हिन्दू सम्मेलन:सामाजिक पुरुषार्थ के जागरण का महोत्सव

हिन्दू सम्मेलन:सामाजिक पुरुषार्थ के जागरण का महोत्सव
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हेमंत मुक्तिबोध

मगध सम्राट अजतरा लिच्छवी गणराज्य में वज्जियों की नगरी वैशाली हो परास्त करने के लिए बेचैन थे। कोई उपाय सुझ नहीं रहा था। अंततः उन्होंने अपने महामात्य की भगवान खुद के पास भेजा। मामात्य ने तधामत से काहा भगवन, हम वैशाली को परास्त करना चाहते हैं। कृपया कोई उपाय बताएं। तथागत ने सुना और अपने शिष्य आनंद से कुछ प्रश्न पूछेः अंते, क्या बज्जियों के सन्नपद (सांसद अधिवेशन या सामूहिक विचार विमर्श) वारंवार होते रहते हैं? क्या वे संघचाद होकर उद्यम करते हैं यानी चे अपने राष्ट्रीय कार्य सामूहिक रूप से करते है? क्या बजि अपनी विधान संस्थाओं के अनुसार सम्मिलित होकर चलते हैं? क्या वह अपनी कुलवधुओं और कुमारियों का आदर करते हैं? क्या वे वृद्धों को सेवा और पैराज्य का मान करते हैं? आनंद ने उता दिया हाभगवन, लिच्छवी इन राय नियमों का पालन करते हैं। यह सुनते हये तचायत ने महामात्य की और देखते हुए कहा तो आनंद, यह सारे कर्तव्य गाजतंत्र के प्राग है। जब तक लियछवी इन कर्तव्यों का पालन करते रहेंगे तब तक वे अजेय ही रहेंगे। उन्हें कोई परास्त न कर सकेगा।


उक्त प्रसंग में तथागत जिन कर्तव्यों की ओर इंगित करते हैं वह केवल युग धर्म ही नहीं शाश्वत धर्म भी हैं। इतिहास के किसी भी कालखंड में किसी भी देश या सभ्यता का उत्कर्ष तभी हुआ और तभी तक कायम रहा जब तक वहां अपने लोगों के साथ व्यवहार में सत्य, सामूहिकता, संवेदनशीलता, समादर, विचार स्वातंत्र्य और कर्तव्य भावना जैसे धर्म तत्वों की प्रधानता रही। इस धर्म को संघ-धर्म या संगठन-धर्म भी कहा जा सकता है। दरअसल, संघ-धर्म ही किसी राष्ट्र के लिए ऐश्वर्य प्राप्ति की राजविद्या होती है।

भारत जब अपने उत्कर्ष के स्वर्ण युग में गौरवपूर्ण जीवन जी रहा था और उसके ऋषिगण घोषणाएं कर रहे थे कि

'एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः ।।'

तो उसका आधार यही संघ-धर्म था। उसी के सहारे धर्म-तत्व टिके हुए थे। दुर्भाग्यवश अनेक कारणों से इन धर्म तत्वों में समाज की प्रवृत्ति क्षीण होती चली गई। हिंदू समाज एक समाज के रूप में जीवित रहने की राजविद्या से दूर होता चला गया औरइसी कारण वह 'श्री', विद्या, ऐश्वर्य और स्वाभिमान को भी खोता चला गया, क्योंकि इन सबका वास्तविक आधार तो संघ धर्म ही है।

हिंदू समाज की इस त्रासद विडंबना को अनेक महापुरुषों ने समझा और अपने-अपने स्तर पर सुधार के प्रयत्न किए, जिनका उल्लेख हमें अपने इतिहास में मिलता है। ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व थे डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार। उन्होंने इस देश की नब्ज पर हाथ रखकर रोग की पहचान की। वह रोग था- आत्मविस्मृति, आत्महीनता, असंगठन तथा अपने राष्ट्रीय कर्तव्य बोध की अस्पष्टता और उसके प्रति उदासीनता। समाज के इसी रोग का निदान करने के लिए वर्ष 1925 में डॉ. हेडगेवार के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य प्रारंभ हुआ। अपनी उत्कृष्ठ देशभक्ति, योजकता और लोक संग्रही स्वभाव से उन्होंने एक ऐसी कार्य पद्धति विकसित की जिसने लोगों में निजी हित लाभ से ऊपर उठकर देश के लिए कुछ श्रेष्ठ निर्माण करने की आकांक्षाएं उत्पन्न की। संघ ने हिंदुत्व के शाश्वतमूल्यों को नई कालानुरूप भूमिकाओं में परिभाषित और प्रतिष्ठित किया। उसने केवल एक जीवन दृष्टि ही नहीं बल्कि एक विचार दृष्टि भी देते हुए हिंदुत्व को नए संदर्भों और भाष्यों से समन्वित किया।


संघ की इस सहज विलवित मंथर गति से चलती हुई अविश्रांत यात्रा ने अपने 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। संघ की संगठनात्मक समीक्षाओं में सिंहावलोकन और विहंगावलोकन का एक अनिवार्य स्थान रहा है। सिंहावलोकन याने समय-समय पर पीछे मुड़कर देखना कि हम अपने ध्येय मार्ग पर कितना आगे बढ़े, किस गति से बढ़े और अब आगे क्या करना है।

विहंगावलोकन याने एक व्यापक और उदात्त दृष्टि से सामाजिक हलचलों को देखते हुए ऐसे लोगों व संगठनों की पहचान करना जो निजी स्वार्थ से परे यथाशक्ति अपने-अपने स्तर पर कोई सामाजिक कार्य कर रहे है। इस अवलोकन के आधार पर संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों को योजना बनाई। अपने संगठनात्मक कार्य के विस्तार के साथ-साथ समाज की युवा शक्ति, महिला शक्ति और सज्जन शक्ति के साथ संवाद और समन्वय से समाज में अपने स्वत्व, राष्ट्रीय पहचान और सामाजिक कर्तव्य के प्रति चेतना बढ़ाते हुए सामूहिक प्रयत्नों से सामाजिक पुरुषार्थ का जागरण करना इन योजनाओं का एक प्रमुख उद्देश्य रहा है।

इसी तारतम्य में सारे देश में एक लाख से अधिक हिंदू सम्मेलन हो रहे हैं। गांव-गांव और नगरों की बस्ती-बस्ती में हो रहे हिंदू सम्मेलनों में जिस बड़ी संख्या में हिंदू समाज एकत्रित हो रहा है वह सचमुच विस्मयकारी है। इनमें महिलाओं और युवाओं की सहभागिता अभूतपूर्व है। समाज की इस उत्साहपूर्ण सहभागिता का संकेत यही है कि ऐसे आयोजन और उनमें उठाये जा रहे मुद्दे, जगाए जा रहे प्रश्न और सुझाए जा रहे समाधान कहीं न कहीं समाज की आकांक्षाओं और भावनाओं को गहरे तक स्पर्श करते है। संघ ने 10 हजार की आबादी को एक बस्ती माना है। एक मोटे आकलन के अनुसार शहरों और कस्बों की बस्तियों के सम्मेलनों में औसतन 1000 से 4000 तक लोग सहभागी हुए हैं। अर्थात प्रत्येक बस्ती के 10% से लेकर 40% तक लोगों ने हिंदू सम्मेलनों में सहभागिता की है। ग्रामीण क्षेत्र के मंडाल (8 से 10 गांव के संकुल) सम्मेलनों में यह संख्या 5000 से 20000 और कहीं-कहीं 40 हजार तक गई है। इसलिए इन सम्मेलनों का आकलन करते समय उनके भू- राजनीतिक (Geopolitical) और मनो-सांस्कृतिक (psyco cultural) प्रभावों को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा।

इन सम्मेलनों ने कंवात समाज को ही नहीं वरन संघ के कार्यकर्ताओं की मनोभूमिका और हर जगह सक्रिय अन्य स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी गहरे तक प्रभावित किया है। इसलिए इसके निहितार्थ और फलितार्थ दोनों बहुत महत्वपूर्ण होंगे।

सम्मेलनों के सामाजिक प्रभाव

भारत में तरह-तरह के धार्मिक, जातीय क्षेत्रीय और राजनीतिक सम्मेलन होते रहते हैं, किंतु किसी भी तरह के आर्थिक, जातिगत और राजनीतिक एजेंडा के बगैर, किसी धार्मिक 'पुण्य-लाभ' की कामना के बगैर और अपनी जाति, वर्ण और वर्ग से परे केवल अपनी 'हिंदू पहचान' से इतनी चाड़ी संख्या में लोगों का एकत्रित होना अभूतपूर्व है। समाज की इस हिंदू पहचान का दूढ़ होना भारत के भविष्य की दृष्टि से बहुत महात्वपूर्ण है। इनके कारण समाज का अपनी अंतर्निहित शक्ति से परिचय हुआ। अपने-अपने घर में सब अकेले थे किंतु बाहर निकले तो उन्हें एक सामूहिकता दिखाई दी। एक शक्ति की अनुभूति हुई। शक्ति के अनेक स्तर होते हैं। व्यक्ति, समुदाय, समूह, संस्था, संगठन, आदि सबकी अपनी-अपनी शक्ति होती है। सबको जोड़ लें तो और भी बड़ी शक्ति खड़ी हो सकती है। किंतु सबसे बड़ी शक्ति होती सिद्धांत की। सिद्धांत अल्पमत या बहुमत पर निर्भर नहीं होता। सिद्धांत ही समाज को जुटने, जुड़ने, जूझने, जीने और जीतने की प्रेरणा देता है। हिंदुत्व ही वह सिद्धांत है जिसने समाज को इन सम्मेलनों में जुटने की प्रेरणा दी है। हिंदू समाज की मानसिकता में आता हुआ यह परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण है।


समाज पर इन सम्मेलनों के प्रभाव का एक और भी पक्ष है। सदियों तक हिंदू समाज अपनी अंतः-शक्ति के सहारे एक सात्विक और वैभवपूर्ण जीवन जीता आया है। संकट तब पैदा हुआ जब कतिपय कारणों से हमारा समाज पंगु होने लगा, शासकों पर निर्भरता बढ़ने लगी, स्वभाव में अकर्मण्यता आने लगी। अपने सामाजिक कर्तव्य का विस्मरण होने से सामाजिक पुरुषार्थ भी तिरोहित होने लगा। इन हिंदू सम्मेलनों में समाज की सज्जन शक्ति का एक समन्वित रूप सामने आया है। बेशक प्रेरणा संघ की थी. पर आयोजन और उपस्थिति सकल हिंदू समाज की थी। संस्थागत अभिनिवेश से लोग ऊपर उठे और 'मैं का 'हम' में रूपांतरण होता चला गया। छोटी-छोटी बस्तियों और ग्रामों में समाज ने स्वयं संसाधन जुटा कर हजारों लोगों को भोजन कराया। व्यवस्थाएं खड़ी की। गांव, गली, मोहल्ले के युवा और महिलाओं को इसमें जबरदस्त भूमिका रही। एक पंगत, एक संगत और स्वानुशासन के दृश्य में भारत को स्टेशात कैपिटल (सामाजिक पूंजी) जगमगा रही थी। संप का दृष्टिकोण रहा है कि जैसे सामाजिक अस्पृश्यता गलत है वैसे ही राजनीतिक अस्पृश्यता भी उचित नहीं है। इन सम्मेलनों में विभिन्न राजनीतिक मान्यताओं वाले लोग भी बढ़ चढ़ कर सम्मिलित होते दिखाई दिए है। हर संकट काल में भारत ने अपनी इसी पूंजी की शक्ति से अराजकता के व्याकरण को ध्वस्त किया है। संथ में गाए जाने वाले गीत 'सथ समाज की लिए साथ में आगे है बढ़ते जान्ह' का व्यावहारिक रूप ही मानो हिंदू सम्मेलनों के रूप में सामने आया है।

हिंदू सम्मेलनों का संघ पर प्रभाव

शताब्दी वर्ष के सभी प्रकार के कार्यक्रमों में हमें भविष्य में संघ के कार्य के स्वरूप का अनुमान मिलता है। संप आधिकारिक समाजाभिमुख हो सकता है। 'धार्मिक हिंदू' को 'सामाजिक और राष्ट्रीय हिंदू' बनाना शुरू से ही संघ की मंशा रही है। इस बड़े उद्देश्य की पूर्ति की दिशा में संघ राष्ट्रव्यापी तो बन ही चुका है, अब उसे और भी तीव्र गति से सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी भी बनना होगा। इन सम्मेलनों में व्यक्त हुई समाज की संघ के प्रति विश्वास और आशा की भावना यह रेखांकित करती है कि संघ के कार्यकर्ता को सही मायने में 'हिंदू समाज कार्यकर्ता बनना होगा। यह उसकी जिम्मेदारी होगी कि लाखों की संख्या में कार्यक्रमों में सहभागी बने हिंदू उसके सहयोगी भी बनें। वे संघ को अच्छा ही नहीं, अपना भी मानें। भारत के प्रति उनमें एक सपना हो और उन सपनों की पूर्ति में उनकी भी कोई सुनिश्चित भूमिका हो। हर थीम को टीम देने और हर टीम को थीम देने का महती उत्तरदायित्व अब उसके कंधों पर है।


संघ के लिए यह एक अवसर भी है और एक चुनौती भी। संघ के प्रति इतनी स्वागतशीलता समाज में इससे पूर्व शायद ही कभी अभिव्यक्त हुई हो। यह उसने अपने कार्यकर्ताओं के त्याग, परिश्रम और ध्येयनिष्ठा से अर्जित की है। सौ वर्षों की इस यात्रा में लाखों लहूलुहान पैरों से रिसते रक्त ने भी केसरिया ध्वज को उसकी आभा प्रदान की है। प्रसिद्ध कवि मनोज मुंतशिर ने लिखा है कि 'जो भी मिला इसलिए मिला कि हँस के बहुत कुछ खोया हमने, यह जो सूरज देख रहे हो जुगनू-जुगनू बोया हमने'।

यह 'बहुत कुछ खोने' और 'जुगनू जुगनू बोने' की ध्येयनिष्ठा और धैर्य-निष्ठा अपने कार्यकर्ताओं में बनाए रखना एक बहुत बड़ी कसौटी होगी। सौ सालों से संघ इस काम को बखूबी करता आया है। किन्तु अब अनुकूलता में छिपी प्रतिकूलताओं को समझ कर 'संघ को संघ' बनाए रखने के लिए स्वयंसेवकों को बारंबार खराद पर चढ़ने और कसौटी पर कसे जाने के लिए खुद को तैयार रखना भी एक बड़ी चुनौती होगी। हिंदू सम्मेलनों ने समाज में देशात्मबोध के जागरण के लिए अवसरों के द्वार खोले हैं। ग्राम ग्राम में लोक-शक्ति केंद्रों में स्पंदन पैदा किया है। उनींदे कस्बों की उदासीन अस्तियों को उन्मेष से भरा है। महानगरों के आत्मकेंद्रित मोहल्लों में कुछ सामूहिकता घोली है। सारे समाज की अन्तर्लय में हिंदुत्व अब एक स्थायी स्वर बनता दिख रहा है। यह संघ और समाज की जुगलबंदी शुरू होने का वक्त है। संघ और समाज में अद्वैत निर्माण करने का यह शायद सवाधिक अनुकूल समय है। यह जुगलबंदी ऐसी हो कि संघ, संघ न रहकर समाज बन जाए और समाज स्वयं ही संघ बन जाए। यह एक राष्ट्रीय साधना है जिसका उद्देश्य है देश के हृदय को एकजुट करना, मनुष्य का मनुष्य से मनुष्य की तरह आत्मीय संबंध विकसित करना। यही हमारे राष्ट्रीय जीवन, हमारी अस्मिता और अस्तित्व का आधार है। तथागत ने अजातशत्रु के महामात्य को यही संदेश दिया था। यही मंत्र हमारे ऋषियों ने भी हमें दिया था

'समानो मंत्रः समितिः समानी समानं मनः सहचित्तमेषाम समानं मंत्रमधिमंत्रये वः समानेन वो हविषा जुल्होमी।

अर्थात मिलकर कार्य करने वालों का सामान मंत्र हो। हमारा लक्ष्य एक हो। सब के चित्त व मन एक समान हों। हमारी सोच व कामनाएं समान हों ताकि एक समान लक्ष्य हमें संगठित करके रखें। दरअसल यही हिंदू सम्मेलनों का निहितार्थ, गर्भितार्थ और फलितार्थ है।


हेमंत मुक्तिबोध


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