युद्धविराम के श्रेय की होड़ और राजनीतिक अवसरवाद

युद्धविराम के श्रेय की होड़ और राजनीतिक अवसरवाद
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भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया सैन्य घटनाक्रम के बाद युद्धविराम को लेकर अंतरराष्ट्रीय दावों की बाढ़ आना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि इन दावों का उपयोग देश के भीतर राजनीतिक हथियार की तरह किया जा रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार किए गए दावों के बाद अब चीन का यह कहना कि उसने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाने में भूमिका निभाई, न सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार के विरुद्ध है, बल्कि भारत की संप्रभुता पर भी सवाल खड़े करता है।

इससे अधिक चिंताजनक यह है कि कांग्रेस जैसे जिम्मेदार राजनीतिक दल ने इन दावों को लपककर सरकार पर हमला बोलने में कोई संकोच नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद के पटल पर स्पष्ट कर चुके हैं कि पाकिस्तान के घुटनों पर आने के बाद ही सैन्य कार्रवाई रोकी गई और इसमें किसी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं थी। सरकार बार-बार यह दोहराती रही है कि भारत अपनी सुरक्षा और सैन्य निर्णय स्वयं लेता है।

ऐसे में बाहरी शक्तियों द्वारा युद्धविराम का श्रेय लेने की होड़ और उस पर देश के भीतर विपक्ष का सरकार को घेरना, दोनों ही दुभार्ग्यपूर्ण हैं।

चीन का दावा अपने आप में संदिग्ध है। भारत और चीन के रिश्ते हाल के वर्षों में सीमा विवादों और विश्वास की कमी से ग्रस्त रहे हैं। ऐसे देश द्वारा ‘शांति-स्थापक’ बनने का प्रयास, दरअसल, अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि चमकाने और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की कोशिश ज्यादा लगता है। चीन का पाकिस्तान के साथ गहरा रणनीतिक गठजोड़ किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में उसके दावे को निष्पक्ष मान लेना राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचायक है।

कांग्रेस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। जयराम रमेश का यह कहना कि चीन का दावा राष्ट्रीय सुरक्षा का मजाक है, अपने आप में विरोधाभासी है। यदि यह मजाक है, तो फिर इसी दावे के आधार पर सरकार को कटघरे में खड़ा करना किस श्रेणी में आएगा?

कांग्रेस इससे पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों पर सवाल उठाकर अनजाने में पाकिस्तान के नैरेटिव को बल देती दिखाई दी है। प्रधानमंत्री मोदी का यह आरोप कि कांग्रेस और उसके सहयोगी पाकिस्तान के प्रपंच के प्रवक्ता बनते जा रहे हैं, यूं ही नहीं है।

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार और कर्तव्य है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश खतरनाक हो सकती है। युद्धविराम के श्रेय को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर जो भी बयानबाजी हो रही है, उसका जवाब कूटनीतिक स्तर पर दिया जाना चाहिए। विपक्ष का काम सरकार को जवाबदेह बनाना है, न कि बाहरी शक्तियों के दावों को देश के भीतर राजनीतिक हथियार बनाना।

दरअसल, युद्ध रुकवाने के ‘क्रेडिट’ की यह होड़ दर्शाती है कि वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका कई देशों को असहज कर रही है। भारत अब वह देश नहीं रहा जो हर फैसले के लिए किसी तीसरे की ओर देखे। यह आत्मनिर्भर रणनीतिक सोच कुछ शक्तियों को रास नहीं आ रही, इसलिए वे बीच में अपनी भूमिका गढ़ने की कोशिश कर रही हैं।

अंततः देशहित में यही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर एकजुटता दिखाई जाए। सरकार को अपनी बात तथ्यों के साथ मजबूती से रखनी चाहिए और विपक्ष को भी यह समझना होगा कि सरकार की आलोचना और देश की सुरक्षा के बीच एक लक्ष्मण रेखा होती है। उस रेखा को लांघकर किया गया राजनीतिक प्रहार न तो लोकतंत्र को मजबूत करता है, न ही देश को।

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