दुर्लभ खगोलीय संयोग आज: सामान्य से बड़ा व चमकीला दिखेगा चंद्रमा

3 जनवरी 2026 की रात आकाश एक असामान्य खगोलीय स्थिति का साक्षी बनेगा। इसी रात वर्ष का पहला पूर्ण चंद्रमा वुल्फ सुपरमून के रूप में दिखाई देगा, जब चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत निकट होकर सामान्य से अधिक बड़ा और अधिक चमकीला नजर आएगा। यह स्थिति केवल दृश्य परिवर्तन नहीं है, बल्कि सूर्य–पृथ्वी–चंद्रमा की दुर्लभ ज्यामिति का परिणाम है। यह दृश्य खगोलीय गणनाओं की सटीकता और प्रकृति की नियमित शक्ति—दोनों को एक साथ उजागर करेगा।
यह सुपरमून इसलिए विशेष माना जा रहा है क्योंकि इसी समय चंद्रमा अपनी कक्षा के उस बिंदु पर होगा, जहां वह पृथ्वी के सबसे अधिक समीप होता है.जिसे खगोल विज्ञान में पेरिगी कहा जाता है। इस निकटता का सीधा प्रभाव उसके आकार और प्रकाश पर पड़ता है। सामान्य पूर्णिमा की तुलना में चंद्रमा अधिक बड़ा और कहीं अधिक चमकीला दिखाई देगा।
भारत में इसका पूर्ण चरण भले ही दोपहर में बने, पर इसका वास्तविक प्रभाव सूर्यास्त के बाद दिखाई देगा, जब पूर्वी क्षितिज से उभरता चंद्रमा असामान्य रूप से विशाल और प्रभावशाली लगेगा।
इस वर्ष वुल्फ सुपरमून को और अधिक उल्लेखनीय बनाता है एक दुर्लभ खगोलीय संयोग। ठीक 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट बिंदु पेरिहेलियन पर भी होगी। इसका परिणाम यह होगा कि सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा के साथ चंद्रमा पर पड़ेंगी, जिससे उसकी चमक में हल्की अतिरिक्त गहराई और तीव्रता दिखाई देगी। यद्यपि वैज्ञानिक दृष्टि से यह अंतर सूक्ष्म होता है, पर दृष्टिगत प्रभाव अत्यंत आकर्षक बन जाता है।
समुद्री क्षेत्रों में इस संयुक्त गुरुत्वीय प्रभाव के कारण ज्वार-भाटे सामान्य से कुछ अधिक ऊंचे उठ सकते हैं, जिससे प्रकृति की यह खगोलीय संगति धरती पर भी अपना असर छोड़ती दिखाई देगी।
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में यह पूर्णिमा पौष पूर्णिमा के रूप में प्रतिष्ठित है, जिसे आत्मशुद्धि और साधना का विशेष पर्व माना जाता है। इसी दिन से माघ मास का आरंभ होता है और प्रयागराज में कल्पवास की परंपरा प्रारंभ होती है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर लाखों श्रद्धालु स्नान कर मानसिक शांति और आत्मिक पवित्रता की कामना करते हैं।
यह तिथि शाकंभरी देवी को भी समर्पित मानी जाती है, जो अन्न, वनस्पति और जीवन-पोषण की अधिष्ठात्री हैं। जब यही पावन तिथि सुपरमून से जुड़ती है, तो उसका आध्यात्मिक प्रभाव और अधिक गहन हो जाता है।
वर्ष 2026 की शुरुआत इसी भाव के साथ होती है कि भीतर की रोशनी को पहचाना जाए, उसे दिशा दी जाए और अंधेरे से भयभीत होने के बजाय उसे समझा जाए.क्योंकि हर पूर्णिमा, विशेषकर यह वुल्फ सुपरमून, यह सिखाती है कि प्रकाश बाहर नहीं, भीतर से जन्म लेता है।
