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राजनीति की नीति का राज

तूणीर - नवल गर्ग

राजनीति की नीति का राज
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राजनीति आज की दुनिया में सर्वाधिक बोला जाने वाला शब्द है। चाहे बोलने वाला या वाली तथा सुनने वाला या वाली कहे हुए को समझ पायें अथवा नहीं लेकिन हर क्षेत्र में राजनीति शब्द प्रचलित होने लगा है। जैसे आपस की ठनाठनी में पति पत्नी से और पत्नी पति से यही कहते पाए जाते हैं कि तुमने मेरे साथ राजनीति खेल दी।

खेलों में राजनीति का होना तो आम बात है। व्यापार, शिक्षण जगत, बड़ी बड़ी कथाओं के आयोजकों, रामलीला मंडलों, रामलीला में आमंत्रित मुख्य अतिथियों --- सभी के जीवन में राजनीति होने, राजनीति करने के आक्षेप भी परस्पर लगते रहते हैं। तुर्रा यह कि अब राजनीति की भी जाती है।

दरअसल झूठ, फरेब, मक्कारी, चोरी-चकारी, सीनाजोरी, ठगी, धोखाधड़ी आदि का ही दूसरा नाम/ पर्याय 'राजनीति' को माना जाने लगा है।

प्रख्यात व्यंग्यकार स्वर्गीय 'श्री शरद जोशी जी' ने बहुत अरसा पहले 'राजनीति' शीर्षक के अपने एक लेख में बहुत सुन्दर तरीके से राजनीति की अनेक परिभाषाएं दीं जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

कुछ बानगी देखिए --राजनीति एक केंद्रहीन गोल चक्कर या चक्करों का सिलसिला है..... दसों दिशाओं में उसकी गति है जो अपने आप में दुर्गति है, मगर किया क्या जा सकता है, क्योंकि यही राजनीति है। जहाँ अधोगति अक्सर प्रगति और प्रगति दुर्गति लगती हो, उस बिंदु को राजनीति कहते हैं शब्दों के खेल को आगे बढ़ाते हुए कहूँ तो यही उसकी सद्गति है। ...राजनीति एक स्त्री है जो ऐसे सुकोमल बच्चों को जन्म देती है जो आगे चलकर विषैले सांप और भुजंग बन जाते हैं।....

...राजनीति निष्ठावान और ईमानदारों की मालकिन और बेईमानों और धोखेबाजों की दासी है... सही तो यह है कि ....राजनीति सबकी होकर भी किसी की नहीं है। ....यों जब जिसकी हो जाए, उसकी है।....

...राजनीति एक कचरा पेटी है, जिसे खुली तिजोरी की गरिमा प्राप्त है। कचरा पेटी में जो कचरा है वह तिजोरी का रत्न कहलाता है। ...राजनीति महायात्रा है। वह कुर्सियों के प्रदेश तक भेडिय़ों की महायात्रा है। ....राजनीति ऊष्मा है, गरमी है...

माननीय शरद जोशी जी के ये धारदार शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने इसी लेख में शब्द की दयनीय स्थिति की व्याख्या करते हुए कहा है कि राजनीति में शब्द झूठ के माध्यम हैं और वे लगातार भार ढोते हैं। राजनीति में शब्द केंचुए का जीवन जीते हैं, जिनकी न रीढ़ होती है न दिशा।...?

अभी हाल ही में हुए पंच राज्यीय चुनाव महासंग्राम में 'शब्द' की जो फजीहत हम सबने देखी है उससे शब्द और भाषा से सरोकार रखने वाला हर व्यक्ति आहत हुआ है। स्तरहीनता भी घबड़ा जाए, शरमा जाए, इतने नीचे स्तर तक उतर कर बबुआ लोगों ने भाषा की गरिमा को तार-तार किया है और माननीय उच्चतम न्यायालय में मुंह की खाने के बाद भी जिस तरह से वो अभी भी उसी गंदले कीचड़ में आनंद मना रहे हैं, वह स्तब्ध कर देने वाली स्थिति है।

शब्दों को झूठ ढोने के लिए विवश होना पड़ रहा है। दूसरों के सत्य को असत्य साबित करने में असफल होने के बाद भी अपने असत्य को सत्य बताने के लिए अड़े इन 'राहु(फे)लÓ बबुआ लोगों का प्रपंच तो नग्न हो गया पर इनकी चीख चिल्लाहट यथावत् है।

बकौल शरद जी, .... राजनीति में झूठ बयान की स्पष्टता और गरिमा से सामने आता है।... बयान होने पर भी निरर्थक होते हैं, निरर्थक होने पर भी बयान होते हैं।.... शब्द अर्थहीन और अर्थ शब्दहीन हो जाता है।

*दोनों हीन होते हैं, महीन होते हैं, ज़हीन कभी नहीं होते।....

हमने हाल ही में तीन राज्यों में सत्तानसीन हुए दल के आकाओं द्वारा आम सभाओं में और सोशल मीडिया पर जिस तरह से शब्द और अर्थ की चालाकी पूर्ण फजीहत होते देखी है उससे लगता है माननीय शरद जोशी जी के व्यंग्य लेख में लिखे शब्द अक्षरश: सत्य होते जा रहे हैं।

और जब व्यंग्य व्यंग्य न रहकर हकीकत बन जाए तो साहित्य की इससे अधिक विडंम्बना और कुछ नहीं हो सकती।

बंधु! राजनीति का यही राज है कि इसकी कोई नीति नहीं है। राजनीति केवल और केवल भूल भुलैया है।

(लेखक पूर्व जिला न्यायाधीश एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Updated : 23 Dec 2018 8:12 AM GMT
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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