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सिख दंगों का जिन्न फिर जागा - अपने ही बयानों में फंसते क्यों हैं राहुल

कौन नहीं जानता कि सिख दंगों को लेकर देश भर में हजारों कांग्रेसियों पर मुकदमे चले हैं, हजारों कांग्रेसी सिखो के जान और सिखों की संपतियों के नुकसान के गुनहगार रहे हैं।

सिख दंगों का जिन्न फिर जागा - अपने ही बयानों में फंसते क्यों हैं राहुल
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- विष्णुगुप्त

सिख दंगों का जिन्न एक बार फिर जाग गया, सिख दंगों के जिन्न को खुद राहुल गांधी ने जगाया है जो अपने आप को नरेन्द्र मोदी का विकल्प प्रस्तुत करने की कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। अपने आप को नरेन्द्र मोदी का विकल्प प्रस्तुत करने के लिए राहुल गांधी देश से लेकर विदेश तक दौड लगा रहे हैं। पर जल्दीबाजी कहें, या फिर उतावलापन कहें, नासमझी कहें या फिर खुशफहमी कहें, रह-रह कर वे ऐसे बयान दे देते हैं जिसके परिधि में वे ही खडे हो जाते हैं, उनकी ही आलोचना शुरू हो जाती है, जगहंसाई होती है, कांग्रेस पार्टी संकट और अविश्वसनीयता के घेरे में घिर जाती है। सिख दंगों को लेकर ही उनका बयान राजनीतिक गर्मी को उत्पन्न नहीं किया है बल्कि कांग्रेस को भी घेराबंदी डाल दिया है। कई ऐेसे बयान हैं जो राजनीतिक गर्मी पैदा किये हैं। उनके बयान विदेश से आते हैं पर राजनीतिक गर्मी देश में उत्पन्न होती है। राहुल ने संघ की तुलना आईएस से की थी, संघ समर्थित देश में सरकार है, कई प्रदेशों में सरकार है, संघ की देश में अपनी साख है, करोडों लोग उसके समर्थक हैं जिन्हें राहुल गांधी के बयान अस्वीकार था। राहुल गांधी ने लगभग धमकी दी कि अगर नौजवानों की बेरोजगारी दूर नहीं हुई तो फिर देश में सोमालिया और आईएस के उदाहरण सामने आयेंगे? राहुल गांधी के इस बयान की भी खूब खबर ली गयी। यह सही है कि देश में बेरोजगारी बढी है, महंगाई बढी है, आमदनी कम हुई है, आमदनी कुछ घरानों और कुछ लोगों तक सीमित हो रही है पर देश के तुलना सोमालिया या फिर आईएस की दहशतगर्दी से करना भी स्वीकार नहीं हो सकता है। राहुल गांधी अगर विवादित बयानों की परिधि में कैद नहीं होते, विवादास्पद प्रश्नों को बहाुदरी और ईमानदारी से देते तो फिर उनकी नकारत्मक छवि नहीं बनती और फिर नरेन्द्र मोदी की चाकचैबंद ढंग से घेराबंदी भी करते। पर राहुल गांधी को विवादास्पद और उतावलापन वाले बयानों से बचने की राजनीतिक दक्षता कब सीखायी जायेगी। कांग्रेस पार्टी को इस प्रश्न पर बहादुरी और ईमानदारी से सोचना चाहिए।

अब यहां सिख दंगों के जिन्न को जिंदा करने वाले राहुल गांधी के बयानों का चाकचैबंद विश्लेषण और परीक्षण करते हैं। राहुल गाांधी का कहना है कि सिख दंगा एक ट्रेजडी थी, कांग्रेस पार्टी को कोई लेना-देना नहीं था, कांग्रेस पार्टी सिखों के कत्लेआम में शामिल नहीं थी, यह एक अचानक घटने वाली घटना थी। यह तो रहा राहुल गांधी की सिख दंगों पर सोच। अब यहां उनके पिता राजीव गांधी की सोच भी आप देख सकते हैं। सिख दंगों पर राजीव गांधी की सोच बडी ही जहरीला और घृणास्पद थी, राजीव गांधी की इस सोच का नुकसान तो कांग्रेस पार्टी को झेलनी पडी थी। तब राजीव गांधी ने 19 नवंबर 1984 को दिल्ली के वोट क्लब पर कांग्रेसियों की एक बडी सभा की थी। राजीव गांधी ने कांग्रेसियों की बडी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में दंगे हुए हैं, भारत की जनता का क्रोध सडकों पर उतरा है, उन्होंने हिंसा को अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन करते हुए कहा था कि जब बडा पेड़ गिरता है तो फिर धरती थोडी हिलती ही है।राजीव गांधी की इस सोच और इस भाषण का बड़ा विरोध हुआ था और विपक्ष ने प्रश्न खडे किये थे कि राजीव गांधी अप्रत्यक्ष तौर पर दंगा करने वाले और जान-माल को नुकसार करने वाले कांग्रेसियों का पक्ष ले रहे हैं।

कौन नहीं जानता कि सिख दंगों को लेकर देश भर में हजारों कांग्रेसियों पर मुकदमे चले हैं, हजारों कांग्रेसी सिखो के जान और सिखों की संपतियों के नुकसान के गुनहगार रहे हैं। दिल्ली में जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार और एच के एल भगत जैसे नेताओं के नाम दोषियों में शामिल रहे हैं, कोर्ट से इन्हें आलोचना भी मिली है। सबसे बडी बात यह है कि सिख दंगों को लेकर कांग्रेस के एक बडे नेता कमलनाथ का भी नाम सामने आया था। कमलनाथ अभी मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। सिख दंगों की आंच पीवी नरसिंह राव तक भी पहुंची थी। जिस समय इन्दिरा गांधी की हत्या हुई थी और इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली सहित देश के अन्य भागों में भयंकर दंगे हुए थे उस समय पीवी नरसिंह राव ही गृहमंत्री थे। गृहमंत्री के रूप में पीवी नरसिंह राव की यह विपफलता थी।

देश की राजधानी में कांग्रेसियों ने कितनी वीभत्स और घृणास्पद कत्लेआम किये थे, यह जान-सुन कर आज भी लोगों के रोंगटे खडे हो जाते हैं। मैं उस समय के अपने छोटे से शहर में सिखों पर हमले, सिखों के कत्लेआम और सिखो की संपत्तियों का संहार याद कर आज भी दहल जाता हू। मेरे सामने ही एक ट्रेन में यात्रा कर रहे है चार सिखों की कांग्रेसियों ने बेरहमी से हत्या कर डाली थी। कांग्रेसी गुंडे पूरे शहर में सिखों की दुकानों को लूटा था। 1984 के पहले मेरा छोटा सा शहर सिखों से गुलजार था। लेकिन 1984 के भीषण, खतरनाक और घृणास्पद हिंसा के कारण सिखों का पलायन हो गया, सिखों के अंदर आयी असुरक्षा की भावना फिर वापस नहीं लौटी। उस समय हमारे जैसे सैकडों लोग भी थे जो सिखों की सुरक्षा में लगे हुए थे और कांग्रेसियों से लोहा ले रहे थे।

अब यहां यह प्रश्न उठता है कि सिखों को न्याय मिला? अगर सिखों को न्याय नहीं मिला तो उसके लिए दोषी कौन हैं? सबसे बडी बात यह है कि दोषियों को सजा दिलाने की जिम्मेदारी सत्ता की होती है, सत्ता ही अगर दुश्मन बन कर खडी रहती है तो फिर न्याय की उम्मीद कहां से बनती है। इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस ही सत्तासीन हुई थी और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे राजीव गांधी उदासीन थे, वे सिखों के कत्लेआम के गुनहगारों को सजा दिलाने के प्रति कभी भी गंभीर नहीं थे। जानबुझ कर जांच को प्रभावित किया गया, सबूत मिटाये गये, सुनवाई में हिलाहवाली हुई। राजीव गांधी जांच के लिए जो आयोग गठित की थी वह आयोग राजीव गांधी और कांग्रेस से प्रभावित थी। उस समय राजीव गांधी और कांग्रेस को तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट के जज मिश्रा ने बडी मदद की थी। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज मिश्रा की देश भर में बडी आलोचना हुई थी। बाद में मिश्रा को कांग्रेस ने सत्ता के बडे पदों पर भी सुशोभित किया था।

सिख दंगों का जिन्न कांग्रेस को कभी भी पिछा छोडने वाला नहीं है। जब कभी दंगों की बात आती है तो फिर कांग्रेस स्वयं घिर जाती है। जब भी कांग्रेस गुजरात दंगों को लेकर नरेन्द्र मोदी को घेरेते हैं तब भाजपा भी कांग्रेस को सिख दंगों को लेकर घेरती है। जानना यह भी जरूरी है कि गुजरात दंगों से कई गुना अधिक सिख दंगों में मारे गये थे और सिख दंगा पूरे देश में फैला हुआ था। जब-जब सिख दंगों के घाव हरे होंगे तब-तब कांग्रेस को नुकसान होगा, कांग्रेस जनता के नजरों में घिरती मिलेगी। राहुल गांधी के बयान पर कांग्रेस ने जो सफाई दी है वह सफाई भी राजनीतिक दूरदर्शिता से दूर है। कांग्रेस का कहना है कि सिख दंगो के लिए राहुल गांधी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, यह सही है। पर राहुल गांधी ने सिख दंगों को एक ट्रेजडी कह कर कांग्रेस की भूमिका को जो खारिज की है, वह भी तो अस्वीकार है।

कांग्रेस के अंदर में सोनिया गांधी की भूमिका सीमित हो गयी है। कांग्रेस अब पूरी तरह से राहुल गांधी की छत्रछाया में खडी है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को अब राहुल गांधी के बयानों का प्रबंधन करना सीखना होगा। ऐसे बयान तो कांग्रेस के लिए घातक ही नहीं बल्कि आत्मघाती ही हैं। ऐसे बयानों से राहुल गांधी कैसे दूर रहें, इस पर कांग्रेसी रणनीतिकारों को काम करना चाहिए।

Updated : 2018-08-27T23:42:18+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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