गीतः आए हैं ऋतुओं के राजा

गीतः आए हैं ऋतुओं के राजा
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"ऋतुओं के राजा" कविता में वसंत ऋतु का स्वागत, प्रकृति की सुंदरता और जीवन में उमंग की झलक मिलती है।

गीत

आए हैं ऋतुओं के राजा

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मधुमय वासंती भोर भई, तज निद्रा-आलस अब जागें,

कर शारद का चंदन-वंदन, आओ माता से वर मांगें।

लगती प्यारी सुंदर बगिया, हैं सुमन खिले, पुलकित कलियां,

तितली-भौंरे आह्लादित हैं, पर सूनी अब तक क्यों गलियां।

तरुओं पर पक्षी गान करें, कोंपल सब आंखें खोल लखें,

चल रही पवन मनभावन है, आओ सखि, ऋतु का मान रखें।

अब ऐसा कुछ कर दिखलाएं, भय-बाधा संकट सब भागें।

कर शारद का चंदन-वंदन, आओ माता से वर मांगें।

आए हैं ऋतुओं के राजा, कर स्वागत हम नाचें-गाएं,

वासंती कर श्रृंगार सखी, हम आज प्रकृति को महकाएं।

खेतों में सरसों झूम उठी, इसके पीले हैं फूल खिले,

है चना-मटर का मन झंकृत, गेहूं को सुख भरपूर मिले।

गाती कोयल पंचम स्वर में, रसिकों को मीठे सुर लागें,

कर शारद का चंदन-वंदन, आओ माता से वर मांगें।

उड़-उड़ पतंग पीली-पीली, सब आसमान की सैर करें,

ऊंचे उठने को प्रेरित कर, तन-मन में सबके जोश भरें।

कोमल-कोमल है धूप खिली, सूरज की भृकुटी नहीं चढ़ी,

चहुं ओर खुशी का आलम है, प्रेमी युगलों की प्रीति बढ़ी।

है मन-मयूर करता नर्तन, कहता मायूसी अब त्यागें।

कर शारद का चंदन-वंदन, आओ माता से वर मांगें।

डॉ. अंजना सिंह सेंगर

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