ट्रम्प 2.0 का एक साल: टैरिफ से दुनिया बेहाल, अमेरिका इतिहास दोहरा रहा

डोनाल्ड ट्रम्प 20 जनवरी 2026 को अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल का एक साल पूरा करेंगे। उनके कार्यकाल की शुरुआत कई आक्रामक कार्यकारी आदेशों से हुई, और इसके बाद व्हाइट हाउस से लगातार आश्चर्यजनक फैसले आए। इन कदमों ने न केवल अमेरिका की आंतरिक नीति को प्रभावित किया, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में भी नए संकट खड़े कर दिए हैं।
ट्रम्प ने वैश्विक सुर्खियों में बने रहने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधियों से बाहर निकलने, अमेरिकी प्रवासन नीति बदलने, टैरिफ लागू करने और वेनेजुएला के खिलाफ कार्रवाई करने जैसे कदम उठाए। इन निर्णयों ने वैश्विक गठबंधनों को प्रभावित किया, कनाडा और मैक्सिको जैसे व्यापारिक साझेदारों के साथ तनाव पैदा किया, और यूएन जैसे संगठनों में अमेरिकी समर्थन को कमजोर किया। लेकिन ट्रम्प ने ‘Make America Great Again’ के वादों के तहत आर्थिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय विरोध को एक नया रूप दे दिया।
राजनीति विज्ञान में इस तरह की नीतियों को संरक्षणवादी (Protectionist) नीति कहा जाता है। यह अमेरिका की पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित करती है, जिसमें घरेलू राजनीतिक हितों को वैश्विक एकीकरण से ऊपर रखा जाता था। यह रणनीति द्वितीय विश्व युद्ध से पहले अमेरिकी नीति का मुख्य हिस्सा रही है। संरक्षणवादी नीतियाँ घरेलू उद्योगों और रोजगार को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाती हैं। इसके लिए आयात पर टैरिफ लगाया जाता है, कुछ वस्तुओं के आयात को सीमित किया जाता है, और घरेलू उत्पादकों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
हाल के ट्रम्प कार्यकाल में फोकस मुख्य रूप से टैरिफ पर रहा। समर्थक इसे नौकरियों को बचाने और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने वाला कदम मानते हैं। लेकिन इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ने और वैश्विक व्यापारिक तनाव बढ़ने का खतरा भी उत्पन्न हुआ है।
इतिहास यह बताता है कि अमेरिका कभी भी पूरी तरह मुक्त व्यापार का समर्थक नहीं रहा। अमेरिकी राष्ट्र की स्थापना से 1940 के दशक तक अमेरिकी व्यापार नीति उच्च टैरिफ वाली रही। इससे अमेरिका यूरोपीय शक्तियों से मुकाबला कर सका। रिपब्लिकन पार्टी ऐतिहासिक रूप से इसी नीति की समर्थक रही है। उदाहरण के लिए, 1888–1897 के बीच कांग्रेस ने ‘McKinley Tariff’ लागू की, जिसमें 50% टैरिफ का प्रावधान था।
तत्कालीन अर्थशास्त्रियों का मानना था कि समुद्री व्यापार पर नियंत्रण भू-राजनीतिक लाभ के लिए जरूरी है। तब टैरिफ न केवल राजस्व का स्रोत थे, बल्कि स्थासक हथियार भी। बाद में ‘Reciprocal Tariff’ नीतियों के तहत अमेरिका व्यापारिक साझेदारों से रियायतें मांगने लगा।
संरक्षणवाद ने अमेरिका को कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से औद्योगिक महाशक्ति बनने में मदद की और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन को पीछे छोड़ दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, अमेरिका ने बहुपक्षीय संस्थाओं, जैसे WTO, को बढ़ावा दिया, ताकि वैश्विक व्यापार बढ़े और सोवियत प्रभाव को रोका जा सके।
ट्रम्प का वर्तमान कार्यकाल इसी पुरानी अमेरिकी व्यापार और विदेश नीति का संक्षिप्त रूप प्रतीत होता है, जो 21वीं सदी में लागू हो रहा है। उन्होंने आपातकालीन आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा शक्तियों का इस्तेमाल कर कई देशों पर टैरिफ लगाया। उनका कार्यकाल टैरिफ-केंद्रित विदेश नीति पर केंद्रित रहा, जिसमें देश-दर-देश व्यक्तिगत समझौते और उत्पाद विशेष सौदे किए गए।
आज की वैश्वीकरण युक्त दुनिया में यह अनोखा कार्य है। आपूर्ति श्रृंखलाएँ महाद्वीपों तक फैली हैं, पूंजी का प्रवाह तत्काल होता है, और बहुध्रुवीय दुनिया में तेज़ पलटवार की संभावना रहती है। ट्रम्प अमेरिका को वैश्विक राजनीति के केंद्र में रखना चाहते हैं। वे नोबेल शांति पुरस्कार की मांग करते हुए यूक्रेन और इज़राइल जैसे युद्धों में सीधे हस्तक्षेप कर रहे हैं।
इस एक साल में अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा और नशीले पदार्थों के खिलाफ अभियान के नाम पर सात देशों के खिलाफ विभिन्न कार्रवाइयाँ की हैं—ईरान के परमाणु कार्यक्रम से लेकर वेनेजुएला तक। इस नए वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका अपने पुराने संरक्षणवादी स्वरूप में लौट रहा है।
ट्रम्प की संरक्षणवादी नीतियाँ अमेरिका के लंबे और सफल इतिहास से प्रेरणा लेती हैं, जब टैरिफ ने युवा राष्ट्र को औद्योगिक महाशक्ति बनाया। लेकिन 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में वही उपकरण अलग परिणाम ला सकते हैं। आपूर्ति श्रृंखलाएँ जुड़ी हुई हैं, पूंजी प्रवाह तेज़ है और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच संघर्ष की संभावना अधिक है। यही दुनिया के लिए नई अनिश्चितताएँ पैदा कर रहा है।
