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भारतीय संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा का विशिष्ट महत्त्व

भारतीय संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा का विशिष्ट महत्त्व
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वेबडेस्क। आध्यात्मिक उर्जा का पावर हाउस है कार्तिक माह, इसी पूर्णिमा के दिन भगवान् विष्णु ने धारण किया था मत्स्यावतार, इसी पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर का वध करने के कारण भगवान् शंकर का नाम पडा त्रिपुरारी, महाभारत युद्ध की समाप्ति पर महाराज युधिष्ठिर ने भीष्म को दीया था धर्मोपदेश, गुरु नानक जयंती और देव दीपावली है कार्तिक पूर्णिमा को ।

वेदों में कार्तिक माह को उर्ज नाम दिया गया है, अर्थात सभी महीनो में श्रेष्ठ यह माह आध्यात्मिक ऊर्जा का संवाहक है । सनातन वैदिक संस्कृति में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से पूर्णिमा तक के दिन को भीष्म पञ्चक का नाम दिया गया है, तथा कार्तिक में आने वाली पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा कहलाती है । इस बार यह पवित्र दिन 19 नवम्बर शुक्रवार के दिन होगा । इसके साथ ही इस शुभ दिन पर सर्वार्थ सिद्धि और वर्धमान योग भी बन रहा है । यही एक मात्र पूरे वर्ष की पूर्णिमा है जब चन्द्रमा अपनी उच्च राशि में विराजमान होते है, चन्द्रमा जल तत्व ग्रह होने से नदी या पवित्र जल में स्नान का महत्त्व अधिक हो जाता है । सूर्य के साथ केतू तथा चन्द्रमा के साथ राहू की यह युति भी आध्यात्मिक उर्जा को दने के साथ गरीबो को दान देने से कई गुना फल देने वाला होगा । अदृश्य चक्रार्ध में सभी ग्रहों की स्थिति से देश और विश्व में आत्मघाती हमले और भय का माहौल बनेगा ।

पूर्णिमा के इस दिन ही भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर नामक असुर का नाश किया था, तभी से भगवान शंकर को त्रिपुरारी कहा जाता है । और इस पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाने लगा है । इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दीपदान करने की परंपरा है । कार्तिक पूर्णिमा का दिन देवी-देवताओं को प्रसन्न करने का दिन होता है, इसीलिए इस दिन लोग पवित्र गंगा में डुबकी लगाकर और दान-दक्षिणा करके पुण्य कमाया जाता है । इसके साथ ही पुराणों में इस दिन हवन, दान, जप, तप आदि धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व बताया गया है । शास्त्रों में इस दिन कार्तिक स्नान करने और भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा करने से भक्तों को अपार सौभाग्य की प्राप्ति होती है. हिंदू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व है ।

कार्तिक पूर्णिमा का उत्सव पांच दिनों तक चलता है । यह प्रबोधिनी एकादशी के दिन से शुरू होता है और पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है । विष्णु पुराण के अनुसार, इस दिन भगवान नारायण ने मत्स्यावतार लिया था ।

कार्तिक पूर्णिमा का समय -

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ - 18 नवंबर गुरुवार को दोपहर 11 बजकर 55 मिनट से ।
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त - 19 नवंबर शुक्रवार दोपहर 02 बजकर 25 मिनट तक ।

कार्तिक पूर्णिमा पूजा विधि

  • कार्तिक पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें । यदि संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करके व्रत का संकल्प करें । लक्ष्मी नारायण के सामने गाय के घी का दीपक जलाकर विधि-विधान से पूजा करें ।
  • पुराणों के अनुसार इस दिन सत्यनारायण की कथा करने से भगवान श्री हरि विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है ।
  • भगवान विष्णु को इस दिन खीर का भोग लगाना चाहिए । वहीं इस दिन शाम को लक्ष्मी-नारायण की आरती करके तुलसी जी के पास घी का दीपक जलाना चाहिए । कार्तिक पूर्णिमा के दिन घर में भी दीपक जलाना चाहिए । इस दिन हो सके तो गरीबों को दान दें और भूखों को भोजन कराएं ।

Updated : 2021-11-22T12:54:23+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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