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सूत न कपास हवा में लठम लट्ठ

नवल गर्ग

सूत न कपास हवा में लठम लट्ठ

यही हो रहा है। पिछले डेढ़ महीने से भी ज्यादा हो गया। विरोध करने वाले और उन्हें उकसाने वाले अथवा विरोधी दल के सर्वेसर्वा से अदने सर्वहारा तक सारे खैरख्वाह, यह बता पाने में असमर्थ हैं कि सीएए, एनआरसी अथवा एनपीआर में ऐसा एक भी शब्द किस पन्ने में - कहां पर है जो मुस्लिम समाज के सदस्यों की आशंकाओं/ भ्रमों को बल देता हो। एक भी व्यक्ति इनके सम्बंध में कोई आधारभूत जानकारी न तो रखता है, न ही रखने की इच्छा रख रहा है। केवल विरोध के लिए विरोध- इस नकारात्मक माहौल को केन्द्र सरकार बड़ी समझबूझ से सुलझाने की कोशिश कर रही है। लेकिन विरोधी दलों के लीडरान को यह सुनहरा अवसर मोदी जी की सरकार को परेशान करने का मिल गया है। वे इसका भरपूर लाभ ले रहे हैं।

इसीलिए उग्रता बढ़ रही है और विरोध के झण्डे आसमान में लहराए जा रहे हैं। इसका सीधा - सा अर्थ यह है कि उनको यह बहका दिया गया है कि हमें तो विरोध करना है, हमें सही से कोई मतलब ही नहीं है। छोटे बच्चों से लेकर बड़ों तक सुनी सुनाई बातों, अफवाहों से प्रेरित अधकचरी जानकारी को सहेज कर अपने दिमाग में इसको सड़ा रहे हैं। फिर उन्हें लगातार विषैले नारों और तकरीरों के जरिए अनजान भोले लोगों के समक्ष उगल रहे हैं। ऐसे में समरसता तो खत्म होगी ही स्व प्रेरित भय और अराजकता का माहौल भी बन रहा है। फिर कहने का मौका मिलता है कि हम भयग्रस्त हो रहे हैं।

अब जरा इसका बारीक विश्लेषण करके भी देखें तो स्पष्ट है कि जो भी विरोध हो रहा है वह विशुद्ध आधारहीन होकर केन्द्र की सुदृढ़, प्रचण्ड बहुमत वाली विकासोन्मुखी सरकार के कार्यों की सुदृढ़ गति को पटरी से उतारने की नीयत से हो रहा है।

किसी ने क्या खूब कहा है --

वजह कुछ और थी, कुछ और ही बताते रहे...!

अपने थे इसलिये, कुछ ज्यादा ही सताते रहे...!!

मोदी सरकार या भाजपा की राज्य सरकारों ने जिस वर्ग के साथ समानता का व्यवहार करते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा में बखूबी शामिल करके जीवन जीने के लिए रोजमर्रा की मुसीबतों को कम करने और दकियानूसी रूढिय़ों से आजाद कराने का सराहनीय काम किया है उसे ही स्वअर्जित भय के वातावरण के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

पिछले दिनों जब एक चैनल पर देश के विधि मंत्री तथाकथित आंदोलनकारियों से रूबरू हुए तो साफ दिखा कि आंदोलन के पुरोधाओं के पास कोई छोटा सा बिंदु भी ऐसा नहीं था जिससे उनके धरना आंदोलन को उपयुक्त मानने की कोई वजह हो। इसीलिए उनके एक नेता को कहना पड़ा कि हमारा सीएए से कोई विरोध नहीं है पर हम एनआरसी से डरते हैं। एनआरसी तो अभी आया ही नहीं है। एनआरपी जनगणना से सम्बन्धित सामान्य प्रक्रिया का अंग है। हर बार की तरह इस बार भी उसी की तैयारी शुरू हुई है। फिर यह विरोध का हास्यास्पद प्रहसन क्यों?

नमो के लिए कुछ कहना हो तो उन्होंने जिस तरह से देश और दुनिया में अपने काम के द्वारा अपनी साख बनाई है उसे कोई भी झुठला नहीं सकता। उनके लिए किसी शायर की ये पंक्तियां ठीक लगती हैं --

कीमती हार की तरह गले में डाल के रखता हूँ,,

मैं अपनी जि़म्मेदारियां बहुत सम्भाल के रखता हूँ..

फिर भी बिना किसी आधार या कारण के विकास की हवा में शिगूफे छोड़कर शुद्ध हवा व पानी को प्रदूषित करने का प्रयास अगर हो रहा है तो उसकी तह तक जाने और धैर्य के साथ ऐसे लोगों को समझाने और दंगाइयों के विरूद्ध कठोर कार्यवाही की जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि मुस्लिम समुदाय के सभी लोग इस बेसिर पैर के विरोधी प्रदर्शन धरने की राजनीति के चक्कर में आ गये हों। पर वे यह जानते हुए भी कि केन्द्र सरकार का कोई भी कदम उनके खिलाफ नहीं है, यह कह नहीं पा रहे। सलीम ख़ां फऱीद फरमाते हैं -

बोले आखिर कौन सभी चुप रहने के अभ्यस्त हुए।

एक और नवगीत में वे कहते हैं --

मैली मैली चादर सबकी जिस पर उजले दाग़।

अजब तमाशा देख रहे सब चले सूत पर आग।

सवाल यह है कि कुछ नहीं को सब कुछ बता कर यह जो हौवा खड़ा किया गया है उसकी सही तरह से हवा निकले, समरसता और आपसी प्यार वापिस लौटे, झूठ का घटाटोप भंग किया जाये इस दिशा में सबको अपने अपने स्तर पर पूरी ईमानदारी से प्रयास करना चाहिये। यदि नीयत अच्छी है और मन में सद्भावना और ईमानदारी है तो बेबुनियादी जिद और मूढ़ हठ के हिमालय को पिघलना ही पड़ेगा, पिघलेगा भी।

(लेखक पूर्व जिला न्यायाधीश हैं।)

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