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भारत का पहला आतंकवादी था अब्दुल रशीद, जिसने की थी एक महात्मा की हत्या

प्रखर श्रीवास्तव

भारत का पहला आतंकवादी था अब्दुल रशीद, जिसने की थी एक महात्मा की हत्या
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वेबडेस्क। मज़हब के नाम पर बेगुनाहों की हत्या करने का इस्लामी कट्टरपंथियों का 1400 साल पुराना मॉडस आपरेंडी है... आज से करीब 100 साल पहले इसी तरह से इस्लाम की निंदा का हवाला देकर सिलसलेवार तरीके से संतों, पत्रकारों और हिंदू सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं की गई थीं... आज हम तथ्यों, तर्कों और सबूतों के साथ ये बताएंगे कि किस तरह से 100 साल पहले फतवा देकर ये खूनी खेल खेला गया था... तो बिना देर किये आइए शुरुआत करते हैं उस संत से जिन्हे अपने दौर में भारत का सबसे बड़ा संत कहा जाता था... उनका नाम था स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती... जिनकी भारत के पहले मुस्लिम आतंकवादी अब्दुल रशीद ने हत्या कर दी थी...

स्वामी श्रद्धानंद का परिचय

स्वामी श्रद्धानंद 1920 के दौर में हिंदुओं के सबसे बड़े धार्मिक गुरू थे... वो आर्य समाज के प्रमुख होने के साथ-साथ महान स्वतन्त्रता सेनानी भी थे... कुछ इतिहासकारों का दावा है कि स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने ही मोहन दास करमचंद गांधी के लिए सबसे पहले महात्मा शब्द का इस्तेमाल किया था... गांधी के कहने पर स्वामी श्रद्धानंद असहयोग आंदोलन में भी हिस्सा ले रहे थे... लेकिन जब असहयोग आंदोलन के साथ-साथ खिलाफत आंदोलन भी नाकाम होने लगा तो केरल के मालाबार इलाके में मुसलमानों ने हिंदुओं का कत्लेआम कर शुरु कर दिया... इसे मोपला नरसंहार के नाम से जाना जाता है... स्वामी जी मोपाल नरसंहार से अंदर तक हिल गये... मोपला में हज़ारों हज़ार हिंदुओं को जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवा कर मुसलमान बना दिया गया था... ऐसी कई घटनाओं से से व्यथित होकर स्वामी श्रद्धानंद ने अपने आर्य समाज के ज़रिए शुद्धि आंदोलन की शुरुआत की... उन्होने 11 फरवरी 1923 को 'भारतीय शुद्धि सभा' की स्थापना की... अपने इस आंदोलन के ज़रिए स्वामी श्रद्धानंद ने उन धर्मपरिवर्तित हिंदुओं को वापस हिंदू धर्म में शामिल करना शुरु कर दिया जो जिन्हे मुस्लिम बना दिया गया था... "शुद्धि आंदोलन" आंदोलन की कामयाबी से कट्टरपंथी तबलीगी मुसलमानों की बुनियाद हिल गईं... स्वामी जी ने उस समय के यूनाइटेड प्रोविंस यानि आज के यूपी में 18 हज़ार मुस्लिमों की हिंदू धर्म में वापसी करवाई... और ये सब कानून के मुताबिक हुआ...

कैसे हुई थी स्वामी श्रद्धानंद की हत्या

दरअसल उस दौर में कट्टरपंथी मुसलमानों को लग रहा था कि तब्लीग में तो धर्मांतरण एक मज़हबी कर्तव्य है लेकिन एक हिंदू संत ऐसा कैसे कर सकता है ? लिहाज़ा स्वामी श्रद्धानंद पर हर तरफ से हमले शुरु हो गये... आखिरकार वो मनहूस दिन आ गया जिस दिन इस महान संत की निर्मम हत्या कर दी गई... वो 23 दिसंबर 1926 की बात है... दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में दोपहर के वक्त स्वामी श्रद्धानंद अपने घर में आराम कर रहे थे... उस समय वो बेहद बीमार थे... तभी अब्दुल रशीद नाम का एक युवक पहुंचा, उसने स्वामी जी से मिलने का समय मांगा और कहा कि वो धर्मिक मामलों पर उनसे चर्चा करना चाहता है... भरोसा करके स्वामी जी ने उसे वक्त दे दिया, लेकिन अब्दुल रशीद ने भरोसा तोड़ने में देर नहीं की... उसने स्वामी जी पर हमला करके उनकी जान ले ली... अब्दुल रशीद ने जो किया था उसके बाद उसे भारत का पहला आतंकवादी कहा जाना चाहिए था...

स्वामी श्रद्धानंद की हत्या पर गांधी की प्रतिक्रिया

स्वामी जी की हत्या के दो दिन बाद गांधी ने कट्टरपंथी हत्यारे अब्दुल रशीद को अपना भाई बता दिया... गांधी ने 25 दिसंबर 1926 को गुवाहाटी में कांग्रेस के अधिवेशन में कहा कि –"मैं अब्दुल रशीद को अपना भाई मानता हूं। मैं यहाँ तक कि उसे स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता हूं। वास्तव में दोषी वे लोग हैं जिन्होंने एक दूसरे के खिलाफ घृणा की भावना पैदा की। हमें एक आदमी के अपराध के कारण पूरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए।"

सोचिए जिस स्वामी श्रद्धानंद ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी का नाम दिया उस असली संत-महात्मा की मौत पर गांधी ने इतना बेतुका बयान दिया... खैर भारत के पहले आतंकवादी अब्दुल रशीद को जब स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के आरोप में फांसी सुना दी गई तो... कांग्रेस के नेता आसफ अली ने उसे फांसी की सज़ा से बचाने के लिए पैरवी की...

मुस्लिम समाज ने किया हत्यारे का समर्थन

स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद को जब 1927 में फांसी दे दी गई तो उसके जानाजे में हज़ारों की संख्या में भीड़ उमड़ी... यहां तक कि पूरे भारत की कई मस्जिदों में उसके लिए विशेष दुआएं भी मांगी गईं... 30 नवम्बर, 1927 के 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के अंक में छपी एक ख़बर के मुताबिक -

स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद की रूह को जन्नत में स्थान दिलाने के लिए देवबंद के प्रसिद्ध मदरसे दारुल उलूम में छात्रों और आलिमों ने कुरान की आयतों का पांच बार पाठ किया। उन्होने दुआ मांगी कि "अल्लाह मरहूम अब्दुल रशीद को अला-ए-इल्ली-ईल (सातवें आसमान की चोटी) पर स्थान दें।"

मुस्लिम कट्टरता से घबरा गये थे गुरुदेव टैगोर

स्वामी श्रद्धानंद की हत्या पर गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने सबसे समझदारी वाली प्रतिक्रिया दी... गुरूदेव टैगोर को लिबरल और वामपंथी गैंग बेहद धर्मनिरपेक्ष बताता है... लेकिन शायद उन्हे नहीं पता कि उन्होने स्वामी श्रद्धानंद की हत्या पर क्या कहा था... गुरूदेव टैगोर ने जो कहा था वो छपा है भारत के मशहूर लेखक दिनकर जोशी की लिखी किताब गुरूदेव में... गुरुदेव ने कहा था कि -

"मैं हर तरह की सांप्रदायिकता का कड़ा विरोध करता हूं, लेकिन मैं ये साफ-साफ कहना चाहूंगा कि ऐसी मुस्लिम आक्रमकता को अगर हम गंभीरता से नहीं लेंगे और इसे सहन कर लेंगे तो इसका अर्थ आक्रमक तत्वों को बढ़ावा देना ही होगा।"

उस दौर में गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर की ये बात हमारे बड़े नेताओं की समझ में आ गई होती तो आज ये हालात नहीं होते... दरअसल ये मानसिकता आज भी जिंदा है... जो दूसरे के धर्म का तो सम्मान नहीं करती लेकिन अपने धर्म की बात आते ही खूनखराबे की बातें शुरु कर देती है..

महाशय राजपाल की हत्या -

दरअसल उदयपुर में कन्हैयालाल जी के साथ जो हुआ है वो कोई नई बात नहीं है... हमारे देश में भी सदियों से ये सब होता रहा है... न जाने कितने कन्हैयालाल जी इतिहास की किताबों से मिटा दिये गये हैं... इस्लामिक कानून और फतवों के नाम पर हिंदुस्तान में भी हज़ारों जानें ली गई हैं लेकिन उससे भी ज्यादा अफसोस की बात ये है कि कभी हमारे समाज ने कट्टरता के खिलाफ कभी एकजुटता नहीं दिखाई... बल्कि उल्टा हमारे सोकॉल्ड सेक्युलर नेताओं ने हमेशा से इन कट्टरपंथियों का साथ दिया है... मोहनदास करमचंद गांधी भी इन्ही नेताओं में से एक थे... जिन्होने ऐसे ही एक जेहादी हत्यारे का न सिर्फ बचाव किया था बल्कि मरने वाले को ही दोषी ठहरा दिया था... आपको ये इतिहास बताना इसलिए ज़रूरी है कि आज भी हालत बदले नहीं हैं... पूरे संसार को 'दारुल इस्लाम' बनाने का ख्बाव देखने वाले कट्टरपंथी दूसरों की धार्मिक की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं और बात जब अपने धर्म पर आती है तो मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं...

क्यों हुई थी महाशय राजपाल जी की हत्या

कुछ ऐसा ही हुआ था 1923 में... लाहौर में कुछ मुसलमानों ने दो पुस्तकें प्रकाशित कीं... एक का नाम था 'कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी' जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र पर कई सवाल उठाये गये थे... यहां तक कि व्यसनी और व्याभिचारी साबित करने की कोशिश की गई थी... इस किताब में श्रीकृष्ण पर ऐसी-ऐसी टिप्पढियां थी कि उन्हे यहां लिखा भी नहीं जा सकता है... वहीं दूसरी किताब का नाम था 'बीसवीं सदी का महर्षि' जिसे अल्फराक के सम्पादक अली कासिम ने छपवाया था... इस किताब में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद पर बेहूदी भाषा में नीजि टिप्पढ़ियां की गई थीं...

ये किताबे प्रकाशित की गई इसे भी सहन किया जा सकता था लेकिन इन्हे मुफ्त में मस्जिदों और बाजारों में बांटा जाता था, जिससे लोगों का हिंदू धर्म और आर्य समाज से भरोसा उठ जाये... कट्टरपंथियों की ये करतूत कुछ आर्यसमाजियों को नगवार गुज़री... इन्हे में से एक थे महाशय राजपाल... जो लाहौर में पुस्तक प्रकाशन का काम करते थे... कट्टरपंथी मुसलमानों को उन्ही की जुबान में जवाब देने के लिए महाशय राजपाल ने एक पुस्तक का प्रकाशन किया जिसका नाम था रंगीला रसूल... जिसे लिखा था एक आर्यसमाजी चमुपति ने... ये किताब छपते ही मुस्लिम समाज की तीखी प्रतिक्रिया सामने आ गई... हैरत की बात है कि इनमें से कुछ लोग जब भगवान श्रीकृष्ण का अपमान करने वाली किताब बांट रहे थे तब सारे के सारे चुप थे... लेकिन अब सब एक होकर महाशय राजपाल के पीछे पड़ गये... कट्टरपंथी मुसलमानों की सोच तो समझ में आती है लेकिन सबसे हैरान कर देने वाली प्रतिक्रिया थी मोहनदास करमचंद गाधी की... हिंदू विरोधी किताबों पर चुप रहने वाले गांधी ने इस नई किताब के आते ही लेखों की झड़ी लगा दी... उन्होने अपने अखबार यंग इंडिया में आर्य समाज और राजपाल के खिलाफ लंबे-लंबे लेख लिखे... एक लेख में तो उन्होने आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद की महान रचना सत्यार्थ प्रकाश को एक निराशाजनक ग्रंथ तक बता दिया...

गाँधी की गलती की सजा -

गांधी ने अपने लेखों से जो बखेड़ा खड़ा किया उसका असर जल्द देखने को मिल गया... कट्टरपंथी मुसलमान महाशय राजपाल की जान के प्यासे हो गये... तो वहीं कुछ पढ़े लिखे मुसलमानों ने राजपाल के खिलाफ 153-A के तहत मुकदमा लिखवा दिया... केस लंबा चला और जनवरी 1927 में लाहौर के निचली अदालत ने महाशय राजपाल को दोषी मानते हुए 6 महीने की सज़ा सुना दी... लाहौर की जिला अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा लेकिन महाशय राजपाल और आर्यसमाज भी झुकने को तैयार न था... मामला लाहौर हाईकोर्ट पहुंचा... जहां 4 मई 1927 को निचली अदालतों के फैसलों को बदलते हुए जस्टिस दलीप सिंह ने महाशय राजपाल को सारे आरोपों से बरी कर दिया... जस्टिस दलीप सिंह ने 93 साल पहले अपने एतिहासिक फैसले में जो कहा था, उसे हर सोकॉल्ड सेक्युलर को सुनना चाहिए... उन्होने कहा था कि

"किसी व्यक्ति ने कोई अपराधिक कार्य किया है या नहीं... ये इस आधार पर तय नहीं होगा कि एक वर्ग विशेष क्या चाहता है।"

महाशय राजपाल के पक्ष में लाहौर हाइकोर्ट का फैसला आते ही कट्टपंथी बौखला गये... हैरत की बात है कि इनमें वो मोहम्मद अली जिन्ना और अल्लामा इकबाल जैसे मुसलमान भी थे जो उस दौर में खुद को बड़ा सेक्युलर बताते थे... और तो और जिस मौलाना मोहम्मद अली जौहर को जिसे गांधी अपना भाई बताते थे उन्होने तो महाशय राजपाल के खिलाफ एक तरह से फतवा ही जारी कर दिया... उन्होने 1 जुलाई 1927 को दिल्ली की जामा मस्जिद में एक भारी भीड़ को संबोधित करते हुए कहा था कि -

"भारी तादाद में जमा मुसलमानों की भीड़ एक आवाज़ में सरकार से ये मांग करती है कि लाहौर हाईकोर्ट के फैसले को तत्काल बदला जाये। अगर सरकार ने किसी भी तरह की देरी की तो मुसलमान कानून अपने हाथ में लेने के लिए मजबूर हो जाएंगे।"

कैसे हुई थी महाशय राजपाल जी की हत्या

अगले दो सालों में राजपाल जी पर दो जानलेवा हमले हुए लेकिन दोनों ही बार वो बच गये। लेकिन तीसरा हमला उनके लिये प्राणघातक साबित हुआ... 6 अप्रैल 1929 को वो अपनी दुकान में बैठे हुए थे तभी उनपर इल्मउद्दीन नाम के एक कारपेंटर ने चाकूओं से बार 8 घातक वार किये और जिससे उनकी वहीं मृत्यु हो गई... 19 साल के कातिल इल्मउद्दीन को मौके पर ही पकड़ लिया गया...

आपको ये जानकर आश्चर्य हो होगा कि सारे जहां से अच्छा लिखने वाले शायर अल्लामा इकबाल के कहने पर मोहम्मद अली जिन्ना ने कातिल इल्मुद्दीन की तरफ से पैरवी की... जिन्ना ने कोर्ट में ये दलील दी कि इल्मउद्दीन की उम्र सिर्फ 19 साल है इसलिए उसे माफ कर दिया जाना चाहिए... लेकिन जिन्ना ये केस हार गये और लाहौर हाईकोर्ट के आदेश पर 31 अक्टूबर 1929 को इल्मउद्दीन को फांसी पर लटका कर उसे मियांवाली जेल के अंदर ही दफन कर दिया गया... सोचिए इसके बाद भी अल्लामा इकबाल नहीं रुके... उन्होने कातिल इल्मुद्दीन के शव को जेल की कब्र से निकाल कर मुस्लिमों को सौंपे जाने की मांग की... इकबाल की मांग मान ली गई और कहते हैं कि लाहौर के 6 लाख मुसलमान इल्मुद्दीन के जनाजे में शामिल हुए... इकबाल ने इल्मुद्दीन की कब्र पर भाषण देते हुए कहा कि -

"शहीद इल्मुद्दीन ने 19 साल की उम्र में हमारी आंखे खोल दीं। हम जैसे पढ़े-लिखे लोग सिर्फ बातें करते रह गये और एक बढ़ई (कारपेंटर) का बेटा (इल्मुद्दीन) हमसे आगे निकल गया।"

कातिल इल्मुद्दीन को आज भी पाकिस्तान में शहीद और गाजी माना जाता है... लाहौर के मियांवली में आज भी उसकी मज़ार है... जिसे आज भी फूलों से सजाया जाता है और सैकड़ो लोग यहां दुआ पढ़ने आते हैं... इल्मुद्दीन की मज़ार पर हर साल उर्स लगता है जिसमें हज़ारों की तादाद में लोग शामिल होते हैं... यहां तक कि पाकिस्तान में इल्मुद्दीन के उपर दो-दो फिल्में भी बन चुकी है, जिसे वहां कि सरकार ने टैक्सफ्री कर दिया था... इतना ही नहीं 2013 में लाहौर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई जिसमे इल्मुद्दीन का केस फिर से खोले जाने और उसे बाइज्जत बरी करने की मांग की गई थी... सोचिए एक हत्यारे को जिन्ना, अलल्लामा इकबाल और पूरा पाकिस्तान आजतक उसे एक शहीद मानता है

राजपाल जी की हत्या पर गांधी Vs वीर सावरकर

महाशय राजपाल की हत्या के 2 दिन बाद यानी 8 अप्रैल 1929 को क्रांतिकारी भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंका था... हालांकि इन दोनों घटनाओं में कोई संबंध नहीं था... लेकिन फिर भी गांधी ने इन दोनों घटनाओं को जोड़कर एक लेख लिखा... बम एंड द नाइफ यानी बम और चाकू के नाम से लिखा गया ये लेख यंग इंडिया में 18 अप्रैल 1929 को छपा... इस लेख में गांधी लिखते हैं कि -

"अभी कुछ दिन पहले हिंदु नामधारियों ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंका था। आज़ादी के नाम पर बम फेंकने वालों ने आज़ादी के काम को नुकसान पहुंचाया है… महाशय राजपाल की हत्या ने उन्हें शहीद बना दिया जबकि वह इसके योग्य नहीं थे।"

गांधी ने अपने लेख में ये भी आरोप लगाये कि पैसा कमाने के लिए महाशय राजपाल ने ये किताब छापी थी... इस लेख से उस दौर के कई नेताओं को बहुत तकलीफ पहुंची थी... इन्ही में से एक थे वीर सावरकर... उन्होने मराठी अखबार केसरी में महात्मा गांधी को जवाब देते हुए एक लेख में लिखा कि -

"यंग इंडिया किसका अखबार है? क्या इसकी कॉपिया नहीं बेची जाती क्या? गांधीजी की पुस्तकें नहीं बिकती? यंग इंडिया और अपनी पुस्तकों के कारण क्या गांधीजी को सिर्फ एक व्यवसायी माना जाएगा?"

एक ओर तो मुस्लिम नेताओं ने एक सड़क छाप हत्यारे को शहीद कहा... जबकि दूसरी तरफ गांधीजी जैसे नेताओं ने महाशय राजपाल को ही दोषी ठहराया... मोहम्मद अली, जिन्ना, इकबाल जैसे मुस्लिम नेताओं ने खुलकर इल्मुद्दीन जैसे हत्यारे का साथ दिया, और क़ानून का मजाक बनाया, जिसने महाशाय राजपाल को बरी किया था... दरअसल ये मानसिकता आज भी जिंदा है... जो दूसरे के धर्म का तो सम्मान नहीं करती लेकिन अपने धर्म की बात आते ही खूनखराबे पर उतरना सिखाती है... बेहतर होगा कि अगर आप अपने धर्म का सम्मान चाहते हैं तो दूसरे का धर्म का भी उतना ही सम्मान करें... और ये बात दोनों तरफ लागू होती है।

आज डॉ. अंबेडकर होते तो वो क्या कहते?

आज इस्लामिक कट्टरपंथियों ने जो माहौल बनाया है... उदयपुर और अमरावती में जो हुआ है... अगर आज डॉ. अंबेडकर होते तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होती... इसे जय भीम, जय मीम का नारा लगाने वालों को ध्यान से सुनना चाहिए।

हिंदू नेताओं की हत्या पर बाबासाहेब की प्रतिक्रिया

खिलाफत आंदोलन के असफल होने के बाद जब 1920 के दशक में कई हिंदू नेताओं की मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हत्यायें की तो उस पर डॉ. अंबेडकर के विचार जानना ज़रूरी है। उन्होंने अपनी मशहूर पुस्तक "पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन" में इस मुद्दे पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होने अपनी इस पुस्तक के पेज नंबर 163 पर लिखा है कि -

"हिंदु-मुस्लिम एकता बनाने के लिए गांधीजी ने हिंदुओं के विरुद्ध घोर अपराध किये जाने पर भी मुसलमानों से उसके कारण नहीं पूछे। स्वामी श्रद्धानंद, लाला नानकचंद, लेखक राजपाल, नाथूरामल शर्मा जैसे जाने-माने हिंदू नेताओं की हत्या कर दी गई। ये लिस्ट बहुत छोटी है और इसे आसानी से लंबा किया जा सकता है। इन हिंदू नेताओें की हत्या की मुसलमानों ने कभी बुराई नहीं की, बल्कि उन्होने कातिलों को गाज़ी बताकर स्वागत किया और उन्हे सज़ा से बचाने के लिए आंदोलन तक किये। इन हत्याओं पर मुसलमानों का नज़रिया तो समझ में आता है लेकिन गांधीजी का दृष्टिकोण समझ से परे है। वैसे तो गांधीजी ने हिंसा की किसी भी घटना की निंदा का कोई अवसर नहीं छोड़ा है, लेकिन हिंदू नेताओं की हत्याओं पर गांधीजी ने कभी विरोध प्रकट नहीं किया।"

मुसलमानों की देशभक्ति पर डॉ. अंबेडकर के विचार

इस्लाम एक बंद खि़ड़की की तरह है जो मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच भेद करता है... इस्लाम में जिस भाईचारे की बात की गई है वो मानवता का भाईचारा नहीं है बल्कि उसका मतलब सिर्फ मुसलमानों का मुसलमानों से भाईचारा है... मुसलमानों के भाईचारे का फायदा सिर्फ उनके अपने लोगों को ही मिलता है... और जो गैर मुस्लिम हैं उनके लिए इस्लाम में सिर्फ घृणा और शत्रुता ही है... मुसलमानों की वफादारी उस देश के लिए नहीं होती जिसमें वो रहते हैं... बल्कि उनकी वफादारी अपने धर्म के लिए होती है जिसका कि वो पालन करते हैं

स्रोत - पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन (लेखक – डॉ. अंबेडकर) पेज नंबर 332

इस्लाम का कानून सबसे ऊपर

इस्लाम ये कहता है कि अगर किसी गैर मुस्लिम देश में मुसलमानों के कानून यानी शरिया और उस देश के कानून के बीच विवाद पैदा हो जाए तो इस्लामिक कानून को ऊपर यानी सही माना जाए... इस तरह मुसलमानों के लिए ये सही माना जाएगा कि वो मुस्लिम कानून का पालन करें और उस देश के कानून को न मानें...

स्रोत - पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन (लेखक – डॉ. अंबेडकर) पेज नंबर 294

धर्म पहले, देश बाद में... मुस्लिम देशों का स्थान पहला

ये अखिल इस्लामवाद यानी मुस्लिम ब्रदरहुड का आधार है कि जिसकी वजह से भारत का हर मुसलमान ये कहता है कि वो मुसलमान पहले है और भारतीय बाद में... इसी भावना की वजह से भारतीय मुसलमानों ने भारत की तरक्की में बहुत छोटी भूमिका निभाई... एक मुसलमान की सोच में मुस्लिम देशों का स्थान पहला है और भारत का स्थान दूसरा है...

स्रोत - पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन (लेखक – डॉ. अंबेडकर) पेज नंबर 299

मुस्लिम देश की मदद ले सकते (नुपूर शर्मा केस में यही किया)

"तथ्य यह है कि भारत, चाहे एक मात्र मुस्लिम शासन के अधीन न हो, दार-उल-हर्ब है, और इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी कामयाबी के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति यानी किसी मुस्लिम देश की मदद भी ले सकते हैं, और यदि कोई मुस्लिम देश जेहाद की घोषणा करना चाहता है तो उसकी सफलता के लिए भारत के मुसलमान उसे मदद भी दे सकते हैं।"

स्रोत - पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन (लेखक – डॉ. अंबेडकर) पेज नंबर 297

हिंदुओं की सरकार स्वीकार नहीं

"हिंदुओं से नियंत्रित और शासित सरकार की सत्ता मुसलमानों को किस सीमा तक स्वीकार होगी इसके लिए ज्यादा माथापच्ची करने की ज़रूरत नहीं है... मुसलमानों के लिए हिंदू काफिर हैं और उनकी कोई सामाजिक स्थिति यानी हैसियत नहीं होती है... इसलिए जिस देश में काफिरों का शासन हो, वो देश मुसलमानों के लिए दारुल हर्ब है... ऐसी स्थिति में ये साबित करने के लिए सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमानों के अंदर हिंदू सरकार के शासन को स्वीकार करने की शक्ति मौजूद ही नहीं है... अंबेडकर आगे लिखते हैं कि जब खिलाफत आंदोलन के दौरान मुसलमानों की मदद के लिए हिंदू काफी कुछ कर रहे थे तब भी मुसलमान ये नहीं भूले कि उनकी तुलना में हिंदू निम्न और घटिया कौम है..."

स्रोत - पाकिस्तान अ वा भारत का विभाजन (लेखक – डॉ. अंबेडकर) पेज नंबर 303

इस्लाम से बड़ा कोई नहीं

मुसलमानों के ये सिखाया जाता है कि इस्लाम के अलावा कहीं सुरक्षा नहीं है और इस्लामी कानून से सच्चा कोई कानून नहीं है... इसी वजह से मुसलमान खुद के अलावा कुछ और सोच पाने के काबिल नहीं बचे हैं... उन्हें इस्लामी विचार के अलावा कोई और विचार पसंद ही नहीं आता है... मुसलमानों के जेहन में ये गहराई से बैठा हुआ है कि सिर्फ वो ही सच्चे हैं और सिर्फ.. वो ही विद्वान हैं...

स्रोत - पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन (लेखक – डॉ. अंबेडकर) पेज नंबर 234

लाभ उठाने की मानसिकता

मुसलमानों की मानसिकता गलत तरीके से लाभ उठाने की रही है, जिसका सबूत ये है कि वो गोहत्या का अधिकार औऱ मस्जिदों के बाहर बाजे-गाजे की मनाही की मांग कर रहे हैं... जबकि इस्लाम धर्म में गो-बलि यानी गौ-हत्या पर बल नहीं दिया गया है... और यहां तक कि जब मुसलमान मक्का-मदीना की यात्रा पर जाते हैं तो गौ बलि नहीं करते हैं... लेकिन भारत में वो किसी दूसरे पशु की बलि से संतुष्ट नहीं होते... दुनिया के कई देशों में मस्जिद के बाहर गाजे-बाजे पर आपत्ति नहीं है लेकिन भारत में वो ऐसा नहीं चाहते...

स्रोत - पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन (लेखक – डॉ. अंबेडकर) पेज नंबर 268

Updated : 8 July 2022 2:17 PM GMT
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स्वदेश वेब डेस्क

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