गेमिंग में गुम होती परवरिशः बच्चों पर ऑनलाइन गेम का बढ़ता खतरा

कितना बदल गया हमारा लोकजीवन..? दादा दादी, नाना नानी की कहानियाँ उनके साथ बिताए गए समय के साथ होती थी हमारी परवरिश। संवेदना, साहचर्य, सहकार से लेकर जीवन के सूत्र सब कुछ था हमारे परिवार लोक में। आधुनिकता फिर उत्तर आधुनिकता से डिजिटल दुनिया में आकर हमारा समाज आज कहां खड़ा है इसे समझने के लिए गाजियाबाद की तीन नाबालिग बहनों की मौत की त्रासदी क्या नाकाफी है?
बच्चा खाना नहीं खा रहा है तो आधुनिक माँ उसे मोबाइल पकड़ा दे रही है। वह मोबाइल की फंतासी में निवाला गटक रहा है। माँ खुश है बच्चे ने खाना फिनिश (इसी शब्द का उपयोग करतीं हैं अधिकतर महिलाएं) कर लिया। घर में बच्चों के प्राकृतिक शोरगुल को थामने के लिए अब मोबाइल ही सहारा रहा है। ये मोबाइल मानो पांच महाभूत से आगे छठा तत्व बना लिया है हमनें। भारत की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति परिवार में निहित रही है। 90 के दशक से चिंता इस बात की थी कि उपभोक्तावाद परिवार को खत्म कर रहा है। परिवार सिमट रहे हैं। कुटुम्ब खो रहे हैं। हमने कुटुम्ब की जगह एकल परिवार आत्मसात कर लिए, लेकिन अब ये एकल परिवार भी सुरक्षित नहीं हैं। स्मार्टफोन के हमलों ने मानों एकमेव घोषित लक्ष्य ही परिवार बना लिया है। पहले मातापिता, काका, काकी, दादा दादी निशाने पर अब एकल परिवार में बच्चे भी निशाने पर हैं।
बाज़ार की अपनी निर्ममता होती हैं लेकिन बाजार में खरीदार तो हम स्वयं ही हैं। उभरते डिजीटल भारत की सुनहरी तस्वीर में हम भारतीय अपना सब कुछ लुटा देने पर क्यों आमादा हो गए है? आईआईआईएम अहमदाबाद के एक अध्ययन के अनुसार अगले एक दशक बाद भारत के हर घर में एक आदमी मानसिक बीमार होगा। यह आदमी कौन होगा? हमारे बच्चे ही न। ऐसे में सवाल यह है कि समाधान क्या? समाधान भी वही परिवार है जिसे हम आधुनिकता के नाम पर मिटा देने में लगे हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक डॉ मोहन भागवत पिछले कुछ समय से निरन्तर इस बात को दोहरा रहे हैं कि हमें परिवार के साथ सप्ताह में एक दिन बिना काम की बात किये एक साथ बैठकर भोजन करना चाहिए। संघ ने शताब्दी प्रसंग में जिन पंच परिवर्तन पर काम करने का संकल्प लिया है उनमें परिवार प्रबोधन भी एक है। जाहिर है संघ समाज के उस संत्रास को देख समझ रहा है जो भारत में अवश्यंभावी हो गया है। गाजियाबाद की घटना ने समग्रता के साथ हमें परिवार और खतरनाक बाजारवादी शक्तियों के साथ संतुलन साधने के लिए चेतावनी भी दी है। आज के रविवारीय विशेष सप्तक में पढ़िये मानसिक और सामाजिक संकट बनकर उभरते ऑनलाइन गेम्स की विस्तृत रिपोर्ट...
केस 1 - लखनऊ में एक सोलह वर्ष के लड़के ने अपनी माँ को सोते समय गोली मारकर हत्या कर दी क्योंकि माँ ने उसे वीडियो गेम खेलने से मना कर दिया था। उसने अपनी दस साल की बहन को भी चुप रहने की धमकी दी। माँ की लाश दूसरे कमरे में छिपा दी थी।
केस 2 - राजस्थान के नागौर में एक 16 साल के लड़के ने ऑनलाइन वीडियो गेम से हुए कर्ज़ को चुकाने के लिए अपने चचेरे भाई की हत्या कर दी।
केस 3 - गाजियाबाद में 3 किशोर लड़कियों ने ऑनलाइन गेम में मिले टास्क और डिजिटल गेमिंग लत के कारण बालकनी से कूद कर आत्महत्या कर ली।
केस 4 - भोपाल में पब्जी गेम खेलने इंटरनेट पैक रिचार्ज के लिए मां नहीं दिए पैसे तो आटीआई छात्र ने लगा ली फांसी
ये मामले गेमिंग में मिले टास्क और उसकी लत की वजह से सामने आये हैं। इसी तरह गेमिंग डिसऑर्डर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। डिजिटल लत से पीड़ित बच्चे आभासी दुनिया पर ज़्यादा भरोसा कर आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। सामाजिक रिश्तों को नजरअंदाज करते हैं।
दरअसल, ऑनलाइन गेम इस तरह से बनाये गये है कि प्रत्येक लेवल पिछले लेवल से ज़्यादा मुश्किल और जटिल होता है। इसमें प्लेयर गेम में आगे बढ़ने के लिए खुद को एक सीमा तक धकेलते हैं। टास्क को पूरा करने के दवाब के चलते स्वयं पर नियंत्रण खो देते हैं। धीरे धीरे किशोरों को इनकी लत लग जाती है। गेमिंग कंपनियाँ बच्चों को इमोशनली लेवल, आर्थिक पुरस्कार, प्रसिद्धि का लालच देकर इन्हे गेमिंग ऐप के लगातार उपयोग करने के लिए उकसाती हैं। ऐप के अत्यधिक उपयोग से बच्चो में असामान्य व्यवहार बढ़ने लगता है तब गेमिंग डिसऑर्डर के लक्षण सामने आते है।
कोविड बना परिवर्तनकारी बिंदु
कोविड महामारी के दौरान समय, काल और परिस्थिति के चलते बच्चों ने शिक्षा और मनोरंजन के लिए डिजिटल गैजेट्स का उपयोग किया। पढ़ाई के दौरान ऑनलाइन समय बिताने लगे। अब इनके दुरूपयोग के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। जैसे-जैसे ऑनलाइन खतरे बढ़ रहे हैं, डिजिटल दुनिया में बच्चों की सक्रीय उपस्थिति चिंता का विषय बन गई है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने चेताया
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की रिपोर्ट में बच्चों में सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स के बढ़ रहे प्रभाव पर चिंता जताई है। माता पिता और टीचर्स के लिए एडवाइज़री जारी की ताकि इससे उबरने के लिए शिक्षित किया जा सके। मानसिक और शारीरिक तनाव को दूर करने में मदद मिले। ऑनलाइन गेमिंग (नियमन) अधिनियम, 2025 और डिजिटल वेलनेस पाठ्यक्रम को बच्चों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति को रोकने की दिशा में एक अहम कदम बताया है।
कोरिया में लॉन्च हुए गेम की जद में भारतीय बच्चे
वर्ष 1983 में पहली बार किशोरों में गेमिंग की लत से सम्बंधित गेमर्स के स्वयं-मूल्यांकन पर आधारित शोध हुआ। इसमें बताया गया की वीडियो गेमिंग की लत किशोरों के लिए एक बड़ी समस्या बनकर उभर रही है। शोध में दावा किया कि किशोर बच्चों में गेम्स खेलने की लत चुकी है। 2000 के दशक में ऑनलाइन गेम आम लोगों के बीच और भी लोकप्रिय हुए। वर्ष 2004 में पहली बार बड़े पैमाने पर मल्टीप्लेयर रोल प्लेइंग गेम कोरिया में लॉन्च किया गया। गेमिंग का प्रभाव जांचने मार्च 2017 से जुलाई 2018 के बीच 575 किशोरों पर एक क्रॉस सेक्शनल स्टडी हुई। शोध अनुसार 73.9% किशोरों में ऑनलाइन वीडियो गेम खेलने की लत पाई गई।
2025 में ईस्ट एशियन आर्काइव ऑफ़ साइकियाट्री जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र अनुसार हाईस्कूल के 2200 भारतीय छात्रों में से 15.8 प्रतिशत छात्र इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर से ग्रसित मिले। जिनमे अवसाद, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा के लक्षण सामने आये हैं।
PSRI हॉस्पिटल के कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट रतन कुमार का कहना है कि इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर गहरे मनोवैज्ञानिक समस्याओं को उत्पन्न करने वाला कारक है इसमें किशोरों के शारीरिक, सामाजिक व्यवहार, व्यक्तिगत मुद्दे प्रभावित होते हैं।
सामाजिक जिंदगी पर हावी ऑनलाइन गेम्स
स्टैंडर्ड साइकोमेट्रिक उपकरणों के माध्यम से हुए अध्ययन अनुसार जिन बच्चों की ज़िंदगी में ऑनलाइन गेमिंग हावी है। वे अक्सर नींद की कमी, कुपोषण, दौरे, अदृश्य प्रेशर, डिहाइड्रेशन जैसी समस्याओं के साथ-साथ डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन, आक्रामकता और कई तरह की सामाजिक समस्याओं का अनुभव करते हैं।
खतरनाक वायरल ट्रेंड का प्रभाव
खतरनाक वायरल ट्रेंड्स के कारण बच्चे उन्हें आजमाने के विनाशकारी परिणामों को भोगते है। जैसे ऑनलाइन गेम में मिले कार्य को पूरा न कर पाने के कारण आत्महत्या, शारीरिक जोखिम जैसे कदम उठाना। बच्चों में इतनी समझ और क्षमता नहीं होती कि वे हानिकारक स्थितियों का आंकलन कर सकें।
लगातार नोटिफिकेशन का असर
एक रिसर्च के अनुसार डिजिटल मीडिया की तुलना में सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स ज्यादा जटिल और चुनौतीपूर्ण है। लगातार नोटिफिकेशन, मैसेज और अपडेट की उलझन बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित करती है। एकाग्रता क्षमता पर असर पड़ता है। किसी साथी के मैसेज का लम्बा इंतजार भी मानसिक विचलन के तौर पर काम कर सकता है और वह खेल हो या पढ़ाई अन्य कार्य पर अपना ध्यान नहीं लगा पाते। उत्पादकता प्रभावित होती है।
दोगुनी गति से दस्तक दे रहें है भारत मे गेम्स
अनुमान है कि इस समय भारत की लगभग 40 प्रतिशत आबादी 22 साल से कम उम्र की है और डिजिटल गेमिंग का एक बड़ा हिस्सा उन्हीं को लक्षित करता है। मेन्टल हेल्थ जर्नल द्वारा ऑनलाइन गेम की लत के प्रचलन का अध्ययन किया गया। रिपोर्ट अनुसार भारत में प्रचलन दर 12.3% से 73.9% तक पाई गई। वहीँ दुनिया भर में यह दर 17% से 30.9% तक थी। किशोर बच्चे प्रति दिन 3 घंटे से ज़्यादा ऑनलाइन गेम खेलते हैं, जो कि 21 घंटे प्रति सप्ताह होता है।
ऑनलाइन गेमिंग मार्केट रिसर्च का चौकाने वाला निष्कर्ष
ऑनलाइन गतिविधियों से सम्बंधित कंज्यूमर सर्वे में ताजा नतीजों पर यह निष्कर्ष निकाला कि दुनिया भर में स्मार्टफोन पर ऑनलाइन गेम खेलने में प्रति सप्ताह गेमर्स 21 घंटे से अधिक समय व्यतीत करते हैं।
- गेमिंग की लत वाले किशोर बच्चों में सिंगल प्लेयर गेम ज़्यादा लोकप्रिय थे।
- किशोर मल्टी प्लेयर गेम खेलने के लिए ऑनलाइन पार्टनर पसंद करते हैं।
- गेम डाउनलोड होने में लगने वाला समय, इंटरनेट स्पीड से निराशा होती है।
- 50.5% रेस्पॉन्डर (उत्तरदाता) काम के घंटों के दौरान कामकाज को नजरअंदाज करके गेम खेलते पाए गए।
- गेमर्स अक्सर प्रतिदिन की गतिविधियों छोड़ देते थे।
- लगभग 60% लोगो ने गेम खेलते समय नींद छोड़ी
ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं की लगातार वृद्धि
इंटरनेशनल जर्नल ऑन मेंटल हेल्थ एडिक्शन में प्रकाशित शोध पत्र अनुसार, कोरोना महामारी के दौरान गेमिंग इंडस्ट्री में उपयोगकर्ताओं की वृद्धि हुई। एक भारतीय गेमिंग कंपनी के ऑनलाइन मोबाइल गेमिंग प्लेटफार्म पर तीन गुना ज़्यादा किशोरों ने सहभागिता की और 30 प्रतिशत ज़्यादा ट्रैफिक प्राप्त किया। गेमर्स द्वारा सिंगल यूज़र मोड की अपेक्षा मल्टी प्लेयर मोड लगभग 35 प्रतिशत ज़्यादा उपयोग हुआ। इसी तरह, एक अन्य भारतीय मोबाइल आधारित ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म ने महामारी के दौरान उपयोगकर्ता आधार में लगभग 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जानकारी दी जिसमें 75,000 से ज्यादा नए उपयोगकर्ता जुड़े।
बच्चों के बीच प्रचलित गेम
- बैटल ग्राउंड मोबाइल इंडिया (BGMI)
- फ्री फायर
- क्लैश ऑफ क्लैन्स (COC)
- कॉल ऑफ ड्यूटी (COD)
WinZO के भारत में 25 करोड़ उपयोगकर्ता -
16 भाषाओं में (स्थानीय और बहुभाषी) गेमिंग अनुभव देने वाली विंजो कंपनी की रिपोर्ट अनुसार इनके भारत में 25 करोड़ उपयोगकर्ता हैं देश के ऑनलाइन गेमिंग मार्केट का लगभग 40% है। भारतीय मार्केट के साथ विंजो ने अंतरराष्ट्रीय बाजार पर लक्ष्य केंद्रित किया है और ब्राज़ील के गेमिंग मार्केट में अपनी जगह बनाई है। विंजो के टॉप गेम - विंजो लूडो, कॉल ब्रेक आदि।
दुनिया के टॉप 8 गेमिंग देश
रैंक | देश | 2025 में रेवेन्यू (राशि करोड़ में) | 2030 में रेवेन्यू (राशि करोड़ में) |
1. | अमेरिका | 14,180 | 19,930 |
2. | चीन | 13,780 | 19,650 |
3. | जापान | 5,090 | 6,480 |
4. | यूनाइटेड किंगडम | 1,770 | 2,540 |
5. | साउथ कोरिया | 1,460 | 2,000 |
6. | जर्मनी | 1,310 | 1,810 |
7. | भारत | 1,010 | 1,590 |
8. | फ्रांस | 990 | 1,330 |
सोर्स: स्टेटिस्टा |
मानसिक रोग का खतरा
सैपियन लैब्स द्वारा 18-24 वर्ष की आयु जेनरेशन Z वाले 27,969 लोगों पर अध्ययन किया गया। रिपोर्ट अनुसार बचपन में स्मार्टफोन के उपयोग से मानसिक विकास और स्वास्थ्य के बारे में जानने की कोशिश की गई। जिन्होंने कम उम्र से मोबाइल पर अधिक समय बिताना शुरू किया उनमें मानसिक विकास और मोटापे से संबंधित समस्याएं अधिक देखी गई। दिसंबर 2025 में जारी पीयर-रिव्यूड जर्नल पीडियाट्रिक्स के अध्ययन में भी किशोरों में मानसिक और शारीरिक सम्बंधित समस्याएं सामने आई हैं।
केरल पुलिस का सराहनीय D-DAD प्रोग्राम
केरल पुलिस ने 6 जिलों में बच्चों को स्क्रीन की लत, साइबर जाल और गेमिंग डिसऑर्डर से बचाने डिजिटल डी-एडिक्शन (D-DAD) प्रोग्राम शुरू किया। पिछले पंद्रह माह में प्रभावित बच्चों की पहचान करने और उनकी एक्सपर्ट की देखरेख में काउंसलिंग, स्मार्टफोन एडिक्शन टेस्ट, थेरेपी के माध्यम से 385 बच्चे मोबाइल के अत्यधिक उपयोग और इंटरनेट की लत से उबरें हैं। कुल 613 बच्चे लाभान्वित हुए हैं।
उम्र आधारित प्रतिबंध लागू करने वाले देश
फ्रांस : फ़्रांस ने 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर जनवरी 2026 में प्रतिबंध लगाने की मंजूरी दे दी है।
ऑस्ट्रेलिया : 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए Instagram और Facebook जैसे प्लेटफॉर्म पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लागू है।
रूस : सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाकर बच्चों की पहुंच सीमित कर रहा है।
डेनमार्क : 15 वर्ष से कम उम्र के लोगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की योजना है।
स्पेन - 16 साल से कम उम्र के बच्चों को ऑनलाइन कंटेंट के नुकसान से बचाने के लिए स्पेन सरकार सोशल मीडिया एक्सेस पर बैन लगाने की योजना बना रही है।
