अमेरिका से भारतीय मीडिया के लिए सबक: अभिव्यक्ति नहीं, राष्ट्रहित सर्वोपरि

वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिका की सैन्य कार्रवाई एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अंजाम दिए गए इस गुप्त अभियान 'ऑपरेशन एब्सोल्यू ट रिजॉल्व (#OAR)' ने न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति को झकझोरा, बल्कि मीडिया की भूमिका पर भी एक नई बहस छेड़ दी है।
अमेरिकी सेना डेल्टा फोर्स, #CIA, नेवी और #FBI के संयुक्त अभियान में वेनेजुएला में व्यापक सैन्य कार्रवाई हुई और अंततः मादुरो तथा उनकी पत्नी की गिरफ्तारी कर उन्हें न्यूयॉर्क लाया गया। किंतु इस पूरे घटनाक्रम से भी अधिक महत्वपूर्ण वह तथ्य है, जो बाद में सामने आया कि अमेरिकी मीडिया को इस ऑपरेशन की जानकारी पहले से थी, फिर भी उसने जानबूझकर इसे सार्वजनिक नहीं किया। यही वह बिंदु है, जिसने आज भारतीय मीडिया के लिए आत्ममंथन का अवसर दिया है।
अमेरिकी मीडिया का संयम और राष्ट्रहित-यह अब स्पष्ट हो चुका है कि 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और 'द वॉशिंगटन पोस्ट' जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबारों के वरिष्ठ संपादकों को इस गुप्त सैन्य कार्रवाई की संवेदनशील जानकारी उनके सूत्रों द्वारा पहले ही दे दी गई थी। इसके बावजूद उन्होंने इसे प्रकाशित नहीं किया। कारण सीधा और स्पष्ट था अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया जब राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी मीडिया के बीच टकराव जगजाहिर रहा है। वैचारिक विरोध राजनीतिक असहमति और तीखी आलोचनाओं के बावजूद जब बात देश और सैनिकों की जान की आई तो अमेरिकी मीडिया एकजुट दिखाई दिया।
यह अमेरिकी पत्रकारिता की उस पुरानी परंपरा को दर्शाता है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में संयम और जिम्मेदारी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ऊपर रखा जाता है। यहां यह समझना जरूरी है कि अमेरिका में भी प्रेस स्वतंत्र है, आलोचनात्मक है और सत्ता से सवाल पूछता है लेकिन वह यह भी जानता है कि हर सत्य को हर समय उजागर करना पत्रकारिता नहीं होता। कभी कभी मौन भी देशभक्ति का एक रूप होता है।
भारतीय मीडिया की तुलना में स्थिति-इसके उलट यदि भारतीय मीडिया के व्यवहार पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यहां कई बार ऐसी होड़ देखी गई है कि जो नहीं दिखाना चाहिए, वहीं सबसे पहले दिखाने की कोशिश होती है। राष्ट्रीय सुरक्षा सैन्य अभियान और आतंकवाद से जुड़े मामलों में भी 'एक्सक्लूसिव' और 'ब्रेकिंग न्यूज' की प्रतिस्पर्धा अक्सर विवेक पर भारी पड़ जाती है या कहा जाए कि आज भी पड़ रही है। इस संदर्भ में उल्लेखित है कि हाल ही में आई फिल्म 'धुरंधर' ने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के दौरान मीडिया की भूमिका को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। 26 नवंबर 2008 की रात से 29 नवंबर तक कई टीवी चैनलों ने होटल ताज, ओबेरॉय और अन्य ठिकानों के लाइव दृश्य लगातार दिखाए। इन प्रसारणों के कारण आतंकवादी अलर्ट हो गए और सुरक्षा बलों की रणनीति को नुकसान पहुंचा। इसका परिणाम यह हुआ कि कई जवानों को अपना सर्वोच्च बलिदान देना पड़ा। बाद में इस पर गंभीर सवाल उठे, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हमने एक देश भारत के रूप में जो नहीं खोना चाहिए था। वह हम अपने सैनिकों एवं जनमानस के रूप में खो चुके थे।
यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। कारगिल युद्ध हो कश्मीर में चल रहे ऑपरेशन हों या अन्य संवेदनशील सुरक्षा मुद्दे ही क्यों न रहे हों, भारतीय मीडिया पर बार-बार आरोप लगते रहे हैं कि उसने तत्काल अभिव्यक्ति के नाम पर दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की अनदेखी की। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रहित-यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि मीडिया स्वतंत्र हो या नहीं, निसंदेह उसे स्वतंत्र होना चाहिए और वो है भी। प्रश्न यह है कि स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए? क्या अभिव्यक्ति का अधिकार देश हित से ऊपर हो सकता है? अमेरिकी उदाहरण स्पष्ट करता है कि उत्तर 'नहीं' है। वहां मीडिया ने यह नहीं कहा कि 'जनता को जानने का अधिकार है' बल्कि यह माना कि यदि इस जानकारी से अमेरिकी सैनिकों की जान को खतरा है तो उसे रोका जाना चाहिए।
