काल-क्रंदन और विलुप्त हृदय-स्पंदन

काल-क्रंदन और विलुप्त हृदय-स्पंदन
X
प्रोफेसर आनंद पाटील

‘व पापात’ के दो वर्षों की पूर्णता के उपरांत एक वर्ष का विरक्तिपूर्ण अंतराल अकृतार्थ कर्म और अकारथ उथल-पुथल में गुजर गया। समर्पित, निष्कंप, निष्ठापूर्ण और न्यायसम्मत कार्यों के बावजूद सुमति व सुफल की प्राप्ति नहीं हो सकी। जब (नाना कारणों से) उथल-पुथल हो, तो लोगों को डेढ़-सी बातें (किंवदंतियाँ) बनाने का पर्याप्त अवसर मिलता है। उठा-पटक के लोग अपने (कु)कर्मों को छिपा या भुलाकर, दाँत पीस-पीसकर बातें बनाने का अखंड उपक्रम करते हैं। दूर से आए लोगों में, इस उपक्रम-स्वरूप उन्हें प्राकृतिक न्याय (अपनी वकालत) का यथेष्ट अवसर मिलता है। ऐसे नाना ‘तथाकथितों’ को उनकी सुविधा के अनुसार बहुलांश न्याय मिलता भी है।

इस बीच, अनेक प्रसंगों में यह पुनः सिद्ध हुआ कि सोहबत का प्रभाव कई रूपों में, कई स्तरों पर निर्णायक की भूमिका निभाता है। इस अंतराल में यह समझ अधिक स्पष्ट हुई कि लोग बड़े बतकहीन होते हैं। कुछ न कर सकने की स्थिति में, वे अपने स्व-कल्पित विरोधियों (शत्रुओं) को बातों से ही कूट डालते हैं, और वे बातें कूट (कोड) रूप में संकुचित या विस्तारित होकर अंततः जगत-व्यापी बन जाती हैं।

इस अंतरालावधि के संबंध में बहुत बात देकर सोचा-विचारा जाए और संतोष का कोई कोना अंतरा खोजा जाए, तो इस बात का संतोष अवश्य ही किया जा सकता है कि लोगों (?) को इस तरह से ‘सुजनकामी’ बनाने का अभूतपूर्व कार्य निश्चय ही हुआ है। जबकि जीवन की धन्यता के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है, किंतु विषम-संतोषियों के मध्य संतोष-खोज का ही यह विषय हो सकता है।

न लिख पाना अत्यंत पीड़ादायक है। ‘न लिख पाने’ के पीछे जो-जो कारण रहे, उनकी गणना से कोई लाभ नहीं होगा। समग्र इतिहास तटस्थता के साथ यही बताता है कि आपने जो भी सोचा-विचारा हो, उसे शब्दबद्ध किया या नहीं। क्यों नहीं लिख पाया? सूजन-विरक्ति की दुःख-गाथा सुनने में किसी की रुचि नहीं हो सकती।

सहज ही, प्रासंगिकता यहाँ अनुपयुक्त होते हुए भी एक प्रसंग सूरदास का स्मरण आ रहा है। कहते हैं, वे गा रहे थे—

‘प्रभु, हो सब पतितन को टीको

और हों हरि सब पतितन को नायक।’

वल्लभाचार्य दीनतापूर्ण पदों से रससिक्त न हो सके। कहते हैं, लगभग डाँटकर कहा कि ‘सूर है के ऐसो चियात काहे को हो, कसु भगवत-लीला वर्णन करो।’

यह बात और है कि इधर अपने ही कर्मों (कारणों) से चिढ़ियाने या बड़बड़ाने, सुबुकने वालों को बड़े चाव और मनोभाव से सुना जाने लगा है।

चिढ़ियाने और खुबुकने वाले कहते जाते हैं

‘तो विश्वास होइ मन मेर,

ओरो पतित बुलाऊँ।

वचन बाँह ले चालौं, गाँठ दे,

पाऊँ सुख अति भारी।’

वे चिचियाते हैं और श्रोता गदगद होते जाते हैं। सुनते-सुनते प्रायः श्रोताओं का विवेक सुन्न (शून्य) हो जाता है। कहना न होगा कि सुनने वाले महाप्रभु वल्लभाचार्य के उस भक्तिवाद (भावना) को आत्मसात करने की स्थिति में नहीं आ पाते हैं। यह घोर चिंता का विषय है।

अंततः, न लिख पाने की पीड़ा से जैसे-तैसे मुक्त होकर नूतन वर्ष में लिखने का पुनः संकल्प किया, तो बोधगया के भूमिपुत्र और हिंदी के फिल्मकार अभिजीत कुमार (शर्मा) स्मरण हो आए। उन्होंने बातों-ही-बातों में एक दिन कहा था—

“यदि राम या कृष्ण आज प्रकट होकर यह कह दें कि हमारी पूजा-आराधना से पहले अपने विद्यालय, न्यायालय और चिकित्सालय ठीक कर लो, तो क्या लोग सुनेंगे? इसी प्रश्न के आलोक में चिंतन की आवश्यकता है। यही प्रश्न बहुत कुछ निश्चित और निर्धारित करता है।”

वे कहते-कहते कह गए, किंतु कहते हैं दि रिसीवर इज़ इम्पोर्टेंट।

इधर, मेरे मन-मस्तिष्क में पलटूदास बोल रहे थे

‘कारज धीरे होतु है, काहे होत अधीर।

समय पाय तरुवर फरे, केतिक साँचो नौर।’

किंतु तर्काधिष्ठित चिंतन-आलोचनात्मक दृष्टि, जो इधर कुछ काल से मूर्छित अवस्था में रही, धीरे-धीरे जाग्रत अवस्था में आई और मैंने देखा-सोचा कि अभिजीत कुमार जब यह कह रहे थे, तो उनके मन-मस्तिष्क में अपनी बिटिया के साथ-साथ भारत के किशोर, युवा और हमारे नानाविध विद्यालय, न्यायालय और चिकित्सालय रहे होंगे।

एक ओर हमारा महान संकल्प है कि हम अपनी प्राचीन, गौरवशाली ज्ञान-परंपरा को पुनः अर्जित कर अपनी स्वतंत्रता की सौवीं वर्षगांठ तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाएँगे, किंतु विचारवान मित्र-मंडली की ओर से जो चिंताएँ प्रकारांतर से प्रकट हो रही हैं, उन्हें अनदेखा-अनसुना करके आगे बढ़ जाना भी समीचीन प्रतीत नहीं होता।

मित्रवर राम और कृष्ण को चर्चा में उपस्थित कर अपने समय की वास्तविकता के दृष्टिगत हमें आत्ममंथन और आत्मालोचन के लिए उकसाने का प्रयास कर रहे थे। वे ऐसा इसलिए भी कर रहे थे कि आज आत्ममंथन और आत्मालोचन, बौद्धिक प्रामाणिकता और प्रतिबद्धता, तर्काधिष्ठित चिंतन और सम्यक अभिव्यक्ति शनैः-शनैः लुप्त होती जा रही है।

अपने वर्तमान में झांककर देखा, तो कई चेहरे दृष्टिपटल पर दौड़ गए और एक सभा पर स्मृति ठिठक गई। सभा में सभापति ने कहा था कि ‘सबके राम, सबमें राम’ विषय पर एक ग्रंथ-निर्माण किया जाए। उपस्थित विद्या-विशारदों ने गंभीर मुद्रा में अपनी सहमति जताई।

कुछ कालोपरांत जांच-पड़ताल हुई कि उस ग्रंथ-निर्माण की क्या स्थिति है। स्थिति का पता करना भी क्या कम जोखिम भरा काम है? यह उच्च-शिक्षित, विभूषितों की वास्तविकता है, जिनका कार्य है अध्ययन, विचार-चिंतन, सूजन और ज्ञानोन्नयन।

किंतु जहाँ अध्ययन, विचार-चिंतन और सूजन के प्रति अनघोर उदासीनता, विरक्ति और स्वार्थों व आकांक्षाओं के दृष्टिगत चुटकुलेबाजी, कानाफूसी और चापलूसी घर कर जाए, वहाँ ज्ञान-परंपरा का क्षरण ही होगा, उद्धार कदापि नहीं।

तब प्रतीत हुआ कि हमारे जीवनानुभवों के माध्यम से उपस्थित उक्त उद्गार आत्ममंथन का कारण बनने के बजाय एक और भावात्मक उद्धरण बन जाने की संभावना से ओत-प्रोत है।

Next Story