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104 एकड़ में फैला हुआ है ग्वालियर का मेला

अरुण शर्मा


जब कोई बीज माटी में रखा जाता है तब यह कल्पना भी नहीं होती कि माटी में दबाया गया बीज एक दिन वटवृक्ष का रूप ले लेगा। मेला के संस्थापक महाराजा माधवराव सिंधिया प्रथम ने 1905 में मेला की स्थापना करते समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके द्वारा शुरू कराया गया मेला अपनी यात्रा के 100 वर्ष पूरे करेगा और इतिहास के पृष्ठों में अपना स्थान सुरक्षित कराएगा। आज से 1१५ वर्ष पहले 1905 में इस मेला की शुरूआत सागरताल पर पशु मेला के रूप में 50 हजार वर्ग फीट के मैदान में हुई थी, क्योंकि वहां पानी की सुविधा उपलब्ध थी। उस समय पूरी रियासत अकाल से पीडि़त थी। करोबार चौपट हो गया था। रोजी रोटी की समस्या पैदा हो गई थी। ऐसे विपरीत समय में क्षेत्र की जनता की माली हालत सुधारने के लिए इस पशु मेला की शुरूआत हुई। आज यह मेला एक वैभवशाली मेला हो गया है।

ग्वालियर का व्यापार मेला अपने आप में एक अद्भुद मेला है। इस मेला को देखने के लिए दूर-दूर के सैलानी आते हैं। यह मेला अपने आप में तमाम यादें संजोए हुए है। इस मेले में विभिन्न प्रकार की प्रदर्शनियां, झूले, दुकानें, कम्पनियों के शोरूम आदि आते हैं। ग्वालियर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से भारत का एक प्रमुख नगर है।

ग्वालियर व्यापार मेला 104 एकड़ में फैला हुआ है। इस मेला में स्थाई व अस्थाई कुल मिलाकर 2000 दुकानें हैं। देश की राजधानी दिल्ली स्थित प्रगति मैदान से सिर्फ 5 एकड़ छोटा यह मेला क्षेत्रफल के आधार पर देशभर में अद्वतीय माना जाता है।

पशु मेला को ग्रामीण और शहरीय क्षेत्रवासियों की लोकप्रियता मिलने पर और इसके व्यवसायिक रूप में भी विकसित होने पर वर्ष 1918 में इसकी स्थाई व्यवस्था के लिए ग्वालियर नगर के हृदय स्थल वर्तमान में रेस-कोर्स रोड पर 104 एकड़ में विस्तृत भू-भाग में आवश्यक सुविधाओं के साथ अधोसंरचना का निर्माण कराया गया। तब इसे व्यापार मेला एवं कृषि प्रदर्शनी के नाम से जाना जाता था। उस समय मेला की अवधि 20 दिसम्बर से 14 जनवरी तक होती थी। 23 अगस्त 1984 से इसे राज्य स्तरीय ट्रेड फेयर का दर्जा दिया गया। वर्ष 1967-68 में इसकी हीरक जयंती, वर्ष 1982-83 में प्लेटीनम जयंती और वर्ष 2004-05 में मेला का शताब्दी वर्ष मनाया गया। 30 दिसम्बर 1996 से ग्वालियर व्यापार मेला प्राधिकरण अधिनियम 1996 शासन ने प्रभावशील किया और इसके अधीन गठित प्राधिकरण को इसका प्रबंधन और संचालन सौंपा गया। 3 जनवरी 2002 से शासन ने इसका नाम श्रीमंत माधवराव सिंधिया व्यापार मेला घोषित किया। मेला में पक्की दुकानें, शोरूम सभी कुछ है। मेला में सड़कों के साथ शौचालय, सुलभ कॉम्पलेक्स, पेयजल, अस्थाई चिकित्सालय व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था, पार्क, रंगमंच ऑडिटोरियम आदि उपलब्ध हैं। साथ ही 22000 वर्गफुट का एक्सपोर्ट फेसिलिटेशन सेंन्टर का निर्माण कराया गया। जिसमें समय-समय पर आईटी एवं टैलीकॉम सेन्टर तथा वायर सेलर मीट एवं इन्वेस्टर मीट का भी आयोजन किया गया। ग्वालियर व्यापार मेला में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए कलामंदिर और कुसुमाकर रंग मंच हैं। इन मंचों पर देश के बड़े-बड़े कलाकार आकर अपनी प्रतिभा का परिचय देते हैं। मेला में आय की वृद्धि के उद्देश्य से 9 गार्डन विकसित किए गए हैं। इनसे 2.50 करोड़ रुपए की प्रतिवर्ष आय होती है।

मेला में कई विभागों व राज्यों की प्रदर्शनियां लगाई जाती हैं। इन प्रदर्शनियों में अनेकों उत्पादों का प्रदर्शन किया जाता है। किसान मेला एवं कृषि प्रदर्शनी लगाने का उद्देश्य किसानों को उन्नत फसलों, उन्नत बीजों, पारम्परिक खाद और रासायनिक खादों के बारे में परिचित कराना है।

मेला में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के द्वारा टीवी व फिल्मी कलाकार भी यहां आकर अपनी प्रस्तुति देते रहे हैं। मेला के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं मुशायरे को सुनने के लिए तो यहां के लोग वर्ष भर इंतजार करते हैं।

मेला में वाहनों पर रोड टैक्स में 50 प्रतिशत की छूट मिलने पर मेला में आने वाले सैलानियों की संख्या तो बढ़ी है साथ ही व्यापार भी बढ़ा है। मेला का जो व्यापार 100 करोड़ का होता था, वह आज 500 करोड़ से अधिक का हो गया है।

मेला में खान-पान की दृष्टि से देश के कोने-कोने से लोग आकर अपने स्टॉल लगाते हैं। इसमें मेला में आने वाला हरिद्वार चाट भण्डार सबसे अधिक मशहूर है।

Updated : 19 Jan 2020 9:49 AM GMT
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