसा कैसे किया जाएगा कि ट्रंप का बोर्ड संयुक्त राष्ट्र का स्थान ले सकता है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ पीस’ पर फिलहाल केवल ट्रंप का वर्चस्व रहेगा, क्योंकि यह बोर्ड बनाने से पहले दूसरे देशों से कोई चर्चा नहीं की गई थी। यह सिर्फ राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश से बना है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की विश्वसनीयता तब बनती है जब अन्य देश उस पर भरोसा करें। फिलहाल बोर्ड ऑफ पीस ने वह भरोसा अभी तक हासिल नहीं किया है।
