समाज ही सर्वोपरि, संघ केवल उत्प्रेरक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह कार्य आज से नहीं कर रहा है। राजकीय भागवत शताब्दी वर्ष में संवाद यात्रा पर हैं। नई दिल्ली से प्रारंभ हुई यह यात्रा बेंगलुरु, कोलकाता के बाद अब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में है। एक संगठन, जिसने अपने अतुलनीय त्यागमय जीवन के यशस्वी 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हों, समाज के एक-एक वर्ग के प्रमुख जनों से न केवल भेंट करना, बल्कि उनसे प्रश्न और आशंकाएँ आमंत्रित करना-यह अपने आप में एक साहसिक पहल है। विगत निकट इतिहास को तो छोड़िए, भूतकाल में भी किसी ने इतना पारदर्शी प्रयास किया हो, इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। यह संघ ही कर सकता है और वह कर रहा है।
संघ को देखकर उसका बाह्य स्वरूप बदला हुआ प्रतीत होता है, परंतु डॉ. हेडगेवार से लेकर सुदर्शन जी तक संघ में समाज-विमर्श की परंपरा रही है, जिसे आज डॉ. भागवत और अधिक व्यापक स्वरूप में आगे बढ़ा रहे हैं। इस पहल को न केवल देश में, बल्कि वैश्विक जगत में भी गहन दृष्टि से समझा जा रहा है। नई दिल्ली में विदेशी राजनयिकों की उपस्थिति इसका प्रमाण है। देश में हर वर्ग के विशिष्ट जन अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज करा रहे हैं, जो संघ की स्वीकार्यता को दर्शाता है।
संघ ने अपनी दस दशकों की यात्रा में अनेक संकट, छल-प्रपंच, षड्यंत्र और आरोप सहन किए हैं और आज भी कर रहा है, परंतु संघ स्वयं इनसे अप्रभावित और अविचलित रहा है। क्या संघ को समझना इतना कठिन है? क्या संघ का विरोध करने वाले सभी अप्रामाणिक हैं? क्या वे राष्ट्रभक्त नहीं हैं? स्वयं संघ ऐसा नहीं मानता।
संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के शब्दों में यदि संघ के विषय में प्रामाणिक वर्गों में भी मतभेद हैं, तो इसके लिए और कोई नहीं, स्वयं डॉ. हेडगेवार ही दोषी हैं। कारण यह कि उनकी दूरदृष्टि, उनकी परिकल्पना और उनकी मेधा इतनी अपूर्व थी कि वे जो देख पाए या कर पाए, उसकी कल्पना सामान्यतः की ही नहीं जा सकती। वे कहते हैं.यह इतिहास में होता आया है। ऐसी दिव्य विभूतियाँ हुई हैं जिन्हें अपने जीवनकाल में अनेक संकटों का सामना करना पड़ा। संत ज्ञानेश्वर हों, ईसा मसीह हों या फिर सुकरात इन सभी के जीवन में यह सत्य स्पष्ट दिखाई देता है।
संघ की तुलना यदि किसी से करनी है, तो उसकी तुलना केवल संघ से ही की जा सकती है। संस्कृत में एक श्लोक है-
गगनं गगनाकारं, सागरः सागरोपमः।
रामरावणयोर्युद्धं, रामरावणयोरिव॥
अर्थात आकाश की तुलना आकाश से ही की जा सकती है, समुद्र की तुलना समुद्र से ही। इसी प्रकार राम-रावण युद्ध की भीषणता की तुलना भी राम-रावण युद्ध से ही संभव है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ भी यही स्थिति है।
अपने 100 वर्षों की यात्रा में संघ, अपने विचार से प्रेरित अभूतपूर्व संघ-दृष्टि के साथ, 43 विविध संगठनों के माध्यम से समाज-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को न केवल स्पर्श कर रहा है, बल्कि सकारात्मक परिवर्तन का वाहक भी बन रहा है। संघ स्वयं इसका श्रेय नहीं लेता और इसे समाज का ही पुरुषार्थ बताता ही नहीं, बल्कि मानता भी है। वह कहता है कि संघ-विचार एक राष्ट्रीय चेतना है और यह विचार उसका स्वयं का नहीं, बल्कि सनातन है।
संघ यह भी कहता है कि वह स्वयं में कुछ भी नहीं है। हम समाज के भीतर (within the society) कोई संगठन नहीं हैं, बल्कि हम समाज के ही (of the society) हैं-सम्पूर्ण समाज को संगठित करने के लिए निकले हैं। संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार के शब्दों में देश में दो ही प्रकार के लोग हैं: एक वे जो हमसे सहमत हैं और दूसरे वे जो असहमत हैं। जो असहमत हैं, वे हमारे विरोधी नहीं हैं; बस हम अपनी बात ठीक से उन तक पहुँचा नहीं पाए हैं। जिस दिन वे समझ जाएँगे, वे हमारे साथ होंगे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने यशस्वी इतिहास के इस चरण में अपने युगीन कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है। संघ यह अनुभव करता है कि उपेक्षा, विरोध और विस्तार के चरणों के बाद अब वह अनुकूलता के काल में प्रवेश कर चुका है। आज संघ के पास जो शक्ति है, उसके माध्यम से वह समाज की सज्जन शक्तियों के साथ संपर्क और संवाद बढ़ाना चाहता है, ताकि देश को सर्वोच्च शिखर पर ले जाने के स्वप्न को पूर्ण किया जा सके।
संघ इसका श्रेय भी स्वयं नहीं लेना चाहता। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के शब्दों में “समाज परिवर्तन का टेंडर संघ के नाम नहीं निकला है। यह कार्य समाज को ही करना है। संघ की भूमिका केवल उत्प्रेरक की है।” संघ की यह मान्यता और विश्वास है कि समाज-जीवन के प्रश्नों, शंकाओं और समाधानों का उत्तर समाज को ही देना है।
डॉ. मोहन भागवत का दो दिवसीय प्रवास आज से
युवाओं को देंगे मार्गदर्शन, प्रमुखजनों से करेंगे संवाद
भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का दो दिवसीय राजधानी प्रवास आज से प्रारंभ होगा। भोपाल विभाग द्वारा शुक्रवार को आयोजित कार्यक्रम में वे युवाओं को मार्गदर्शन देंगे तथा सायंकाल संगोष्ठी में प्रमुखजनों से संवाद करेंगे। दूसरे दिन वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए सामाजिक सद्भाव बैठक और शक्ति संवाद समारोह को संबोधित करेंगे।
इससे उपस्थित जनों को देश और समाज निर्माण में अपनी भूमिका तय करने में सहायता मिलेगी। शताब्दी वर्ष में हो रहे इस आयोजन के माध्यम से संगठन को लेकर उठने वाली जिज्ञासाओं का समुचित समाधान भी प्राप्त होगा। राजधानी भोपाल में आयोजित युवा संवाद एवं शक्ति संवाद उसी दिशा में एक और महत्वपूर्ण कड़ी है।
समाज को चाहिए और समाज कर भी रहा है कि वह विचार-यज्ञ में अपनी सकारात्मक आहुति दे और अपने युगधर्म का पालन करे।
