वामपंथ का ढहता किला

भारतीय जनता पार्टी एक-एक कर देश के सभी बड़े राज्यों में कब्जा करती जा रही है। अब केवल कुछ ही राज्य ऐसे बचे हैं जो उसकी पकड़ से दूर हैं। इनमें पश्चिम बंगाल और केरल शामिल हैं, जहाँ वह गंभीरता से रणनीति बनाने में जुटी है ताकि वामपंथ का किला पूरी तरह ढहाया जा सके। इन दोनों राज्यों में अप्रैल 2026 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा की रणनीति का ही परिणाम है कि एसआईआर को लेकर विपक्षी दल बेहद परेशान हैं। खासकर पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों के बाहर होने की चर्चा से ममता बनर्जी को हार का डर अभी से सताने लगा है।
वहीं केरल में कांग्रेस और माकपा अदल-बदल कर सत्ता में आती रही हैं। काफी मेहनत के बाद भी भाजपा अब तक यहाँ अपने पैर नहीं जमा पाई थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा पूरे देश में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने दक्षिण भारत को छोड़कर लगभग पूरे देश में अपना झंडा गाड़ दिया है, हालाँकि अभी भी कुछ राज्यों में वह सत्ता से दूर है। लोकतंत्र में सत्ता में आने से पहले विपक्ष में रहना आवश्यक होता है, और वामपंथ का किला अब ढहता हुआ दिखाई दे रहा है।
भारतीय राजनीति में अधिकांश दलों ने इसी तरह अपनी जगह बनाई है। दक्षिण भारत के दो राज्य तमिलनाडु और केरल भाजपा के लिए अब भी चुनौती बने हुए हैं, लेकिन धीरे-धीरे भाजपा ने इन राज्यों में भी अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी है। हाल ही में केरल के स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने बड़ी जीत के साथ वापसी की है। केरल में परंपरा रही है कि एक बार यूडीएफ और एक बार एलडीएफ सत्ता में आता है, लेकिन पिछली बार यह परंपरा टूट गई थी और एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार सरकार बना ली।
स्थानीय चुनाव परिणामों से संकेत मिलता है कि यूडीएफ एक बार फिर वापसी कर सकता है। वामपंथ धीरे-धीरे भारत से समाप्त होता जा रहा है, हालाँकि यह प्रवृत्ति पूरी दुनिया में देखने को मिल रही है। केरल को वामपंथ का आखिरी किला माना जाता रहा है। भले ही यूडीएफ ने इन चुनावों में वापसी की उम्मीद जगाई हो, लेकिन इससे इतर चर्चा भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की तिरुवनंतपुरम में जीत की भी है। यह जीत कई मायनों में भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
केरल में वामपंथी दल को यूडीएफ की जीत के साथ-साथ तिरुवनंतपुरम में एनडीए की जीत से सबसे बड़ा झटका लगा है। एनडीए पहले ही त्रिपुरा में वामपंथ को सत्ता से और पश्चिम बंगाल में विपक्ष की भूमिका से बाहर कर चुका है। प्रधानमंत्री मोदी की कल्याणकारी योजनाओं का प्रतिफल यह है कि भाजपा ने केरल में अपने पाँव जमाने शुरू कर दिए हैं। 1952 से भाजपा यहाँ काम कर रही है, लेकिन लंबे समय तक उसे सफलता नहीं मिली। अब ऐसा प्रतीत होता है कि जमीनी स्तर पर किए गए प्रयासों का लाभ मिलने लगा है।
आने वाले अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री पी. विजयन को यूडीएफ के साथ-साथ एनडीए से भी चुनौती मिल सकती है। वामपंथी दल के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि तिरुवनंतपुरम में पिछले 45 वर्षों से चले आ रहे उसके वर्चस्व को यूडीएफ ने नहीं, बल्कि एनडीए ने चुनौती दी है। भाजपा के तीसरी शक्ति के रूप में उभरने की संभावना से वामपंथ को केरल में अपने अस्तित्व पर खतरा नजर आने लगा है।
भाजपा की बढ़ती ताकत दोनों गठबंधनों के लिए खतरे की घंटी है। यह कहना सही नहीं होगा कि भाजपा अगले चुनावों में कोई बड़ा चमत्कार करने जा रही है, लेकिन वह मजबूती से लड़ने की शक्ति जरूर जुटा रही है। अब भाजपा को पूरी तरह से नकारना दोनों गठबंधनों के लिए आसान नहीं रह गया है। भाजपा की बढ़ती ताकत यह दर्शाती है कि निरंतर प्रयास का परिणाम हमेशा सकारात्मक होता है। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि केरल की जनता के सामने भाजपा अब एक तीसरे विकल्प के रूप में उभर रही है। यदि भाजपा केरल में कोई बड़ा चमत्कार करती है, तो यह वामपंथ के लिए ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता हैऔर भाजपा का लक्ष्य भी यही है कि देश से कांग्रेस और वामपंथ का राजनीतिक प्रभाव समाप्त किया जाए।
