आदमी को पहाड़ खाते देखा है!

भोपाल से इंदौर जाते हुए जब देवास बायपास से गुजरता हूँ, तो कलेजा हाथ में आ जाता है। बायपास शुरू होते ही बाएँ हाथ हनुमानजी की विराट प्रतिमा है। उसके पीछे खड़े पहाड़ का दृश्य बेहद दर्दनाक है। उसे देखकर कई भाव उभरते हैं जैसे किसी चमगादड़ ने अमरूद का आधा हिस्सा खाकर फेंक दिया हो, जैसे जंगली कुत्तों ने जिंदा बनभैंसे के लोथड़े निकाल लिए हों, जैसे हमने जन्मदिन का केक चाकू से काट दिया हो।
यदि आपमें जरा भी संवेदना होगी, तो इस अधखाए पहाड़ को देखकर कुछ ऐसा ही लगेगा। दाईं ओर गुंगुआती हुई कई चिमनियाँ दिखेंगी। दृश्य ऐसा बनता है, मानो धरती माता के मुँह में जबरन कई सुलगती हुई बीड़ियाँ ठूँस दी गई हों।
यह दृश्य सिर्फ देवास का नहीं है। आप जहाँ भी रहते हों, उसके दस किलोमीटर की परिधि में नजर दौड़ाइए इससे भी अधिक बीभत्स और कारुणिक दृश्य मिल जाएंगे। पर इसे अंतस से महसूस करने के लिए वाल्मीकि की दृष्टि जगानी होगी, जिन्होंने क्रौंच-बध की घटना में क्रौंचनी के विलाप से उपजी करुणा के चलते सृष्टि की पहली कविता रच दी। यह दृष्टि हर मनुष्य में है।
हाँ, मैं प्रकृति-प्रेमी हूँ। मेरी मुक्ति मुझे यहीं दिखाई देती है। जब भी समय मिलता है, विंध्य के वनप्रांतर में भटक लेता हूँ। सिंगरौली के धुएँ से निकलकर उससे लगे जंगलों में खूब भटका हूँ। यदि वाल्मीकि आज यहाँ आकर घूमते, तो गश खाकर गिर पड़ते। हम भौतिकवादी, खुदगर्ज आदमी हैं, इसलिए ये सब कुछ देखकर भी देख लेते हैं।
यहाँ आकर आप देखेंगे कि आदमी ने किस तरह धरती को उलट-पलट कर माटी के ढूहों जैसे नंगे पहाड़ खड़े कर दिए हैं। लगभग तीन सौ किलोमीटर की परिधि का नामो-निशान मिट गया है। पहाड़ पिसकर बिजली में बदल दिए गए। खैर, उन अद्भुत जंगलों और वन्यजीवों की बात कौन करे यहाँ के वासिंदा आज किस लोक में हैं, किसी को खबर नहीं।
विकास का ऑक्टोपस सिंगरौली से लगे सरई क्षेत्र के खूबसूरत जंगलों की ओर बढ़ रहा है। यह दुनिया के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में से एक है—पेड़-पौधों की दृष्टि से भी और जीव-जंतुओं की दृष्टि से भी। छत्तीसगढ़ और उत्तरखंड के हाथियों का यह कॉरिडोर है। भालुओं का प्राकृतिक आवास। गुफाओं की श्रृंखलाएँ आदिम सभ्यता की कहानी कहती हैं।
इस क्षेत्र का गुनाह सिर्फ इतना है कि इसके पेट में कोयला है, और वह कोयला हमारी ग्रोथ रेट के लिए जरूरी है। इसलिए वह चाहिए हर हाल में, किसी भी कीमत पर। कभी-कभी गुण भी मौत के गाहक बन जाते हैं, जैसे कस्तूरी मृग के लिए कस्तूरी और मणि नाग के लिए मणि। यह तय है कि आज नहीं तो कल इस खूबसूरत वन की कस्तूरी और मणि की कीमत विकास की बलिवेदी पर चढ़कर चुकानी होगी।
कहा जाता है कि हमारा समाज धर्मभीरु है। उसकी रक्षा के लिए हम किसी भी पराकाष्ठा तक जा सकते हैं। यदि ऐसा आप भी सोचते हैं, तो एक बार चित्रकूट हो आइए। यहाँ भगवान श्रीराम साढ़े ग्यारह वर्ष रहे। जहाँ वे विचरते रहे होंगे, वहीं के जंगलों और पहाड़ों के भीतर उम्दा किस्म का बॉक्साइट है। इसलिए भगवान राम की स्मृतियाँ बचें या जाएँ चूल्हे-भाड़ में।
बेरहम विकास यात्रा और ग्रोथ रेट के चंद्रखिलौने के लिए हमें वे जंगल और वे पहाड़ चाहिए ही चाहिए। जिस सिद्धा पहाड़ को देखकर राम ने भुज उठाकर प्रण का संकल्प लिया था, उसकी आज की गति देखिए—जरा भी संवेदना होगी, तो रो पड़ेंगे। जेसीबी के पंजों से ऐसे बॉक्साइट निकाला गया है, जैसे गिद्ध मरी लाश से अंतड़ियाँ निकालते हैं।
सरभंग ऋषि का जहाँ आश्रम था, उस वनप्रांतर को भी खनिज के लिए शिकारी कुत्तों की तरह नोच-खसोट दिया गया है। पूरे देश के पहाड़ों और वनों के साथ ऐसा ही निर्दयी व्यवहार हो रहा है। किसलिए? क्योंकि विकास के लिए यह जरूरी है। इससे ग्रोथ रेट बढ़ती है।
ग्रोथ रेट की गणित बड़ी बेरहम है। खड़े हुए पेड़ों का विकास में कोई योगदान नहीं माना जाता। इन्हें काटिए, राजमार्ग निकालिए, और पेड़ों को आरा मिल या पेपर मिल भेजिए तभी विकास को गति मिलेगी। खड़े हुए पहाड़ विकास के बाधक हैं। उन्हें केक की तरह काटकर सड़कों में पसराना पड़ेगा, तभी विकास की गाड़ी आगे बढ़ेगी।
बहती हुई नदियों का भी तब तक कोई योगदान नहीं, जब तक उन्हें बाँधकर गाँवों को न डुबो दिया जाए। यह विकास का नया दर्शन है, जहाँ संवेदना, स्मृति और जीवन की कोई हैसियत नहीं। विकास के समानांतर विनाश की भी ग्रोथ रेट होती है, लेकिन इसे नापे कौन? यह अर्थशास्त्रियों के विमर्श का विषय नहीं है।
अब कुछ सवाल खुद से पूछिए क्या हम कोई पहाड़ बना सकते हैं? क्या जंगल, नदियाँ, झरने पैदा कर सकते हैं? तो फिर इन्हें सजाकर मौत देने और नष्ट-भ्रष्ट करने का अधिकार हमें कहाँ से मिला?
पुराणकथाओं में वर्णन है कि एक बार सहस्त्रबाहु ने नर्मदा को बाँधने की कोशिश की थी। परशुराम ने उसके सभी हाथ काट दिए थे। आज हम नदियों को बाँधने, उनकी धारा मोड़ने और पहाड़ों-जंगलों को खाने की राक्षसी कोशिशें कर रहे हैं।
हमारे वैदिक वाङ्मय में इन्हें माता, पिता, सहोदर, भगिनी, पुत्र और बंधु-बांधवों का दर्जा यूँ ही नहीं दिया गया है। ये हमें देते ही देते हैं। ये हैं, तभी हम हैं। नीति-ग्रंथों में लिखा है कि प्रकृति से उतना ही लें, जितना भ्रमर फूल से लेता है। हमें गाय की तरह दुहने की इजाजत है, उसे काटकर खाने की नहीं।
विकास की निर्दयी होड़ ने प्रकृति को कत्लगाह में बदल दिया है। संभाल सकें तो संभलिए, नहीं तो याद रखिए—ईश्वर की लाठी बेआवाज़ होती है, और हर किए की सजा इसी लोक में, इसी काया में मिलती है।
