Top
Home > स्वदेश विशेष > सार्वजनिक विमर्श में संघ की भूमिका

सार्वजनिक विमर्श में संघ की भूमिका

प्रमोद पचौरी

सार्वजनिक विमर्श में संघ की भूमिका
X

महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी ने भी संघ के कार्यक्रम में शामिल होने से कोई परहेज नहीं किया। इस कड़ी में राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण का नाम अग्रणी है। पंडित जवाहरलाल नेहरू आलोचक होने के बावजूद संघ की कार्यशैली की खूब सराहना किया करते थे। 1962 और 1965 के युद्धों में संघ की भूमिका हमेशा से प्रशंसनीय रही है। भारत-चीन युद्ध में सैनिकों की मदद करने पर देश के पहले प्रधानमंत्री ने गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने का भी न्यौता दिया था। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेता और दलित नेता दादासाहेब रामकृष्ण सूर्यभान गवई, वामपंथी विचारों वाले कृष्णा अय्यर और कुछ अरसे पहले वरिष्ठ पत्रकार और आप के नेता आशुतोष जैसे नाम इस कड़ी में शामिल हो चुके हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समय-समय पर विरोधी दलों या दूसरे मतावलंबियों, संगठन प्रमुखों को विमर्श के लिए अपने मंच पर आमंत्रित करता रहा है। हाल के दिनों में पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के नेता रहे प्रणब मुखर्जी की नागपुर यात्रा पर कांग्रेस ने असहमति व्यक्त की।

प्रणब दा का संघ मुख्यालय में भाषण देना अपने आप में एक बहुत बड़ी घटना थी। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस या संघ विरोधी पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति ने पहली बार संघ के कार्यक्रम में शामिल होने का प्रयास किया हो, लेकिन मुखर्जी का कार्यक्रम एक ऐसे दौर में हुआ जब लोक जीवन में परस्पर विरोधी विचारधारा वालों के बीच संवाद के पुल लगातार टूट रहे थे। सार्वजनिक विमर्श का स्तर तेजी से गिर रहा है और मीडिया (मेनस्ट्रीम और सोशल) गंभीर से गंभीर बहस को सिर्फ शोर में बदल रहा है। ऐसे में एक गरिमामय कार्यक्रम के लिए सरसंघचालक मोहन जी भागवत और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी दोनों बधाई के पात्र हैं। सामान्य शिष्टाचार का दोनों पक्षों ने भरपूर ध्यान रखा, लेकिन बातें वही कहीं जो उन्हें कहनी थी। मुखर्जी ने संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार को श्रद्धांजलि देते हुए विजिटर बुक (आगंतुक पुस्तिका) में उन्हें भारत माता का 'सच्चा सपूतÓ बताया, लेकिन भाषण में हेडगेवार या संघ का कोई मामला नहीं उठाया। भागवत जी ने एक बार हिंदू राष्ट्र शब्द का इस्तेमाल जरूर किया लेकिन उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि ऐसी कोई और बात ना कही जाए जिससे पूर्व राष्ट्रपति असहज महसूस करें। इस हिसाब से कार्यक्रम की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन अब इससे आगे की बात क्या इस कार्यक्रम के बाद अब संघ और बाकी विरोधी विचारधाराओं के बीच संवाद का सिलसिला आगे बढ़ पाएगा?

संवाद चाहता है संघ

संघ के बारे में प्राय: कहा जाता है वह तर्कशील लोगों के बजाय अनुयायी लोगों को पसंद करता है। कुछ लोग इसे फासीवाद संगठन की संज्ञा भी देते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या संघ विरोधी विचारधाराओं के साथ सचमुच संवाद चाहता है? इसका सीधा जवाब है- हां। कारण बहुत स्पष्ट है। संवाद के माध्यम से संघ बताना चाहता है उसे आप जो संज्ञा देते हैं वह वास्तव में वैसा है नहीं। वह मानवमात्र के कल्याण के लिए विश्वव्यापी सोच रखता है। तभी संघ अपने मंच से निरंतर आवाज उठाता आ रहा है कि आप पहले शाखा में तो आइए। संघ को समझिए। आस्था उसके लिए सर्वोपरि है। तभी उसके प्रचारक रात-दिन श्रम करते हुए पिछले 92 साल में लगातार आगे बढ़े हैं। अगर एपीजे अब्दुल कलाम या प्रणब मुखर्जी जैसे व्यक्तित्व संघ के कार्यक्रम में शामिल होते हैं तो कहा जा सकता है कि प्रमुख लोग भी संघ की बातों से प्रभावित हो रहे हैं।

महात्मा गांधी ने संघ के कार्यक्रम में शामिल होने से कोई परहेज नहीं किया। इंदिरा गांधी ने भी संघ की प्रशंसा की है। संघ की प्रेरणा से बने विवेकानंद शिला स्मारक के उद्घाटन कार्यक्रम में एकनाथ रानाडे के आमंत्रण पर इंदिरा गांधी शामिल हुई थीं। इस कड़ी में राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण का नाम अग्रणी है। पंडित जवाहरलाल नेहरू आलोचक होने के बावजूद संघ की कार्यशैली की सराहना किया करते थे। 1962 और 1965 के युद्धों में संघ की भूमिका प्रशंसनीय रही है। भारत-चीन युद्ध में सैनिकों का सहयोग करने पर देश के पहले प्रधानमंत्री ने गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने का भी निमंत्रण दिया था।

विरोधी विचार वालों को बुलाने की परंपरा

लगभग पिछले एक दशक से संघ के शिक्षा वर्ग समापन समारोह कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर किसी भिन्न मतों वाले व्यक्तित्व को बुलाने की परंपरा रही है। हालांकि विजयादशमी के कार्यक्रम में लंबे समय से मुख्य अतिथि बुलाए जाते रहे हैं। इसके अलावा अन्य अवसरों पर भी अलग विचारों वाले नेता, विचारक बुलाए गए हैं। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेता दादासाहेब रामकृष्ण सूर्यभान गवई, वामपंथी विचारों वाले कृष्णा अय्यर और कुछ समय पहले वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष जैसे नाम इस कड़ी में शामिल हो चुके हैं। मीनाक्षीपुरम में कुछ हिंदुओं द्वारा धर्म परिवर्तन कर इस्लाम स्वीकार किए जाने की घटना के बाद श्री गवई ने स्वयं संघ के कार्यक्रम में आने की इच्छा व्यक्त की थी और अपने विचार रखे थे। संघ के धुर-विरोधी और वामपंथी विचारक कृष्णा अय्यर ने स्थानीय विरोधों के बावजूद तत्कालीन सर संघचालक से संपर्क किया और बाद में पत्रकारों के सामने अपने विचार रखे थे। इतिहास में संघ स्वयंसेवकों के शिविरों को महात्मा गाँधी और भीमराव आंबेडकर की ओर से भेंट देने के उदाहरण दिए जाते रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित संगठन

शिक्षा क्षेत्र - विद्या भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय शिक्षण मंडल, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, संस्कृत भारती, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास

आर्थिक क्षेत्र - स्वदेशी जागरण मंच, लघु उद्योग भारती, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत, सहकार भारती, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ

सेवा क्षेत्र - राष्ट्रीय सेवा भारती, सक्षम, दीनदयाल शोध संस्थान, आरोग्य भारती, भारत विकास परिषद, राष्ट्रीय चिकित्सक संगठन

सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र - वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व हिन्दू परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, राष्ट्र सेविका समिति, भारतीय जनता पार्टी, विश्व विभाग, क्रीड़ा भारती, धर्म जागरण समन्वय विभाग, सामाजिक समरसता मंच, महिला समन्वय

सुरक्षा क्षेत्र - पूर्व सैनिक सेवा परिषद, सीमा जन कल्याण मंच, हिन्दू जागरण मंच

वैचारिक क्षेत्र - अखिल भारतीय साहित्य परिषद, अधिवक्ता परिषद, विज्ञान भारती, संस्कार भारती, अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति, प्रज्ञा प्रवाह

Updated : 2018-09-23T21:36:11+05:30
Tags:    

Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


Next Story
Share it
Top